Saturday, April 10, 2021

भूटान में प्रथम पातशाही - गुरुनानक देव जी


सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव जी ने भी भूटान की धरती को अपने चरण रज से पवित्र किया था। वे अपनी पहली उदासी के क्रम में ही यहां आए थे। वैसे भूटान के बौद्ध देश है। बौद्ध धर्म गुरु आचार्य पद्मसंभव आठवीं सदी में भूटान गए थे। उनके कारण भूटान में बड़ी संख्या में लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

 

गुरु नानक देव जी अपनी पहली यात्रा के दौरान पंजाब से हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल, सिक्किम,  भूटान, अरुणाचल प्रदेश, ढाका, असम, नागालैंड, त्रिपुरा, चटगांव से होते हुए बर्मा (म्यांमार) पहुंचे थे। वहां से वे ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा होते हुए वापस आए थे। 


भूटान की लोककथाओं के अनुसार गुरुनानक देव जी वहां पहुंच कर एक उद्यान में रुके। लोगों ने देखा कि एक महान आत्मा पधारी है। वे न तो कुछ खाते पीते न ही किसी से बातें करते थे। ये देखकर लोगों को अचरज हुआ। न वे भिक्षा मांगते थे न ही किसी का दिया हुआ कुछ लेते थे। यह सब सुनने के बाद स्थानीय राजा गुरुनानक देव जी से मिलने के लिए आया। गुरुजी ने आशीर्वाद दिया कि यह देश सभी तरह के अनाज उगेंगे और यहां के लोग समृद्ध होंगे।

 

यह माना जाता है कि गुरु रिनपोछे जो भूटान में गुरुनानक देव जी का ही एक नाम है, सन 1516-17 में थिंपू स्थित ताशी चो जोंग में पधारे थे। स्थानीय लोगों में उनके चमत्कारों की कथाएं आज भी सुनाई जाती हैं। गुरुनानक देव जी की जीवनी जन्म साखी के अनुसार वे पूर्वोत्तर के सिक्किम और चुंबी घाटी होते हुए भूटान पहुंचे थे। सबसे पहले वे पारो घाटी में पहुंचे। वे दुखजयाल जोंग ( मठ) में पहुंचे। इसके बाद वे प्रसिद्ध टाइगर नेस्ट मठ में भी  पहुंचे। वे लगभग पारो के सभी बौद्ध मठों में गए। 


 भूटान के कुछ मठों में गुरु रिनपोछे की पेंटिंग भी बनाई गई है। भूटान की लोककथाओं के अनुसार गुरु नानकदेव टाइगर नेस्ट के आसपास के वन क्षेत्र से वापस शहर में लौटे तो लोगों को अचरज हुआ क्योंकि उस क्षेत्र में भूखे बाघ रहते थे जो इंसानों को अपना निवाला बना लेते थे। पर उन्होंने गुरूजी के साथ कुछ नहीं किया। जब उन्होंने गुरूजी से सवाल किया तो उनका जवाब था हमने उन्हें अहिंसक बना दिया है। वे सारे बाघ कुछ समय बाद भोजन नहीं मिलने पर मर जाएंगे और ये क्षेत्र सुरक्षित हो जाएगा। 


पारो के बाद गुरुनानक देव जी थिंपू पहुंचे। वे ताशी जोंग (मठ) में अपने दो शिष्यों के साथ पहुंचे थे। इस मठ के मुख्य लामा गुरूजी की शिक्षाओं से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने गुरुजी के प्रमुख वचनों का स्थानीय भाषा में अनुवाद भी किया। गुरुनानक देव जी भूटान में बूमथांग भी गए। यहां पर उनकी मुलाकात भूटान के आध्यात्मिक संत पेमालिंगा से हुई थी। गुरुनानक देव जी के आशीर्वाद से बूमथांग में पांच तरह के बेहतरीन खुशूब वाले मशरूम की पैदावार हुई थी। भूटान से गुरुनानक देव जी मानस नदी को पार करके अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश कर गए थे।

 

14 नामों से जाने जाते हैं गुरुनानक देव जी - आपको पता है कि प्रथम पातशाही गुरुनानक देव जी को कुल 14 नामों से जाना जाता है। इनमें भूटान और सिक्किम में वे गुरु रिनपोछे के नाम से जाने गए। तो तिब्बत में उन्हे नानक लामा के नाम से जाना जाता है।

 24 साल अपने जीवन के गुरुनानक देव जी उदासियों में रहे,  यानी इस दौरान यात्राएं करते रहे। 

 28 हजार किलोमीटर पदयात्राएं की उन्होंने चार उदासियों के दौरान, कहीं कहीं विद्वान यह भी लिखते हैं कि उन्होंने 80 हजार किलोमीटर की पदयात्राएं की।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( GURU NANAK DEV JI,  NANAKLAMA,  BHUTAN, RINPOCHE GURU, BUMTHANG ) 



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