Monday, March 15, 2021

वर्धमान से महावीर - विश्व को दिया महान संदेश


देश में जैन समाज सबसे अमीर वर्ग में शुमार है।  वे लोग तमाम बड़े शहरों में कारोबारी हैं। दिल्ली के पास बड़ागांव, मेरठ के पास हस्तिनापुर में समाज ने अति विशाल जैन मंदिरों का निर्माण कराया है। पर वैशाली जो महावीर की जन्म स्थली है, पर यहां जैन धर्म के ज्यादा मंदिर दिखाई नहीं देते। 


इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं। महावीर स्वामी के जन्म स्थान के कारण यह जैन समाज का सबसे बड़ा तीर्थ होना चाहिए। कुछ लोग यह कहते हैं श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा में विवाद के कारण वैशाली में जैन समाज द्वारा ज्यादा विकास कार्य नहीं कराया गया।


महावीर की जन्मस्थली बासोकुंड मुजफ्फरपुर जिले के सरैया ब्लॉक में आता है। वैसे जिला विभाजन के समय ध्यान में रखना चाहिए था और कोल्हुआ और बासोकुंड को वैशाली जिले में ही रखना चाहिए था। अब जैन समाज के लोगों को चाहिए कि वैशाली में भगवान महावीर की जन्मस्थली में नए स्मारकों का निर्माण करें।


मैं देख रहा हूं कि भगवान महावीर की जन्मस्थली के परिसर में एक यात्री निवास का निर्माण कराया गया है। इसमें 24 कमरे हैं। शुल्क देकर भोजनालय  की सुविधा भी यहां पर उपलब्ध है। यह यात्री निवास देश भर से आने वाले जैन श्रद्धालुओं के लिए उलब्ध है।


अहिंसा शोध संस्थान - वैशाली में जैन समाज द्वारा प्राकृत जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान की स्थापना की गई है। यहां पर छात्र उच्च अध्ययन के लिए आते हैं। इस संस्थान की स्थापना साहू शांति प्रसाद जैन ने करवाई थी। संस्थान की स्थापना 1952 में हुई थी। यहां प्राकृत भाषा और जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर शोध किया जाता है।  


'वीर', 'अतिवीर' और 'सन्मति' - वैसे तो जैन धर्म के कुल 24 तीर्थकंर बताए जाते हैं। पर जैन धर्म वास्तविक रूप से बड़े स्तर पर पुष्पित और पल्लवित महावीर स्वामी के समय में ही हुआ। कहा जाता है कि महावीर स्वामी जब गर्भ में आए तो उनके पिता की संपत्ति में काफी वृद्धि हुई इसलिए उनके बचपन का नाम वर्धमान रखा गया। बचपन में उन्होंने अतिशय वीरता दिखाई इसलिए उनका दूसरा नाम महावीर पड़ा। महावीर को 'वीर', 'अतिवीर' और 'सन्मति' भी कहा जाता है।


जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत - समाज में हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव बढ़ गया था, उसी कालखंड में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया।  जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था।


अपनी जरूरतों को सीमित रखें - अपरिग्रह यानी अपनी जरूरतों को सीमित रखें। ऐसा करने से ही जीवन तनाव रहित और सुख-शांति से परिपूर्ण हो सकता है।   यह महावीर स्वामी का सबसे बड़ा संदेश है। एक लंगोटी तक का परिग्रह उन्हे स्वीकार नहीं था।


उनकी अन्य मुख्य शिक्षा अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और  क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार है। महावीर ने चातुर्याम धर्म में ब्रह्मचर्य जोड़कर पंच महाव्रत रूपी धर्म चलाया।

वैशाली में महावीर जयंती के मौके पर हर साल बड़ा आयोजन होता है। इस मौके पर यहां संगोष्ठी, मेला, प्रदर्शनी आदि का आयोजन होता है। पिछले कुछ सालों में यहां सैलानियों की आवाजाही में इजाफा हुआ है। न सिर्फ दूर से आने वाले पर्यटक बल्कि स्थानीय लोगों की आवाजाही भी बढ़ी है।

-           --- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

(  ( LORD MAHAVEERA, JAIN DHARMA, VAISHALI, BASO KUND, MUZAFFARPUR )  


 

 

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