Thursday, March 11, 2021

कोल्हुआ - यहां दिया था बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश



वैशाली का प्रमुख आकर्षण है कोल्हुआ ग्राम में स्थित अशोक स्तंभ औऱ विशाल स्तूप। बचपन में बिहार के स्कूलों में पढ़ाई करते हुए वैशाली कॉपी पर इस स्तूप की तस्वीर हुआ करती थी। पर कोल्हुआ की दूरी वैशाली से विश्व शांति स्तूप से छह किलोमीटर है।


मजे की बात की कोल्हुआ मुजफ्फरपुर जिले में पड़ता है। सन 1972  में 12 अक्तूबर को मुजफ्फरपुर से अलग होकर वैशाली जिला बना। तब वैशाली का स्वरूप किसी गांव जैसा था। जिले की सीमा पर स्थित वैशाली तो वैशाली जिले मे रह गया पर कोल्हुआ का अशोक स्तंभ और महावीर स्वामी की जन्म स्थली बासोकुंड मुजफ्फरपुर जिले में ही हैं।


 

ऑनलाइन खरीदें डिजिटल टिकट - कोल्हुआ के स्तूप को देखने के लिए टिकट खरीदना पड़ता है। यह वैशाली का एक मात्र स्मारक है जिस पर भारत के पुरातत्व विभाग की ओर से टिकट लगाया गया है। यहां के लिए 25 रुपये का टिकट है। पर यह टिकट अब नकद नहीं मिलता। ऑनलाइन खरीदने पर टिकट दर 20 रुपये ही है। क्यूआर कोड से स्कैन करने के बाद में मोबाइल के द्वारा ऑनलाइन तरीके से भुगतान करके डिजिटल टिकट प्राप्त किया जा सकता है। यह स्मारक सुबह से लेकर शाम तक खुला रहता है।


मुझे देखकर सुखद आश्चर्य हो रहा है कि कोल्हुआ में स्थानीय दर्शकों की अच्छी खासी भीड़ है। स्मारक के टिकट काउंटर से पहले छोटा सा बाजार सजा हुआ है। यहां पर वाहनों के लिए दो-तीन निजी पार्किंग भी बनी हुई है।


विशाल अशोक स्तंभ - कोल्हुआ के स्तूप का बौद्ध इतिहास में काफी महत्व है। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम संबोधन दिया था। इसकी याद में महान मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में विशाल सिंह स्‍तंभ का निर्माण करवाया था। लाल बलुआ पत्थर का यह एकल स्तंभ लगभग 11 मीटर ऊंचा है। इसके ऊपर सिंह की आदमकद आकृति है। 

यह लौरिया नंदन गढ़ के अशोक स्तंभ से मेल खाती है। यहां सिंह का मुंह उत्तर की तरफ है जिस ओर बुद्ध यहां से अंतिम यात्रा पर चले गए थे। इस स्तंभ के पास ही रामकुंड नामक छोटा सा तालाब भी है। इस जलाशय में स्नान घाट भी बना हुआ है।

मुख्य बौद्ध स्तूप – कोल्हुआ में एक स्थानीय वानर ने भगवान बुद्ध को शहद पेश किया था। इस घटना की याद में रामकुंड के एक ओर सुंदर सा विशाल आकार का स्तूप का निर्माण किया गया है। ईंट से बना यह स्तूप मूल रूप से मौर्य काल का बना हुआ है। बाद में गुप्त काल में इसे संवर्धित किया गया।   वैशाली में भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के कई वर्षावास व्यतीत किए थे। 


बुद्ध को वैशाली का वातावरण बहुत प्रिय था। यहीं पर बौद्ध संघ में भिक्षुणियों के प्रवेश की शुरुआत की गई थी। यह भी कहा जाता है कि कोल्हुआ में ही बुद्ध ने अपने शीघ्र संभावित परिनिर्वाण की घोषणा भी कर दी थी। कोल्हुआ में हुई खुदाई में ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त काल और मुगल काल तक के अवशेष मिले हैं।


बाल बुद्ध की मूर्ति -  कोल्हुआ से चलते हुए एक दुकान पर मैं बुद्ध की मूर्तियों को देखता हूं। इनमें से मैं एक बाल बुद्ध की मूर्ति खरीदना चाहता हूं। दुकान सुबोध पासवान से बातों बातों में परिचय होता है। वे बताते हैं मै बौद्ध धर्म स्वीकार कर चुका हूं और बौद्ध सभा के नियमित कार्यक्रमों में हिस्सा लेता हूं। 

थोड़ी जान पहचान बढ़ी तो  उन्होंने बाइक पार्किंग के पैसे लेने से इनकार कर दिया। बाल बुद्ध की मूर्ति में भी उन्होंने मुझे अच्छा डिस्काउंट दिया।  वे बताते हैं कि मैं वैशाली में प्रापर्टी खरीद बिक्री का काम भी करता हूं। सुबोध भाई से विदा लेकर मैं आगे बढ़ जाता हूं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( VAISHALI, BIHAR, MUZAFFARPUR, KOLHUA,  BUDDHA STUPA, ASHOKA STAMBHA ) 


1 comment:

  1. भगवान केदारनाथ धाम के कपाट 17 मई 2021 को सुबह 5 बजे मेष लग्न में देश-विदेश के भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे।

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