Wednesday, April 28, 2021

और इस तरह बेगाना हो गया तमिलनाडु का गांव



राजधानी  दिल्ली में  अलग अलग राज्यों से आए लोग  समय समय  पर अपना आशियाना बनाते रहे हैं।  उनमें से  बड़ी संख्या में तमिल  भाई भी हैं। दुरा राज नाम है उनका। दिल्ली के ताहिरपुर रोड पर उनकी मोटर कार चलाना सीखाने केंद्र है उनका मीनाक्षी मोटर्स के नाम से। जब उनसे थोड़ी बातचीत करने का मौका मिला तो वे थोड़े दिलचस्प इंसान लगे। मैं पूछ बैठा आप मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं। बताने लगे मैं पैदा तो दिल्ली में ही हुआ पर मेरे पिता यहां तमिलनाडु के पायनूर से आए थे। यह कांचीपुरम जिले में महाबलीपुरम के पास एक गांव है। दिल्ली कैसे पहुंच गए। इस सवाल पर वे भावुक हो गए और उनकी आंखों से यादों की एक दरिया बह निकली।

हमारा परिवार तमिलनाडु में पटवारी हुआ करता था। बहुत बड़ी जमींदारी हुआ थी हमारे दादा के पास। पर अब कुछ नहीं बचा। वह आजादी से पहले का समय था। मेरे दादाजी एक दिन अचानक क्या सुझा कि वे चेन्नई से सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हो गए। जहाज पर उनसे पूछा गया कि तुम्हारी बाकी फेमिली कहां है। उन्होंने कहा, कोई परिवार नहीं है। पर तभी किसी ने बता दिया इसके तो तीन बच्चे हैं। इसके बाद वे जहाज से उतार दिए गए। पर कुछ दिनों बाद वे नहीं माने एक और सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हुए और इस बार पलायन करने में सफल हो गए। दादा जी के जाने  के बाद मेरे दस साल के पिता अनाथ हो गए। मां के लिए बच्चों को पालना मुश्किल हो गया। उनके सामने कोई रोजी रोटी का जरिया नहीं था। समय बहुत मुफलिसी में कट रहा था। थोड़ी उम्र बढने के बाद एक दिन पिता रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गए। तो मेरा जन्म दिल्ली में हुआ। यहीं पर संघर्ष करके हमने रोजी रोटी का इंतजाम किया। लंबे समय तक मोटर पार्टस का बिजनेस किया। पर बार-बार याद आता था कि हमारा तमिलनाडु में कहीं पर हमारा घर और जमीन जायदाद है। 


तो सन 1980 में मैं एक बार अपने गांव गया। अपनी जमीन जायदाद के बारे में दरियाफ्त करने। गांव में हमारे एक पड़ोसी मिले। उन्होंने मुझे मेरे परिवार के पुराने दिन याद दिलाए। यह भी याद दिलाया कि कैसे तुम्हारी दादी और पिताजी को भूखों मरने से बचाया था। उन्होंने बताया कि जब तुम्हारी दादी और पिता के पास खाने को कुछ नहीं था तो हमने रहम करते हुए खाने के लिए उन्हें माड़ भात दिया था। यह सब सुनकर मेरा मन भावुक हो गया। अब पड़ोसी ने कहा, मैंने तुम्हारे परिवार को कभी भूखा मरने से बचाया था। अब तुम उसके बदले में मेरे उपर थोड़ा एहसान करो। मैंने पूछा क्या,,, उसने कहा, ये जो गांव में तुम्हारी जमीन है वह सब मेरे नाम कर दो। अब तुम तो दिल्ली में रहते हो तुम्हे इस जमीन की क्या जरूरत होगी। मैं अतीत में उनके द्वारा अपने परिवार पर किए गए एहसान से भावनाओं में बह रहा था। तो बिना किसी धन की इच्छा किए उन्हें सारी जमीन लिखने को तैयार हो गया। उन्होंने आनन-फानन में जमीन के कागज तैयार कराए। हमलोग रजिस्ट्री आफिस में गए। मैंने सारे कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए। रजिस्ट्री हो जाने के बाद उस पड़ोसी ने दफ्तर के बाहर आकर मुझे खाना खिलाया। 


उसके बाद हमलोग गांव लौटे। अब  उसने मुझे कुछ दिखाने की कोशिश की। कहा, यहां से उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम जहां तक तुम्हारी नजर जाती है ये सारी जमीन तुम्हारी हुआ करती थी। पर ये अब सारी जमीन हमारी हो चुकी है। अब मेरी आंखे चौंधियां गईं तो इतनी संपत्ति मेरे दादा की हुआ करती थी गांव में, जो अब मेरी नहीं रही। गांव से मेरा बचा खुचा रिश्ता भी टूट चुका था। मैं चुपचाप दिल्ली के लिए लौट चला। पुरानी हिंदी फिल्म भाभी का ये गीत दिल के किसी कोने में बज रहा था- चल उड़ जा रे पंक्षी की ये देश हुआ बेगाना... अब तो बस दिल में तमिलनाडु की यादें भर हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

-         ( TAMIL IN DELHI ) 

 


1 comment:

  1. रोचक दास्तान रही... इतना सब कुछ ले लिया पड़ोसी ने... कई लोगों के साथ ऐसा ही हुआ है....

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