Friday, May 14, 2021

सिटी फारेस्ट गाजियाबाद वन हैं सुंदर घनेरे...


गाजियाबाद शहर में एक सिटी फारेस्ट है। यानी शहर में जंगल। यह जंगल  175 एकड़ में फैला हुआ है। स्थानीय लोगों की कच्ची  माप में पांच हजार  बीघा में है।  इसके अंदर नौ किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक बना हुआ है।


 

Wednesday, May 12, 2021

दक्षिण के पांच लोकप्रिय हिल स्टेशन


ठंडे मौसम के लिए आप पहाड़ों का रुख करते हैं। तो सिर्फ उत्तर भारत में नहीं दक्षिण भारत में भी कई हिल स्टेशन हैं जहां का मौसम सालों भर लुभाता है। वैसे तो आपने दक्षिण के लोकप्रिय हिल स्टेशन ऊटी के बारे में सुना ही होगा। पर आपको हम आज बताते हैं दक्षिण के टॉप पांच हिल स्टेशन के बारे में।


सबसे पहले बात करते हैं ऊटी की। उटी यानी उदगमंडलम। यह तमिलनाडु में पड़ता है। हमने साल 2012 में ऊटी की यात्रा की थी। यह दक्षिण भारत का सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन है। इसकी खासियत है कि यहां पर आपको रहने के लिए सस्ते होटल भी मिल जाएंगे तो पांच सितारा भी। उटी आप कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से मैसूर होते  हुए पहुंच सकते हैं।  तो दूसरा रास्ता तमिलनाडु के बड़े शहर  कोयंबटूर से होकर है। 

 

कन्नूर ( तमिलनाडु )

कोडइकनाल ( तमिलनाडु)

मुन्नार (केरल)

कुर्ग ( कर्नाटक )

 

 

 




Monday, May 10, 2021

स्वामी विवेकानंद और बोध गया

महान आध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। ये तो सभी जानते हैं। पर उनपर कई और आध्यात्मिक शक्तियों का प्रभाव पड़ा था। वे गाजीपुर में पवहारी बाबा से मिले थे। पर इससे पहले उन्होंने बुद्ध को समझने के लिए बोध गया की यात्रा की थी।

 दो बार बोध गया आए - स्वामी विवेकानंद दरअसल दो बार बोध गया आए थे।   एक बार नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में तो दूसरी बार स्वामी विवेकानंद के रूप में।  वास्तव में उनके जीवन पर गौतम बुद्ध का भी व्यापक प्रभाव पड़ा था। 

गौतम बुद्ध



 

 

Saturday, May 8, 2021

यहां शहीद हुए थे महाराजा सूरजमल


प्रतापी राजा महाराजा सूरजमल की स्मृतियां पूर्वी दिल्ली में बिखरी हुई हैं। इसे संजोया भी गया है। आपका पता है पूर्वी दिल्ली के एक विशाल आवासीय कालोनी का नाम सूरजमल विहार है। इसके ठीक सामने स्थित है महाराजा सूरजमल पार्क।


Thursday, May 6, 2021

वीके कृष्णमेनन - देश के दूसरे शक्तिशाली व्यक्ति


दिल्ली में सेना भवन के बाहर एक मूर्ति लगी है। यह मूर्ति वीके कृष्ण मेनन की है। इसके बगल में उनके नाम पर एक सड़क का भी नाम है। कौन थे वीके कृष्ण मेनन। वे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के मंत्रीमंडल में रक्षा मंत्री हुआ करते थे। साठ के दशक में नेहरु के बाद वे देश की दूसरी सबसे शक्तिशाली शख्सियत थे। वे भले ही मूल रूप से केरल के रहने वाले थे। पर उन्होंने मुंबई और बंगाल के मिदनापुर से लोकसभा का चुनाव जीता था। बाद में केरल से भी लोकसभा के लिए चुने गए। इस तरह लोकसभा में उन्होंने तीन राज्यों का प्रतिनिधित्व किया।

 

वे नार्थ मुंबई 1957 और 1961 में चुनाव जीते। बाद में कांग्रेस पार्टी  से अलग होकर पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से 1969 में चुनाव जीता। अपने गृह राज्य केरल में त्रिवेंद्रम से 1971 में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीते।

Tuesday, May 4, 2021

इंदिरा स्मृति - सफदरजंग बंगला नंबर एक


भारत की राजधानी दिल्ली में। सफदरजंग बंगला नंबर एक।   यह लंबे समय तक आवास रहा देश सबसे शक्तिशाली प्रधान मंत्री,  लौह महिला श्रीमती इंदिरा गांधी का।   यहीं उनका आखिरी वक्त भी गुजरा। यहीं पर 31 अक्तूबर 1984 को उनकी हत्या भी कर दी गई थी।


तो चलिए आज चलते हैं इस बंगले में। देश की राजधानी दिल्ली के लुटियन जोन में बहुत कम बंगले हैं जिसमें आम आदमी का प्रवेश संभव है। पर अब संग्रहालय में तबदील हो जाने के कारण आप इसमें प्रवेश कर सकते हैं। इस बंगले का रिश्ता देश के दो प्रधानमंत्रियों से है।


इंदिरा गांधी के अलावा उनके बेटे राजीव गांधी भी लंबे समय तक इस बंगले में रहे। इसी बंगले में रहते हुए देश के प्रधानमंत्री बने। तो इस बंगले घूमते हुए राजीव गांधी का कक्ष भी देखा जा सकता है। युवावस्था में राजीव अपनी मां के साथ इसी बंगले में रहते थे।  हांलाकि वे पायलट थे पर परिस्थितिवश उन्हें राजनीति में आना पड़ा।


दिल्ली के पृथ्वीराज रोड से चलकर सफदरजंग के मकबरे वाले चौराहे पर पहुंचने पर दाहिनी तरफ का रास्ता सफदरजंग रोड कहलाता है। इसी सड़क पर दिल्ली का प्रसिद्ध जिमखाना क्लब स्थित है। सफदरजंग और अकबर रोड के चौराहे पर ये बंगला नंबर एक स्थित है।

 


इंदिरा गांधी जब पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल में मंत्री बनीं तो उन्होने अपने रहने के लिए इस बंगले को पसंद किया। वैसे यह बंगला 1926 के आसपास का बना हुआ है। लुटियन बंगलों की तरह यह आसपास के बाकी बंगलों जैसा ही है। इसमें कुछ खास या कुछ अलग नहीं था। पर मंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक इंदिरा गांधी इसी बंगले में रहीं। उन्होंने जीवन भर अपना आवास कभी नहीं बदला।


इस बंगले कई कमरों को संग्रहालय में तबदील कर दिया गया है। यहां प्रवेश करने के बाद 1966 से 1984 के बीच के देश के इतिहास से रुबरू हो सकते हैं। इस दौरान की बड़ी घटनाओं के अखबारों के मुख पृष्ठ की प्रतियां यहां डिस्प्ले किया गया है। 

इंदिरा गांधी ने पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। 1969 में कांग्रेस में विद्रोह हुआ और प्रधानमंत्री को ही पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद कांग्रेस में विभाजन हुआ। पर बड़े धड़े पर इंदिरा गांधी का कब्जा रहा।   दरअसल सन 1966  से  1984  तक देश का इतिहास इंदिरा युग है।



सन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को आजादी मिलना और बांग्लादेश का गठन होना। इसमें इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका थी। फिर इमरजेंसी का भी दौर आया। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी को बड़ी हार मिली। सन 1980 में उन्होंने सत्ता में वापसी की। इन सब घटनाओं को आप यहां अखबारों की हेडलाइन में देख सकते हैं।   इंदिरा गांधी को कई बड़े फैसलों के लिए याद किया जाता है। उन्होंने बैंको का राष्ट्रीयकरण किया।   प्रिंसले  स्टेट के राजाओं का प्रिवी पर्स खत्म कर दिया। 

इंदिरा जी का दुनिया महान हस्तियों से पत्रव्यवहार, वार्ताओं और उनसे मिले कुछ स्मृति चिन्हों को भी यहां देखा जा सकता है। इसके अलावा आप इंदिरा जी अध्ययन कक्ष ( पुस्तकालय) उनका डायनिंग रूम और उनका शयन कक्ष भी देख सकते हैं। उस कक्ष भी देख सकते हैं जहां बैठकर वह प्रमुख लोगों के वार्ता किया करती थीं।


सफदरजंग के इस बंगले के लॉन में आगे बढ़ते हुए आप उस स्थल तक पहुंच जाते हैं जहां 31 अक्तूबर 1984 की मनहूस सुबह उनके ही दो सुरक्षा गार्डों ने गोलियां बरसा कर उनकी हत्या कर दी। और एक शक्तिशाली आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। जिसने कहा था मैं नहीं रहूंगी तो भी मेरे खून का एक एक कतरा इस देश को मजबूती प्रदान करेगा। यहां से चलते हुए बिक्रय केंद्र से पुस्तकें और कई तरह के स्मृति चिन्ह भी खरीद सकते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( INDIRA GANDHI, RAJEEV GANDHI,  SAFDARJANG  BANGLAW NO 01 )  


Sunday, May 2, 2021

टाटा नैनो - सुंदर सपने का यूं अंत हो जाना

अंदमान निकोबार की सड़क पर नैनो।  ( फोटो 2016 ) 

जब कभी कोई नैनो कार सड़क पर चलती हुई या खड़ी दिखाई देती है तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है पर   नैनो के सपने का दुखद अंत हो चुका है।  मार्च   2009   में पेश देश की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन शुरू हुआ था। पर यह दौर दस साल ही चल सका। 



  

नैनो का उत्पादन और इसकी बिक्री 2019 में पूरी तरह बंद हो चुका है। दरअसल बाद के सालों में इस कार को लोगों का अच्छा रेसपांस नहीं मिल रहा था। अंततः  कंपनी ने चुपके से उत्पादन बंद करने का फैसला लिया।   हालांकि नैनो देश की मध्यम वर्गीय आबादी के लिए रतन टाटा का एक भावुक सपना हुआ करती थी जिसे मूर्त रूप दिया गया था।



दुनिया की सबसे  सस्ती कार -  टाटा की नैनो दुनिया की सबसे सस्ती कार हुआ करती थी। जब यह सड़क पर आई तो दुनिया की तमाम आटोमोबाइल कंपनियों को काफी आश्चर्य हुआ था।  उनका कौतूहल ये था कि कोई कैसे एक लाख रुपये में कार उपलब्ध करा सकता है। पर साल 2009 में ऐसा हुआ था।   नैनो आई और देश-विदेश की सड़कों पर शान से चली। 



कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक बार देश के जाने माने उद्यमी रतन टाटा मुंबई में अपनी कार से जा रहे थे। बाहर बारिश हो रही थी। रेड लाइट पर एक दंपत्ति अपने स्कूटर पर सवार बारिश से बचने की असफल कोशिश कर रहा था। यह सब कुछ देखकर रतन टाटा के मन में ख्याल आया कि क्यों ने एक ऐसी कार बनाई जाए जो स्कूटर बाइक से थोड़ी ही महंगी हो। यहीं से एक लाख रुपये के दायरे में एक कार बनाने के सपने ने जन्म लिया। 


टाटा ने जब एक लाख रुपये की कार बनाने की शुरुआत की तो उसकी राह में रोड़े भी खूब आए। टाटा की इस नैनो कार का प्लांट लगना तय हुआ बंगाल के सिंगूर में। पर वहां जमीन विवाद शुरू हो गया। कई साल चले इस विवाद के बाद सिंगूर में नैनो का प्लांट लगाने का इरादा टाटा को बदलना पड़ा। इससे नैनो को सड़क पर आने में देरी भी हुई। अंत में नैनो का प्लांट लगा गुजरात के साणंद में।


पर इससे पहले नैनो की पहली कार बन कर निकली उत्तराखंड के रुद्रपुर के पास स्थित प्लांट से। इसकी पहली झलक साल 2008 में सड़कों पर दिखाई दी। टाटा ने नैनो के रूप में छोटी पर मजबूत कार बनाने की कोशिश की थी। इसकी पहाड़ों पर और रेगिस्तान में लंबी ड्राईव करके टेस्टिंग की गई। इसके बाद इसे जनता के बीच पेश किया गया। हालांकि इसे लोगों से बहुत शानदार रेस्पांस नहीं मिला।


साल 2011 में टाटा मोटर्स ने आधिकारिक तौर पर श्रीलंका में छोटी कार की पेशकश करते हुए नैनो का निर्यात शुरू कर दिया। इसकी कीमत श्रीलंकाई मुद्रा में   9.25 लाख रुपये (यानी   3.80 लाख भारतीय रुपये) थी। टाटा नैनो के लिए श्रीलंका पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार था,जहां जनता की कार कहलाने वाले टाटा की नैनो को आधिकारिक तौर पर पेश किया गया।


नैनो जब  सड़क पर दौड़ने लगी तो लोग इसे कौतूहल से देखते थे। इस नन्ही सी कार को मेरे  स्कूल में पढ़ने वाले और बेटे ने  बड़े प्यार से एक नाम दिया - बिना पूंछ वाला चूहा।  यह बड़ी बड़ी कारों की भीड़ में कुछ कुछ चूहे जैसा ही प्रतीत होता था।  पर टाटा की दूसरी कारों की तरह इसको लोगों ने  ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया।  इसलिए बाजार में इसकी धीरे धीरे लोकप्रियता कम होने लगी।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
 ( TATA NANO, CAR, SINGUR, RUDRAPUR, SANAND )