Thursday, March 25, 2021

नारायणी की जलधारा में निवास करते हैं भगवान विष्णु



इस बार की बिहार यात्रा में मैंने कई बार नारायणी नदी को पार किया। रेल से और सड़क मार्ग से। हाजीपुर और सोनपुर के बीच नारायणी पर ऐतिहासिक रेल पुल है। मुजफ्फरपुर और गोपालगंज के बीच डुमरियाघाट में एनएच 27 पर सड़क पुल है। अब वैशाली के पास रेवाघाट में भी एक नया पुल बन चुका है। इससे वैशाली का छपरा से संपर्क आसान हो गया है। इसी नारायणी नदी के तट पर मेरे बचपन के कई साल गुजरे हैं।


वास्तव में नारायणी भगवान विष्णु यानी नारायण की प्रेयसी है। गंडक नदी का दूसरा नाम नारायणी है और यह तुलसी का स्वरूप भी मानी जाती है। कहा जाता है नारायणी नदी में स्वयं नारायण यानी भगवान विष्णु शिला के रुप में निवास रहते हैं। गंडक घाटी के इतिहास पर शोध में अपना जीवन खपा देने वाले पत्रकार तेज प्रताप सिंह चौहान कहते थे - गंडक  नदी   के पानी में विशेष प्रकार के काले पत्थर मिलते हैं। इन पर चक्र, गदा आदि के निशान दिखाई देते हैं।


 हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, नारायणी में पाए जाने वाले यही पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप हैं। इन्हें    शालिग्राम   शिला के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। नारायणी नदी में शालिग्राम शिला काले रंग में पाया जाता है। पर कई बार यह सफेद, नीले और ज्योति स्वरुप में भी यह मिलते हैं। नेपाल में तो इस नदी को सदानीरा और शालीग्रामी नाम से पुकारा जाता है।


नारायणी नदी का उदगम काली गंडकी के रूप में नेपाल से आगे दक्षिण तिब्बत के पहाड़ों से होता है। कुल 814 किलोमीटर का सफर तय करके यह बिहार में सोनपुर और हाजीपुर के बीच में गंगा नदी में जाकर मिल जाती है। बिहार में यह पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिले से होकर गुजरती है। नेपाल में त्रिशूली या त्रिशूल गंगा इसकी प्रमुख सहायक नदी है।


भारतीय सीमा तक गंडकी को नारायणी के नाम से जाना जाता है। पर भारत में इसका अधिकृत नाम गंडक है। नारायणी नेपाल की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। महाभारत में भी नारायणी नदी का उल्लेख मिलता है।

तुलसी और जलंदर की कथा -  शिवपुराण के अनुसार दैत्यों के राजा जलंदर की पत्नी तुलसी थी। जलंदर का जन्म भगवान शिव के क्रोधाग्नि से हुआ था। वह शक्तिशाली योद्धा था। जलंदर ने अपने शक्ति के बलबूते पर देवताओं के स्वर्ग पर अधिपत्य स्थापित किया। उसे पराजित करना देवताओं के लिए असंभव था। असहाय देवता मदद के लिए भगवान विष्णु के पास गए। पर जलंदर भगवान शिव के अंश होने के कारण भगवान विष्णु उनका वध नहीं कर सकते थे। भगवान विष्णु ने उन्हें शिवजी के पास जाने की सलाह दी। 


शिवजी मान गए। पर जलंदर को हारने में सबसे बड़ी मुश्किल उसकी पत्नी तुलसी। तुलसी महान पतिव्रता और भगवान विष्णु की भक्त थी। तब भगवान विष्णु ने छल से तुलसी का पतिव्रत भंग कर दिया। इसके कारण जलंदर को हराना आसान हो गया। मगर जब यह बात तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। शिवपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने कहा, तुम धरती पर गंडकी नदी के रूप में बहोगी और मैं शालिग्राम शिला के रूप में नदी की जलधारा में निवास करूंगा। हालांकि आजकल गंडकी में शालिग्राम शिलाएं नहीं मिलती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि नेपाल में अभी भी मिलती हैं।


एक और कथा के अनुसार तुलसी ने नारायणी भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थीं, जिसके फलस्वरूप भगवान ने उसे विवाह का वरदान दिया था। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन शालिग्राम शिला और तुलसी के पौधा का विवाह करवाने की परंपरा है। तो जीवनदायिनी, सदानीरा नारायणी नदी को मेरा एक बार फिर प्रणाम।


गंडक परियोजना - 1959 में शुरू हुई गंडक परियोजना बिहार और उत्तर प्रदेश की संयुक्त नदी घाटी परियोजना है। भारत-नेपाल समझौते के तहत इससे नेपाल को भी लाभ हुआ है। इस परियोजना में गंडक नदी पर त्रिवेणी नहर हेड रेगुलेटर के नीचे बिहार के बाल्मीकि नगर मे बैराज बनाया गया है। इस बैराज से चार नहरें निकली हैं। इसमें से दो नहरें भारत में और दो नहर नेपाल में हैं। गंडक की नहरों से चंपारण और उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में सिंचाई होती है। यहां 15 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी होता है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( GANDAK RIVER, NARAYANI, HAJIPUR, GANGA ) 



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