Sunday, March 21, 2021

बुनियादी विद्यालय कन्हौली - मेरा पहला स्कूल

 


जंगल का राजा सिंह जब पीछे मुड़कर देखता है तो उसे सिंहावलोकन कहते हैं। मेरे जैसा आम आदमी जब पीछे मुड़कर देखे तो यह अतीत की यादों में खो जाने जैसा है। इनमें ढेर सारी यादें ऐसी हैं जो हमेशा साथ-साथ चलती हैं। इन्हीं यादों में एक है मेरा पहला स्कूल, बुनियादी विद्यालय, कन्हौली। दशकों बाद आज उस स्कूल के दरो-दीवार से रुबरू होंगे।

महुआ का गांधी चौक अब यहां छोटे मॉल बन गए हैं

चकफतह से ठंडी हवाओं के बीच चलते हुए रास्ते में मधौल और पकड़ी जैसे गांव आए। मैं चार किलोमीटर चलकर मैं महुआ पहुंच गया। महुआ वैशाली जिले का अनुमंडल शहर है। कभी इस बाजार में हमारा अक्सर आना होता था। पर अब गांधी चौक की सूरत बदल गई है। मिनी मॉल जैसे मार्केट बन गए हैं। आम्रपाली सिनेमा घर, शारदा पुस्तक भवन और लक्ष्मी पुस्तकालय जैसी दुकाने कहीं नजर नहीं आई। 

महुआ बाजार के बीच से गुजरती बाया नदी 

बाया नदी का पुल पार करते हुए उसका ठहरा हुआ गंदला पानी दिखाई दिया। हमें सिर्फ गंगा ही नहीं बल्कि इन छोटी छोटी नदियों को भी स्वच्छ करने की जरूरत है। ये हमारा कचरा ढोने के लिए नहीं बह रही हैं। आगे चलने पर वैशाली विद्यालय नजर आया जो इस इलाके का पुराना हाई स्कूल है। मंगरू चौक के बाद नहर का पुल कब पार कर गया पता नहीं चला। महुआ से कन्हौली की दूरी सिर्फ चार किलोमीटर है।  

वही कन्हौली जहां मेरे बचपन के छह साल गुजरे हैं। मेरे पिताजी यहां वैशाली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के शाखा प्रबंधक रहे। 1978 से से 1983 तक। बाजार में बम शंकर चौधरी के मकान में बैंक की शाखा हुआ करती थी। वह भवन आज भी उसी तरह दिखाई दे रहा है। हालांकि बैंक की शाखा सामने वाले भवन में शिफ्ट हो गई है।


इस बैंक वाले भवन में ही 1978 से 1980 के बीच में पिताजी के साथ रहता था। यहां पर हमारे मकान मालिक के छोटे बेटे संजय कुमार जायसवाल हमारे सहपाठी हुआ करते थे। मैंने बाइक रोककर उनकी तलाश की। नीचे उनकी कपड़े की दुकान है – बाला जी वस्त्रालय। नाम लेने पर वे मुझे पहचान गए। छोटी सी पर यादगार मुलाकात रही। कोई 42 साल बाद  हमलोग मिले थे।


इसके बाद मैं आगे चल पड़ा। कन्हौली में उस भवन को भी देखा जिसे ड्योढ़ी कहा जाता था। शुक्ला परिवार के इस भवन में भी हमलोग करीब पांच साल रहे। हालांकि वह विशाल भवन अब जर्जर हो गया है। उसमें अब कोई नहीं रहता।

वह घर जहां हमारा परिवार छह साल तक रहा। 

कन्हौली बाजार में शुक्ला परिवार द्वारा बनवाया गया श्री रामजानकी मंदिर है। इस मंदिर की बाहरी दीवारों को पेंट कर दिया गया। अब मंदिर बड़ा सुंदर लग रहा है। इसके ठीक बगल में खाली मैदान पर पेठिया यानी साप्ताहिक बाजार लगता है। रविवार, मंगलवार और शुक्रवार को। हमलोग इस बाजार सब्जियां खरीदने आया करते थे।



इसी बाजार के बगल में मेरा स्कूल हुआ करता था। राजकीय उच्च बुनियादी विद्यालय। यहां मेरा चौथी कक्षा में विधिवत नामांकन हुआ था। इससे पहले मैंने जिन स्कूलों में पढ़ाई की वहां मेरा विधिवत कोई नामांकन नहीं हुआ था। स्कूल का नाम बुनियादी विद्यालय इसलिए है कि गांधी जी की प्रेरणा से बिहार में ऐसे स्कूलों स्थापना हुई थी जहां किताबी शिक्षा के साथ करघा चलाना और दूसरी व्यवहारिक किस्म की शिक्षा दी जाए। 


पर हमारे समय में भी व्यवहारिक शिक्षा बंद हो चुकी थी। हमारे समय में स्कूल के प्रधानाध्यापक हुआ करके थे बुद्धदेव शरण। हमारे दूसरे शिक्षक थे – अवधेश सिंह, चंद्रदीप सिंह, देवेंद्र राय, रामानंद सिंह, राम प्रवेश सिंह। इस स्कूल से मेरी ढेर सारी यादें जुड़ी है। 


आज कोरोना काल में स्कूल बंद है। स्कूल का नया भवन बना जरूर है। पर यह भी खंडहर जैसा दिखाई दे रहा है। रंग रोगन के अभाव में इमारत उदास सी  लग रही है। स्कूल को इस हाल में देखकर मुझे सुखद अनुभूति नहीं हुई। इस स्कूल में मेरे सहपाठी थे – चंद्र किशोर पासवान, उमेश पासवान, दिलीप पासवान, सीताराम पासवान, अरुण रजक,  मुकेश सिंह, अशोक सिंह। उन सबसे मेरा अब संपर्क नहीं है। पर चौथी, पांचवी और छठी कक्षा की ढेर सारी यादें हैं हमारे साथ।  यहां आकर हमारे प्रधानाध्यापक बुद्धदेव शरण,  शिक्षक अवधेश सिंह, चंद्रदीप सिंह की  याद आई।  तो इन यादों के साथ अब आगे चलें।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

( ( KANHAULI, VAISHALI, MAHUA, BASIC SCHOOL ) 



6 comments:

  1. Sad to see the condition of the school.

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  2. अतीत की यादों में लौटना रोचक रहा। विद्यालय की हालत सचमुच दयनीय है। मुझे एक पल को लगा कि यह पुरानी इमारत होगी और नई कहीं और होगी लेकिन जब पता लगा कि अभी भी यहीं कक्षाएं होती हैं तो हैरत हुई। उम्मीद है इमारत का रंग रूप जल्द ही बदलेगा।

    कुछ दिनों पहले आपने संस्मरणों की श्रृंखला शुरू की थी। वह पढ़ना भी रोचक रहता था। इस विद्यालय से जुड़े कुछ रोचक किस्से आपके जहन में हों तो जरूर साझा कीजियेगा। बचपन की शरारतों को हम पाठक भी पढ़ना चाहेंगे।

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    1. हैं बहुत सी लिखूंगा

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