Friday, April 30, 2021

हमारे सिर पर कैसा हेलमेट होना चाहिए

बड़ा सवाल है कि हमारे सिर पर कैसा हेलमेट होना चाहिए। अक्सर लोग सस्ता हेलमेट खरीद लेते हैं।  यह सिर्फ लाइसेंस बचाने के लिए होता है। ट्रैफिक के चालान से बचने के लिए।  पर वास्तव में हेलमेट तो आपकी सिर के सुरक्षा के लिए होना चाहिए। 

आरिफ खान गाजियाबाद के रहने वाले युवा उद्यमी हैं। वे सुरक्षित हेलमेट के अभियान से जुड़े हुए हैं।   वे बताते हैं कि अक्सर हमलोग लाइसेंस बचाने के लिए फुटपाथ पर बिकने वाली अस्थायी दुकानों से सस्ती हेलमेट खरीद लेते हैं। वे आपके सिर की सुरक्षा कर पाने में बिल्कुल सक्षम नहीं है। कई बार तो ये हेलमेट  मामूली सी हथौड़ी मारने  से टूट जाते हैं। 


गुणवत्ता से समझौता नहीं करें-  आजकल नई बाइक या स्कूटी खरीदने पर   बिल के साथ   हेलमेट लेना जरूरी होता है। पर अक्सर एजेंसी वाले आपको जो हेलमेट थमा देतें हैं वह भी टॉप ब्रांड का नहीं होता।  जब हम बाइक खरीदने में 40 हजार से दो लाख रुपये खर्च कर देते हैं हेलमेट के साथ कुछ सौ रूपये के लिए समझौता क्यों करते हैं। 


तो कैसा होना चाहिए हमारा हेलमेट।  जो लोग लंबी यात्राएं करते हैं प्रोफेशनल बाइकर हैं वे हेलमेट का महत्व जानते हैं। वे जानते हैं कि आपका हेलमेट उच्च गुणवत्ता का होना चाहिए। ऐसे लोग कभी सस्ते हेलमेट का इस्तेमाल नहीं करते। 


फुटपाथ से हेलमेट न खरीदें - तो आप भी कभी फुटपाथ या किसी दुकान से सस्ती क्वालिटी का हेलमेट नहीं खरीदें। जब भी खरीदें उच्च गुणवत्ता का मजबूत हेलमेट ही खरीदें । पर उच्च गुणवत्ता की पहचान कैसे हो। क्या आईएसआई मार्क लगा हर हेलमेट ठीक  है। तो इसका जवाब भी ना में है। सिर्फ आईएसआई मार्क दिखाई दे जाने से कुछ नहीं होता। 


 ब्रांडेड कंपनी का उत्पाद खरीदें -  हेलमेट हमेशा किसी  ब्रांडेड कंपनी का ही खऱीदें। कानून से बचने के लिए हेलमेट नहीं खरीदें। आपका जीवन कीमती है इसलिए जीवन को बचाने वाला हेलमेट ही खरीदें।   ब्रांडेड कंपनियों में आप स्टड्स और स्टीलबर्ड पर भरोसा रख सकते हैं। इनका हेलमेट 900 रुपये से आरंभ हो जाता है। आपको पता महंगे  हेलमेट को 32 हजार रुपये तक के आते हैं।


हर यात्रा पर हेलमेट पहनें -  सिर्फ लंबी दूरी की यात्राओं ही नहीं छोटी छोटी दूरी पर निकलते समय भी बाइक या स्कूटी पर सवार हों तो हेलमेट जरूर लगा लें।  आपको पता ही होगा कि हादसे कभी बता कर नहीं आते।   मेरे कई ऐसे दोस्तों के  सड़क हादसों से उदाहरण हैं जहां सिर्फ हेलमेट होने के कारण वे जिंदा बच सके। 

पिछली सवारी के लिए भी जरूरी - और हां  बाइक या स्कूटी चलाते समय  सिर्फ अपने सिर पर ही नहीं बल्कि पिछली सवारी के लिए हेलमेट जरूरी है। यह कानून भी  जरूरी है। साथ ही पिछली सवारी की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।


साइज के अनुरूप हो हेलमेट - हमेशा  हेलमेट अपने सिर के साइज के अनुरूप खरीदें। यह  बहुत ढीला भी नहीं होना चाहिए और बहुत टाइट भी नहीं होना चाहिए।  अक्सर हाफ कट वाले और ठीक से नहीं बंधे हुए हेलमेट से बचना चाहिए। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( GOOD QUALITY HELMET , TRAVEL, STUDDS, STEELBIRD )

Wednesday, April 28, 2021

और इस तरह बेगाना हो गया तमिलनाडु का गांव



राजधानी  दिल्ली में  अलग अलग राज्यों से आए लोग  समय समय  पर अपना आशियाना बनाते रहे हैं।  उनमें से  बड़ी संख्या में तमिल  भाई भी हैं। दुरा राज नाम है उनका। दिल्ली के ताहिरपुर रोड पर उनकी मोटर कार चलाना सीखाने केंद्र है उनका मीनाक्षी मोटर्स के नाम से। जब उनसे थोड़ी बातचीत करने का मौका मिला तो वे थोड़े दिलचस्प इंसान लगे। मैं पूछ बैठा आप मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं। बताने लगे मैं पैदा तो दिल्ली में ही हुआ पर मेरे पिता यहां तमिलनाडु के पायनूर से आए थे। यह कांचीपुरम जिले में महाबलीपुरम के पास एक गांव है। दिल्ली कैसे पहुंच गए। इस सवाल पर वे भावुक हो गए और उनकी आंखों से यादों की एक दरिया बह निकली।

हमारा परिवार तमिलनाडु में पटवारी हुआ करता था। बहुत बड़ी जमींदारी हुआ थी हमारे दादा के पास। पर अब कुछ नहीं बचा। वह आजादी से पहले का समय था। मेरे दादाजी एक दिन अचानक क्या सुझा कि वे चेन्नई से सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हो गए। जहाज पर उनसे पूछा गया कि तुम्हारी बाकी फेमिली कहां है। उन्होंने कहा, कोई परिवार नहीं है। पर तभी किसी ने बता दिया इसके तो तीन बच्चे हैं। इसके बाद वे जहाज से उतार दिए गए। पर कुछ दिनों बाद वे नहीं माने एक और सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हुए और इस बार पलायन करने में सफल हो गए। दादा जी के जाने  के बाद मेरे दस साल के पिता अनाथ हो गए। मां के लिए बच्चों को पालना मुश्किल हो गया। उनके सामने कोई रोजी रोटी का जरिया नहीं था। समय बहुत मुफलिसी में कट रहा था। थोड़ी उम्र बढने के बाद एक दिन पिता रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गए। तो मेरा जन्म दिल्ली में हुआ। यहीं पर संघर्ष करके हमने रोजी रोटी का इंतजाम किया। लंबे समय तक मोटर पार्टस का बिजनेस किया। पर बार-बार याद आता था कि हमारा तमिलनाडु में कहीं पर हमारा घर और जमीन जायदाद है। 


तो सन 1980 में मैं एक बार अपने गांव गया। अपनी जमीन जायदाद के बारे में दरियाफ्त करने। गांव में हमारे एक पड़ोसी मिले। उन्होंने मुझे मेरे परिवार के पुराने दिन याद दिलाए। यह भी याद दिलाया कि कैसे तुम्हारी दादी और पिताजी को भूखों मरने से बचाया था। उन्होंने बताया कि जब तुम्हारी दादी और पिता के पास खाने को कुछ नहीं था तो हमने रहम करते हुए खाने के लिए उन्हें माड़ भात दिया था। यह सब सुनकर मेरा मन भावुक हो गया। अब पड़ोसी ने कहा, मैंने तुम्हारे परिवार को कभी भूखा मरने से बचाया था। अब तुम उसके बदले में मेरे उपर थोड़ा एहसान करो। मैंने पूछा क्या,,, उसने कहा, ये जो गांव में तुम्हारी जमीन है वह सब मेरे नाम कर दो। अब तुम तो दिल्ली में रहते हो तुम्हे इस जमीन की क्या जरूरत होगी। मैं अतीत में उनके द्वारा अपने परिवार पर किए गए एहसान से भावनाओं में बह रहा था। तो बिना किसी धन की इच्छा किए उन्हें सारी जमीन लिखने को तैयार हो गया। उन्होंने आनन-फानन में जमीन के कागज तैयार कराए। हमलोग रजिस्ट्री आफिस में गए। मैंने सारे कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए। रजिस्ट्री हो जाने के बाद उस पड़ोसी ने दफ्तर के बाहर आकर मुझे खाना खिलाया। 


उसके बाद हमलोग गांव लौटे। अब  उसने मुझे कुछ दिखाने की कोशिश की। कहा, यहां से उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम जहां तक तुम्हारी नजर जाती है ये सारी जमीन तुम्हारी हुआ करती थी। पर ये अब सारी जमीन हमारी हो चुकी है। अब मेरी आंखे चौंधियां गईं तो इतनी संपत्ति मेरे दादा की हुआ करती थी गांव में, जो अब मेरी नहीं रही। गांव से मेरा बचा खुचा रिश्ता भी टूट चुका था। मैं चुपचाप दिल्ली के लिए लौट चला। पुरानी हिंदी फिल्म भाभी का ये गीत दिल के किसी कोने में बज रहा था- चल उड़ जा रे पंक्षी की ये देश हुआ बेगाना... अब तो बस दिल में तमिलनाडु की यादें भर हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

-         ( TAMIL IN DELHI ) 

 


Monday, April 26, 2021

महापुरुषों की मूर्तियों का शहर दिल्ली

दिल्ली के चौक-चौराहों पर घूमते हुए आपको कई महापुरुषों की मूर्तियां नजर आती हैं। संसद भवन के करीब संसद मार्ग पर पटेल चौक पर आप देखेंगे तो गोलंबर के बीचों बीच सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति लगी है। उनकी प्रतिमा संसद भवन की ओर देख रही है।  

 पटेल की इस प्रतिमा का अनावरण 18 सितंबर 1963 को राष्ट्रपति डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  किया था।  अब भले ही देश में सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा बन गई है पर पटेल चौक की यह दिल्ली की सबसे पुरानी प्रतिमाओं में  से एक है। हर साल 31 अक्तूबर को उनकी जयंती पर यहां श्रद्धा  के पुष्प चढ़ाए जाते हैं।

देशरत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद -   दिल्ली के पंत मार्ग पर गोल डाकखाना से आगे गुरुद्वारा रकाबगंज की ओर जाने पर बायीं तरफ नजर डालें तो देश रत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की प्रतिमा नजर आती है। ये प्रतिमा संसद के एनेक्सी भवन के पीछे है। इसके आगे चलें तो संसदीय संग्रहालय का प्रवेश द्वार मिलता है। देश के पहले राष्ट्रपति को याद करने के लिए उनकी प्रतिमा सही जगह पर लगाई गई है। वैसे दिल्ली में उनके नाम पर एक सड़क का नाम भी राजेंद्र प्रसाद रोड है।


पुश्किन की प्रतिमा - मंडी हाउस गोल चक्कर के एक कोने पर मंडी हाउस की तरफ अलेक्जेंडर पुश्किन की आदमकद प्रतिमा नजर आती है। पुश्किन को रूसी भाषा के छायावादी कवियों में से एक थे। उन्हें रूसी का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। साथ ही उन्हें आधुनिक रूसी कविता का संस्थापक भी माना जाता है। उनका जीवन काल सिर्फ 38 साल का ही रहा।


लोकमान्य  तिलक की प्रतिमा -  आपने दिल्ली  में  लोकमान्य  बालगंगा धर तिलक की प्रतिमा तो देखी होगी। यह प्रतिमा देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पास है।   आईटीओ से प्रगति मैदान की तरफ चलने पर ये प्रतिमा आपकी आंखों के सामने नजर आती है। 



 संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाले और सन 1977 में देश में तख्ता पलट के नायक को दिल्ली  में आपने  कहां  देखा है। लोकनायक दिल्ली में जय प्रकाश नारायण  की प्रतिमा दिल्ली गेट के पास देखी जा सकती है।  यहीं पर पास में उनके नाम पर एलएनजेपी अस्पताल भी है।   पहले  इस  अस्पताल  को इर्विन  हॉस्पीटल के नाम से जाना जाता था।  पर  सन 1977 में  आई जनता सरकार ने इसका नाम बदल डाला। 

इसी पार्क में जय प्रकाश नारायण के  बगल में  और महान देशभक्त  की प्रतिमा लगाई गई है। थोड़ा सा उत्तर की ओर चलें तो श्यामा  प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा  दिखाई देती है। यह  फिरोजशाह कोटला मैदान की बाउंड्री वाल के बिल्कुल पास है।  इस हरे भरे पार्क में दोपहर में काफी लोग टाइम पास करने पहुंचते हैं।  

क्या आपको पता है दिल्ली में देश के दूसरे प्रधानमंत्री  लाल बहादुर शास्त्री की  प्रतिमा कहां है। मुझे उनकी प्रतिमा दिखाई दे जाती है   सीजीओ कांप्लेक्स के पास।  दयाल सिंह कालेज से जब  जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम की ओर बढ़ते हैं तो  बायीं तरफ लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा नजर आती है।  यहां सीआरपीएफ के दफ्तर के बाहर उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 

दांडी मार्च की याद  11 मूर्ति -  दांडी मार्च की याद में दिल्ली में ग्यारह मूर्ति प्रतिमा बनाई गई है। यह चाणक्यपुरी में सरदार पटेल मार्ग और मदर टेरेसा क्रिसेंट के चौराहे पर स्थित है।   पटेल मार्ग की ओर जाते हुए अक्सर  इस प्रतिमा पर लोगों की नजर चली जाती है। 


इस मूर्ति में  सबसे आगे  बापू लाठी लिए हुए चल रहे हैं। उनका अनुसरण कर रहे हैं दांडी मार्च के कुछ और नायक। इन नायकों में एक महिला और सभी धर्मों के लोग हैं। यह अत्यंत कलात्मक प्रतिमा है।   इसे देखने  के लिए राह चलते  लोग रुक जाते हैं। इस मूर्ति के शिल्पकार देवी प्रसाद राय चौधरी ( 1899-1975 ) हैं।  यह नमक सत्याग्रह की याद दिलाता है। 


-- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  
(  STATUE IN DELHI, SARDAR PATEL, LAL BAHADUR SASHTRI,  PUSHKIN, 11 MURTI) 

Saturday, April 24, 2021

क्या संभव है जीरो बजट मे ट्रैवेल

 

क्या शून्य बजट में यात्राएं हो सकती हैं। यह सवाल कई सैर सपाटा से जुड़े हुए साथी पूछ रहे हैं। कुछ का जवाब हां में है तो कुछ का जवाब ना में है। पर मुझे लगता है कि बिल्कुल की जा सकती है जीरो बजट यात्राएं। एक मित्र ने  सवाल किया तो मैंने उत्तर  कुछ यूं दिया - ऐसी यात्राओं के लिए आपको खुद को ईश्वर के हवाले कर देना होगा। 


इसका मतलब कुछ यूं समझिए कि आपकी यात्रा का खर्च दूसरे उठाएं। मांग कर खाएं, लिफ्ट लेकर यात्राएं करें। स्वाभिमान को मार कर भिक्षाटन कर चलते रहें। इससे मन निर्मल होगा। आत्मा पवित्र होगी। और आप धीरे धीरे परिव्राजक बनते जाएंगे। साधुत्व को प्राप्त होंगे। संत ज्ञान मिल जाएगा।


आधुनिक युग में एक शब्द चल रहा है हिचहाइकिंग। मतलब लिफ्ट मांग कर घूमना।  देश में विदेश में कई ऐसे लोग हैं जो हिचहाइकिंग करके घूम रहे हैं। वे लोग सड़क पर खड़े होकर लिफ्ट मांगते हैं। जाहिर कई बार आपको हो सकता है कि घंटों तक लिफ्ट नहीं मिले। 


वैसे देश-विदेश में अपनी कुछ यात्राओं में हमने भी लिफ्ट मांगी हैं। कुछ ऐसे मौके आए जब कोई सार्वजनिक वाहन नहीं मिल रहा था तो ऐसे वक्त में लिफ्ट मांगना भी काम आ गया। पर हिचहाइकिंग भी एक तरह से भिक्षाटन करके घूमने जैसा ही है। कई बार राह चलते जान पहचान  हो जाने पर भी लोग लिफ्ट दे  देते हैं। जैसे भूटान की राजधानी थिंपू में एक इंजीनियर ने हमें अपनी कार में लिफ्ट दे दी थी।


वैसे कुछ समझदार लोग  जीरो बजट ट्रैवेल का  मतलब  ये  लगाते हैं कि  बहुत कम खर्चे में घूमना। इतना ही खर्च करना जितना आप घर में रहने के दौरान  खर्च करते हैं।   जैसे आप घर में रहते हैं तभी आपका खाना नास्ता, मकान किराया  , बिजली बिल आदि में तो खर्च होता ही है।  तो यात्रा में भी उतना ही खर्च करें।

मतलब यात्रा के दौरान आप 200 से 300 रुपये के होटल धर्मशाला में रहने की आदत डालें। कहीं अगर मुफ्त में रहने का मौका मिल जाए तो इसका लाभ उठाएं । किसी शहर में दोस्त रिश्तेदार रहते हों तो उनके घर को ठिकाना बनाएं। 


इस तरह खाने नास्ते में भी बजट कम रखें।  जैसे  गुरुद्वारा या मंदिरों के लंगर में भोजन कर लें। बडे  स्टार होटल में खाने की  जगह स्ट्रीट फूड का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते रहें।  खाने के लिए कई संस्थाओं या मंदिरों की रियायती कैंटीन का भी लाभ उठाएं।  इस तरह आप कम खर्च में  सफर जारी रख सकते हैं।


छात्र जीवन में इस तरह का जीरो बजट ट्रैवल का प्लान हमने कई बार बनाया था।   मैं एक परीक्षा देने  भोपाल गया तब अपने मित्र प्रिय अभिषेक अज्ञानी के घर कुछ दिन रुका। इस दौरान रोज लोकल बसों से भोपाल की सैर करता था। इसमें मेरा बहुत कम खर्च आया पर  पूरा भोपाल देख डाला। 


किसी नए शहर में घूमने के लिए अगर छोटा शहर  हो पैदल पैदल ही घूमिए।  अगर बड़ा शहर है तो लोकल बसों का यानी सार्वजनिक परिवहन का सहारा लें।   अगर बसों का दिन भर का पास बनता हो तो उसका लाभ उठाएं। इससे  आप कम खर्च में पूरा शहर देख लेंगें।  दिल्ली में महज 50 रुपये का पास खरीदकर आप दिन भर दिल्ली  में घूम सकते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 

( ZIRO BUDGET TRAVEL ) 

Thursday, April 22, 2021

दिल्ली में भी है त्रिपोलिया गेट


कई शहरों में ऐतिहासिक त्रिपोलिया गेट दिखाई देते हैं।  जयपुर में  पटना में इस तरह का नाम मिलता है। दिल्ली में भी इस तरह का त्रिपोलिया गेट मौजूद है। उत्तर पश्चिमी दिल्ली में शक्तिनगर से रूप नगर होते हुए गुड़ मंडी की तरफ जाते हुए ये ऐतिहासिक द्वार नजर आते हैं। यहां पर हमें 200 मीटर के अंतराल पर दो त्रिपोलिया गेट नजर आते हैं।


 त्रिपोलिया गेट दिल्ली के ऐतिहासिक द्वारों में से एक है।   यह त्रिपोलिया गेट अठारहवीं सदी में बना था। 1728-29 में बनवाया गया था। इस पर जो अभिलेख है उससे पता चलता है कि नाजिर महलदार खां ने इसका निर्माण कराया था।    महलदार खान के बारे में तथ्य  यह है कि वह मुहम्मद शाह के शासन काल में वजीर हुआ करता था। 

एक सराय भी थी - दिल्ली करनाल रोड से सब्जी मंडी को जोड़ने वाली सड़क पर एक सराय भी हुआ थी। यह गुड़ की सराय के नाम से जानी जाती थी। इसे मुगल काल में बनवाया गया था। यह ज्यादातर ईटों से निर्मित है। 


घोड़ों का विश्राम गृह - दरअसल त्रिपोलिया गेट का इलाका  मुगलकाल में व्यापारियों के आवाजाही का बड़ा केंद्र हुआ करता था। त्रिपोलिया गेट के पास इससे सटा हुआ एक क्षतिग्रस्त स्मारक नजर आता है। इसे सैनिकों व घोड़ों के विश्राम के लिए बनवाया गया था।


 त्रिपोलिया गेट आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) संरक्षित इमारत है। तेज ट्रैफिक के कारण इस गेट को नुकसान हो रहा था। रात में बड़ी गाड़ियों की वजह से गेट के मेहराब टूट जा रहे थे। इस कारण इसके दो गेट से ट्रैफिक को रोका गया है।


इस  त्रिपोलिया गेट के पास सड़क तो काफी चौड़ी है। पर इसके  आसपास कई  बैंड बाजा कंपनियों के दफ्तर देखे जा सकते हैं। आसपास के लोग लोग यहां पर शादियों में बैंड बाजा बुकिंग के लिए आते हैं। यहां  से थोड़ा आगे बढ़ें तो गुरुद्वारा  नानक प्याउ पहुंच सकते हैं।



पर दिल्ली  का ये ऐतिहासिक दरवाजा उपेक्षा का शिकार है। इसके तीन गेट में  से एक से ही आवाजाही  होती है। बाकी के दो दरवाजों के आसपास अतिक्रमण होने के कारण भी वाहन नहीं जा पाते। 
- विद्युत  प्रकाश  मौर्य  vidyutp@gmail.com
(TRIPOLIA GATE, DELHI, RANA PRATAP BAG, GUR KI MANDI)

Tuesday, April 20, 2021

एक दिन यादों शुमार हो जाएगा एंबेस्डर


आजकल भले कार खरीदने जाएं तो आपके पास एक दर्जन से ज्यादा कंपनियों के सैकड़ों मॉडल विकल्प में मौजूद हैं, पर अस्सी के दशक में कार मतलब एंबेस्डर होता था। तब मारूति या कोई और कंपनी भारत में नहीं आई थी। एंबेस्डर या प्रिमियर पद्मिनी ही विकल्प थे कार खरीदने वालों के लिए। पर एंबेस्डर को शाही सवारी माना जाता था।


सभी सरकारी महकमों के अधिकारियों के पास यही कार हुआ करती थी। चाहे किराये की टैक्सी हो या फिर शादी में दुल्हे की बारात सजनी हो सब जगह एंबेस्डर ही दिखाई देती थी। मेड इन इंडिया    कार   अंबेसडर को 1960 और 1970 के दशक में स्टेट्स सिंबल के रूप में देखा जाता था। इस दौर के तमाम लोगों का  इस कार के साथ  कोई भावनात्मक  जुड़ाव जरूर रहा है।  कई संभ्रांत लोग सफेद रंग की एंबेस्डर को खास तौर पर पसंद करते थे।


अब सड़कों पर,  रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट पर आपको सिर्फ पुरानी एंबेस्डर कारें दिखाई दे जाती हैं, क्योंकि इसका निर्माण बंद हो चुका है। पर आपको पता है कि अंबेसडर ने भारत की पहली डीजल   कार    भी पेश की थी।  यह एक 1800  सीसी की कार हुआ करती  थी।  ताकत की बात करें तो  आजकल की   एंट्री लेवर की कारों से ज्यादा  थी। पर  पेट्रोल भी कुछ ज्यादा पीती थी। 


शुरुआत की बात करें तो साल 1958 से लेकर 2014 तक   एंबेसडर   का देश में उत्पादन हुआ। हिन्द मोटर्स के हावड़ा के पास उत्तरपाड़ा  स्थित प्लांट से इसका उत्पादन होता था। अब यह कंपनी बंद हो चुकी है।  साल 2017 में  इसका ब्रांड नेम भी  फ्रांसिसी कंपनी पीएसए  समूह को बेच दिया गया।


पर  साल 2034 तक  आपको सड़कों पर एंबेस्डर दौड़ती हुई  दिखाई दे सकती है।  उत्पादन के आखिरी  साल के 20 साल बाद  तक यह सड़कों पर दौड़ सकती है। इसके बाद तो इसे कबाड़ करना पड़ेगा। फिर  कुछ सालों बाद यह  विंटाज कारों  की सूची में शामिल  हो जाएगी।



 एंबेसडर कार जब से अस्तित्व में आई तब से उसका डिजाइन लगभग एक जैसा ही रहा।  इसके मॉडल में ज्यादा  आर एंड डी (शोध ) नहीं हुआ। यह कारों में सीडान  किस्म की है। इसके पीछे की डिग्गी में सामान रखने के लिए काफी जगह है। इंजन  और ड्राईवर के बीच  भी  अच्छी जगह होने के कारण यह हादसों में भी ज्यादा सुरक्षित वाहन मानी जाती रही है। 

 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( HIND MOTERS, BIRLA GROUP,  AMBASSADOR CAR) 



Sunday, April 18, 2021

दिल्ली का तिलिस्मी किला-मालचा महल

 


दिल्ली के रिज यानी वन क्षेत्र में स्थित मालचा महल किसी तिलिस्म किले जैसा प्रतीत होता है। वैसे तो यह फिरोजशाह तुगलक द्वारा निर्मित चार शिकार महलों में से एक हैपर यहां पहुंचने का रास्ता थोड़ा मुश्किल है। दिल्ली के सबसे पॉश इलाके चाणक्यापुरी में एक सड़क का मार्ग है मालचा मार्ग। यह सड़क सरदार पटेल मार्ग में आकर मिल जाती है। यहीं पर बापूधाम बस स्टाप है। और एक कोने पर हिमाचल सदन है।


मालचा मार्ग को पार करने के बाद दूसरी तरफ आपको जंगल दिखाई देता है। इस जंगल में एक रास्ता जाता हुआ दिखाई देता है। इस रास्ते पर एक बोर्ड लगा है। दिल्ली भू  केंद्र यानी अर्थ स्टेशन का। इसी सड़क पर चलते जाएं। आप अपनी बाइक या साइकिल से अंदर जा सकते हैं। अगर समूह में हैं तो पैदल भी जा सकते हैं। अकेले पैदल जाना ठीक नहीं होगा। क्योंकि रास्ते में बंदरों का आतंक है।  मैं  अपनी बाइक  से जा रहा हूं अकेला।  रविवार की दोपहर का  समय है। 


एक किलोमीटर चलने के बाद बायीं और मुड़ते रास्ते में भू केंद्र दिखाई देता है पर मालचा महल नहीं दिखता। मैं भू केंद्र पर तैनात संतरी के पास जाकर मालचा महल के बारे में पूछता हूं। वह बताते हैं कि आप वापस जाइए। सौ मीटर पीछे एक बैरिकेड दिखाई देगा। उसी के अंदर घुस जाइए। थोड़ी दूर चलिए आप अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे।


वाकई रास्ते को बैरिकेड लगाकर बंद क्यों किया गया है समझ में नहीं आया। पर इसके अंदर चलकर तकरीबन सौ मीटर ही चलने पर मालचा महल नजर आने लगा। 


तो हम फिरोजशाह तुगलक की चौथी शिकारगाह में पहुंच गए हैं जो अब भी जंगल में ही हैं। उनके तीन शिकारगाह में एक बाडा हिंदुराव अस्पताल में है, दूसरा भूली भटियारी का महल करोलबाग के पास है तो तीसरा कुशक महल तीन मूर्ति भवन के पास है। फिरोजशाह तुगलक ( 1309-1388) ने इसका निर्माण सन 1325 के आसपास करवाया था।

मालचा महल बाहर से भले ही विरान और टूटी फूटी इमारत नजर आती हो पर अंदर से यह काफी बुलंद है। इसकी आंतरिक बनावट अभी भी मजबूत दिखाई देती है। सारे कमरे अच्छी हालत में है। बीच विशाल हॉल है। चारों तरफ से कमरे में रोशनी आने के लिए झरोखे बने हुए हैं। इमारत का निर्माण एक ऊंचे चौबारे पर किया गया है। अब सीढ़ियों से चढ़कर इसकी छत पर चलिए। इसकी छत अभी भी बहुत अच्छे हालत में है। छत से दिल्ली का बडा ही भव्य नजारा दिखाई देता है। चारों तरफ हरे भरे जंगल है। नजर और थोड़ी दूर ले जाएं तो राष्ट्रपति भवन और चाणक्यपुरी की विशाल इमारतें नजर आती हैं।


बेगम विलायत महल का कब्जा रहा – 1985 में इसमें लखनऊ नवाब वाजिद अली शाह के खानदान की बेगम विलायत महल कब्जा करके रहने लगीं। यहां तक न बिजली पहुंची थी न पानी। यहीं पर एक दिन उनका निधन हो गया। मालचा महल में आने से पहले विलायत महल ने लंबे समय तक नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक का वीआईपी वेटिंग रूम कब्जा कर रखा था। पर साल 2017 से इस महल में कोई नहीं रहता। विलायत महल के खानदान के अंतिम व्यक्ति की भी मौत हो चुकी है। जब तक विलायत महल और उनके बेटे प्रिंस अली राजा यहां रहे किसी भी आम आदमी को यहां आने की इजाजत नहीं थी। पर अब लोग यहां पहुंचने लगे हैं।


कुछ लोग मालचा महल को भुतहा मानते हैं तो कुछ इसे दिल्ली  की सबसे डरावनी जगह कहते हैं। पर अभी तक यह महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कब्जे में नहीं है। इसलिए इसका रखरखाव नहीं होता। यहां पहुंचने के लिए कोई संकेतक नहीं लगाए गए हैं। रास्ते को बंद रखा गया है। पर हर रविवार को कुछ उत्साही युवा इस महल को देखने के लिए पहुंच ही जाते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 


( MALCHA MAHAL, DELHI, CHANKYAPURI, FOREST, FIROJSHAH TUGLAK )