Friday, March 19, 2021

तंबाकू की खेती और चकफतह गांव की ओर


वैशाली जिले की सड़कों पर चलते हुए सड़क किनारे खेतों में हरे हरे चौड़े पत्ते नजर आ रहे हैं। मैं इन्हें बचपन से पहचानता हूं। ये तंबाकू के पौधे हैं। वैशाली जिले में बड़े पैमाने पर तंबाकू की खेती होती है।   तंबाकू वैशाली जिले की प्रमुख नकदी फसल है। 


वैसे तंबाकू की खेती समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिले में भी की जाती है। पर वैशाली जिले में अच्छी जमीन में तंबाकू की खेती होती है। यह कम समय और कम लागात में तैयार होने वाली फसल है। इसके हरे पत्तों को काटकर खुले मैदान में सुखाया जाता है। इससे खैनी बनती है। गुणवत्ता के हिसाब से यह 70 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है। 


तंबाकू के पत्तों का इस्तेमाल बीडी और सिगरेट बनाने में भी होता है। इसकी जड़ों से हुक्के में इस्तेमाल होने वाला मसाला तैयार किया जाता है। पिछले दो सालों से बिहार सरकार तंबाकू की खेती और बिक्री पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है। हालांकि तंबाकू किसान इसका विरोध कर रहे हैं।

मैं वैशाली से  महुआ के पास स्थित चकफतह गांव जाना चाहता हूं।  चकफतह मेरे चाचाजी सुशील कुमार सिन्हा का गांव हैं। उनके गांव में सालों पहले कई बार जाना हुआ है। उनका गांव महुआ बाजार से 4 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है।  हर बार मैं उनके गांव महुआ से ही गया हूं। पर इस बार जाना है हाजीपुर मुजफ्फरपुर मार्ग पर स्थित भगवानपुर बाजार से। भगवानपुर से उनका गांव पूरब की तरफ पड़ेगा। अभी मैं वैशाली में हूं तो मुझे पहले भगवानपुर जाना है। 


स्थानीय लोगों से मैंने वैशाली से भगवानपुर जाने का रास्ता पूछा। मेरे पास बाइक है तो मैं कोई भी रास्ता नाप सकता हूं। वैशाली से एक रास्ता है बखरा, बेलसर होकर जो मुझे गोरौल के आसपास पहुंचा देगा। वहां से लौटकर भगवानपुर आना होगा। दूसरा रास्ता प्रतापटाड़ होकर भगवानपुर जाने का है। पर कई लोगों ने सलाह दी कि आप लालगंज के तीनपुलवा चौक जाएं। वहां से सीधा पूरब की ओर जाने वाला रास्ता भगवानपुर पहुंचा देगा। लोगों ने कहा ये सड़क सीधी और अच्छी है। 


मैंने लालगंज वाला रास्ता ही अपनाया। तीनपुलवा से पूरब की तरफ चल पड़ा। ये सड़क निर्माणाधीन है। इसे कंक्रीट रोड बनाया जा रहा है। लालगंज से आगे बढ़ते ही रेलवे लाइन पार करके और आगे बढ़ा। तस्दीक करने के लिए स्थानीय लोगों से पूछ लिया कि यह रास्ता भगवानपुर जा रहा है। मैं सही जा रहा हूं। रास्ते में सहथा नामक गांव आया। यह मेरे बचपन के दोस्त पंकज कुमार पप्पू का गांव है। हालांकि अब वे इस गांव में नहीं रहते। इस सड़क ने भगवानपुर बाजार से दक्षिण की तरफ हाजीपुर मुजफ्फरपुर नेशनल हाईवे में मिला दिया। 


यहां से मैं भगवानपुर रेलवे स्टेशन के उत्तर की तरफ रेलवे क्रासिंग पर पहुंचा पूर्वी तरफ जाने के लिए। पर रेलवे क्रॉसिंग बंद हो चुका था। गेटमैन ने कहा, क्रॉसिंग खराब होकर लॉक हो गया है। खुलने में कई घंटे लगेगें। पता चला दो किलोमीटर दक्षिण दूसरी क्रॉसिंग है। उस क्रॉसिंग से सड़क पार कर मैं भगवानपुर के पूर्वी बाजार में आ गया हूं। सड़क पर आगे बढ़ते हुए अगला  गांव  आया रहसा।  इस गांव के एक सज्जन हुआ करते थे  केडी सिंह। उनका हावड़ा में मछली का कारोबार था।


इस बीच सुशील चाचा जी का फोन आया। उन्होंने गांव तक पहुंचने के सड़क मार्ग समझाया। भगवानपुर से मुझे मुर्गिया चक पहुंचना है। वहां से उत्तर की तरफ जाकर बाया नदी क पुल पार करके दाहिनी ओर मुड़ कर पिरोई गांव। पिरोई बहुत बड़ा गांव है। इस गांव में कई चौक हैं। पिरोई में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि कबीर चौक से उत्तर की तरफ वाली सड़क पर चले वहां से आप चकफतह गांव पहुंच जाएंगे। 



चकफतह के बगल में प्रेमराज नामक बड़ा गांव है। ग्रामीण सड़क के मील के पत्थर पर प्रेमराज का नाम अंकित है। तो शाम ढलने से पहले  मैं चकफतह गांव में पहुंच गया हूं। एक स्थानीय व्यक्ति से मैं सुशील कुमार सिन्हा का घर पूछता हूं। उसने कहा, आपको मैनेजर साहब के घर जाना है। हां, वे बैंक के अवकाश प्राप्त मैनेजर हैं।


उसने कहा इस एक पैरिया रास्ता से चले जाएं। उनके दरवाजे से थोड़ा पहले पहुंच जाएंगे। उनके घर के ठीक पहले वाले घर में भोज हो रहा होगा। ये एक पैरिया रास्ता क्या होता है। वैशाली जिले में खेत के बीच से पैदल, साइकिल और बाइक से चलने वाले रास्ते बना देते हैं उसे एक पैरिया रास्ता कहते हैं। तो मैं चाचाजी के घर के दरवाजे पर पहुंच गया हूं।


चकफतह गांव में कोई तीन दशक बाद पहुंचा हूं। छात्र जीवन में यहां कई बार आना हुआ था।  मैं मुजफ्फरपुर में सुशील चाचा जी के मकान  शारदा भवन में तीन साल तक रहा।  कई साल बाद मिलना हुआ तो ढेर सारी यादें निकल कर आईं अतीत के पिटारे से। धर्मनाथ चाचा जी की बारात जाने के लिए आया था संभवतः 1989 में। सुशील चाचा जी ने अपने गांव में पहला टीवी सेट खरीदा था तब मैं उनके साथ पटना से टीवी सेट लेकर पहुंचा था।


मुझे उनके घर में पुराना  ट्रांजिस्टर  शान से मुस्कुराता नजर आया, जो अब कहीं दिखाई नहीं देता। कभी मेरी सलाह पर चाचाजी ने अपने घर में लैंडलाइन फोन लगवाया था। वह उनके गांव का पहला फोन कनेक्शन था। उस फोन के लगने के बाद उनके घर सारा गांव आने लगा था देश भर से आने वाले अपने परिचितों की कॉल को सुनने के लिए।



आजकल तो फोन हर किसी के पास हो गया है पर नब्बे के दशक में गांव में फोन होना बड़ी बात  हुआ करती थी। वैसे सुशील चाचाजी शौकीन रहे हैं। वे अपने गांव का ही नहीं अपने इलाका पहला हीरो होंडा मोटरसाइकिल लेकर आए थे, दिल्ली से।  मैंने  भी उस सिल्वर रंग की  बाइक की सवारी की थी।  बल्कि उसे   चलाया भी था। 


अब चाचाजी बैंक से रिटायर होने के बाद गांव में मस्त जिंदगी जी रहे हैं। शहरों के छोटे-छोटे अपार्टमेंट की तुलना में उनका घर विशाल है। इन तीस सालों में काफी कुछ बदल चुका है। चाचा जी रिटायर हो गए हैं और बच्चे बड़े हो गए हैं। घर में तीसरी पीढ़ी के लोग आ चुके हैं। तो कई साल बाद गांव में सुबह-सुबह नीम के  दातून से  दांत साफ करने का मौका मिला  है। 


और ये रहे गोभी के फूल - चकफतह गांव में अगली सुबह काफी सर्द रही। सुबह घना कुहरा छाया रहा। थोड़ा कुहरा छंटने पर दस बजे के आसपास यहां से निकल सका। चाचा जी के घर के सामने वाले खेत में फूलगोभी लगी है। पर इस पूरे खेत को बीज के लिए छोड़ दिया गया है। तो इस गोभी में फूल आने लगे हैं। हो सकता है शहरों में रहने वाले लोगों ने गोभी के ऐसे पीले फूल न देखे हों। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com  

( CHAKFATAH, VAISHALI, FULGOBHI, FLOWER,  TOBACCO ) 

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