Tuesday, April 6, 2021

गुरुद्वारा मजनूं का टीला – प्रथम पातशाही की याद



दिल्ली के गुरुद्वारा मजनूं का टीला के साथ प्रथम पातशाही गुरुनानक देव जी की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। दिल्ली में कश्मीरी गेट बस स्टैंड से उत्तर यमुना नदी के तट पर स्थित इस गुरुद्वारा का परिसर काफी मनोरम है। आजकल इस गुरुद्वारे का आसपास एक अगल दुनिया बसती है। वहीं गुरुद्वारे के बगल में स्थित पार्क से यमुना पर नवनिर्मित सिग्नेजर ब्रिज का सुंदर नजारा दिखाई देता है।

मजनू का टीला का रिश्ता लैला मजनू वाले प्रेम कहानी के मजनू से नहीं है। बल्कि इसका रिश्ता एक सूफी संत से है। सिकंदर लोदी के शासन काल में यहां पर सूफी संत अब्दुल्ला रहते थे। वे ईश्वर की भक्ति में इस तरह लीन रहते थे कि लोग उन्हें मजनू कहते थे। कहा जाता है कि वे ज्यादा समय तक ध्यान लगाए रहते थे। यहां आने वाले लोगों को वह यमुना नदी पार भी कराया करते थे। उन्हें इस बात का इल्म था कि नदी में कहां पानी कम है।


सूफी संत की मुलाकात गुरुनानक देव जी से हुई। अपनी पहली उदासी में दिल्ली आए गुरुनानक देव जी ने सूफी संत अब्दुल्ला को अपना आशीर्वाद दिया। बाद में इसी स्थल पर 1783 में सिख योद्धा बघेल सिंह ने एक गुरुद्वारा का निर्माण कराया। बाद में इस गुरुद्वारे ने बड़ा आकार ले लिया। अब यहां देश विदेश से श्रद्धालु आते हैं। आसपास का इलाका मजनू का टीला नाम से ही प्रसिद्ध हो चुका है।


इस स्थल पर गुरुनानकदेव जी 20 जुलाई 1505 को आए थे। यहां पर गुरु महाराज 30 जुलाई तक रहे। दस दिनों तक उन्होंने अपने पवित्र वचनों से यहां की संगत को निहाल किया। गुरुजी ने आशीर्वाद दिया कि यह स्थान मजनू के नाम से मशहूर होगा।


गुरु हरगोविंद भी आए थे - बाद में 1621 में छठे गुरु गुरु हरगोविंद साहिब जी का मजनू की टीला में आगमन हुआ। वे पांचवे गुरु गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र थे। तब दिल्ली में जहांगीर का शासन काल था। तब गुरू जी ने नामदान दिया। कहा जाता है कि गुरुजी की बादशाह जहांगीर से मुलाकात और धार्मिक चर्चा भी हुई। यहीं से गुरु जी को ग्वालियर के किले में भेजा गया था।


बाबा रामराय ने दिखाई कारामात - इसके बाद 1658 में गुरु हर राय के  बड़े सुपुत्र बाबा रामराय इस स्थान पर आए। इस दौरान बाबा  रामराय को औरंगजेब ने कुएं में गिराने की साजिश रची। कुएं के ऊपर चादर बिछा दी गई। बाबा राम राय चादर पर बिना डोले यूं बैठ गए जैसे वे जमीन पर ही बैठे हों। उनकी कारामात को देखकर साजिश करने वाले हैरान रह  गए। कहा जाता है कि बाबा राम राय ने यहां पर कुल 72 कारामातें दिखाई थीं। यहां आने वाले श्रद्धालु गुरुद्वारा परिसर में स्थित इस कुएं को भी देखते हैं।


जत्थेदार बघेल सिंह ने 1783 में अपने 30 हजार सैनिकों के साथ दिल्ली पर हमला किया तो वे इसी स्थान पर अपने पांच हजार सैनिकों के साथ रुके थे। इसी दौरान उन्होंने यहां पर गुरुद्वारे का निर्माण कराया। तब इस गुरुद्वारा का नाम पंजाबी में मजनूं दा टील्ला रखा गया। अब ये पूरा क्षेत्र इसी नाम से जाना जाता है। 


मजनू का टीला गुरुद्वारा के बाहर वाहनों की पार्किंग के लिए जगह है। परिसर में एक तरफ विशाल पार्क है तो दूसरी तरफ गुरुघर। आप यहां सर्दियों में मीठी धूप का भी आनंद ले सकते हैं। 

विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  

( GURUDWARA MAJNU KA TILA, GURU NANAK DEV, GURU HARGOVIND,  BABA RAMRAI ) 



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