Sunday, May 2, 2021

टाटा नैनो - सुंदर सपने का यूं अंत हो जाना

अंदमान निकोबार की सड़क पर नैनो।  ( फोटो 2016 ) 

जब कभी कोई नैनो कार सड़क पर चलती हुई या खड़ी दिखाई देती है तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है पर   नैनो के सपने का दुखद अंत हो चुका है।  मार्च   2009   में पेश देश की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन शुरू हुआ था। पर यह दौर दस साल ही चल सका। 



  

नैनो का उत्पादन और इसकी बिक्री 2019 में पूरी तरह बंद हो चुका है। दरअसल बाद के सालों में इस कार को लोगों का अच्छा रेसपांस नहीं मिल रहा था। अंततः  कंपनी ने चुपके से उत्पादन बंद करने का फैसला लिया।   हालांकि नैनो देश की मध्यम वर्गीय आबादी के लिए रतन टाटा का एक भावुक सपना हुआ करती थी जिसे मूर्त रूप दिया गया था।



दुनिया की सबसे  सस्ती कार -  टाटा की नैनो दुनिया की सबसे सस्ती कार हुआ करती थी। जब यह सड़क पर आई तो दुनिया की तमाम आटोमोबाइल कंपनियों को काफी आश्चर्य हुआ था।  उनका कौतूहल ये था कि कोई कैसे एक लाख रुपये में कार उपलब्ध करा सकता है। पर साल 2009 में ऐसा हुआ था।   नैनो आई और देश-विदेश की सड़कों पर शान से चली। 



कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक बार देश के जाने माने उद्यमी रतन टाटा मुंबई में अपनी कार से जा रहे थे। बाहर बारिश हो रही थी। रेड लाइट पर एक दंपत्ति अपने स्कूटर पर सवार बारिश से बचने की असफल कोशिश कर रहा था। यह सब कुछ देखकर रतन टाटा के मन में ख्याल आया कि क्यों ने एक ऐसी कार बनाई जाए जो स्कूटर बाइक से थोड़ी ही महंगी हो। यहीं से एक लाख रुपये के दायरे में एक कार बनाने के सपने ने जन्म लिया। 


टाटा ने जब एक लाख रुपये की कार बनाने की शुरुआत की तो उसकी राह में रोड़े भी खूब आए। टाटा की इस नैनो कार का प्लांट लगना तय हुआ बंगाल के सिंगूर में। पर वहां जमीन विवाद शुरू हो गया। कई साल चले इस विवाद के बाद सिंगूर में नैनो का प्लांट लगाने का इरादा टाटा को बदलना पड़ा। इससे नैनो को सड़क पर आने में देरी भी हुई। अंत में नैनो का प्लांट लगा गुजरात के साणंद में।


पर इससे पहले नैनो की पहली कार बन कर निकली उत्तराखंड के रुद्रपुर के पास स्थित प्लांट से। इसकी पहली झलक साल 2008 में सड़कों पर दिखाई दी। टाटा ने नैनो के रूप में छोटी पर मजबूत कार बनाने की कोशिश की थी। इसकी पहाड़ों पर और रेगिस्तान में लंबी ड्राईव करके टेस्टिंग की गई। इसके बाद इसे जनता के बीच पेश किया गया। हालांकि इसे लोगों से बहुत शानदार रेस्पांस नहीं मिला।


साल 2011 में टाटा मोटर्स ने आधिकारिक तौर पर श्रीलंका में छोटी कार की पेशकश करते हुए नैनो का निर्यात शुरू कर दिया। इसकी कीमत श्रीलंकाई मुद्रा में   9.25 लाख रुपये (यानी   3.80 लाख भारतीय रुपये) थी। टाटा नैनो के लिए श्रीलंका पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार था,जहां जनता की कार कहलाने वाले टाटा की नैनो को आधिकारिक तौर पर पेश किया गया।


नैनो जब  सड़क पर दौड़ने लगी तो लोग इसे कौतूहल से देखते थे। इस नन्ही सी कार को मेरे  स्कूल में पढ़ने वाले और बेटे ने  बड़े प्यार से एक नाम दिया - बिना पूंछ वाला चूहा।  यह बड़ी बड़ी कारों की भीड़ में कुछ कुछ चूहे जैसा ही प्रतीत होता था।  पर टाटा की दूसरी कारों की तरह इसको लोगों ने  ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया।  इसलिए बाजार में इसकी धीरे धीरे लोकप्रियता कम होने लगी।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
 ( TATA NANO, CAR, SINGUR, RUDRAPUR, SANAND ) 


1 comment:

  1. टाटा नैनो सच में अपनी मौजूदगी से कोतुहल का बायस बनती थी। रोचक आलेख।

    ReplyDelete