Monday, March 1, 2021

कौनहारा घाट – गंगा में नारायणी का संगम – किसकी हुई हार

महात्मा गांधी सेतु पार करते ही हाजीपुर पहुंचने पर देखता हूं कि बायीं तरफ एक नई सडक दिखाई दे रही है। इस पर लगा बोर्ड बता रहा है कि यह सड़क सीधे कौनहारा घाट जाएगी। कई साल पहले जम हमलोग हाजीपुर में रहते थे तब यह सड़क नहीं हुआ करती थी। यह नया बाइपास रोड है। यह चकवारा, मीनापुर गांव होते हुए रामभद्र और कौनहारा घाट पहुंचा देती है। 


हाजीपुर शहर के दक्षिणी कोने में स्थित मीनापुर और चकवारा गांव मूल रूप से खेतिहार लोगों के गांव है। इसी गांव में हाजीपुर  के प्रसिद्ध प्रेम सीड कंपनी वाले बाबू लाल सिंह का घर है। वे फूलगोभी समेत कई फसलों के बीज तैयार करने के लिए देश भर में जाने जाते थे। वैसे इन गांवों के ज्यादातर लोगों को सब्जियों के बीज का कारोबार हुआ करता है। किसी जमाने में हाजीपुर के बीज उत्पादों की तूती पूरी देश में बोलती थी। इन दिनों हाजीपुर के बीज का कारोबार कमजोर पड़ गया है। मैं बचपन में जब हाजीपुर शहर से गुजरता था तो तमाम सीड कंपनियों के बोर्ड नजर आते थे।


गांधी सेतु से मुड़ते ही जढुआ में मुझे फ्लाई एस से ईंट बनाने वाली फैक्टरी नजर आती है। आने वाले दिनों में मिट्टी के ईंट की जगह इस तरह से सफेद ईंट से ही घर बनाने की चलन बढ़ेगा। सरकार मिट्टी से बने ईंट को हतोत्साहित करने की नीति पर चल रही है। मीनापुर और चकवारा को पार करके रामचौरा पहुंच गया हूं। यहां पर राम जी का विशाल मंदिर निर्माणाधीन नजर आ रहा है। 


पहले रामचौरा में छोटा सा मंदिर हुआ करता था। यहां पर एक पत्थर पर रामजी के पांव के निशान हैं। लोग मानते हैं कि रामजी अयोध्या जाते समय इसी मार्ग से गए थे। हांलाकि यह भी माना जाता है कि राम जी बक्सर से गंगा जी को पार किया था। फिर वे हाजीपुर कैसे पहुंचे होंगे। पर हाजीपुर के लोग मानते हैं रामचौरा में रामजी के चरण पड़े थे। यहां बगल वाले मुहल्ले का नाम रामभद्र है। 


तो अब हम आ पहुंचे हैं कौनहारा घाट। गंगा में नारायणी नदी के संगम से पहले यह घाट बना है। यह अंतिम स्थल है। वैशाली और आसपास के जिले के लोग मृत्यु के बाद लोगों को शवदाह के लिए यहां लाते हैं। यहां पर इसे मंजिल कहा जाता है। जी हां आखिरी मंजिल। 


तो यहां पर कई होटल बने हैं जहां अंतिम यात्रा में आने वाले लोगों के लिए तुरंत फुरत भोज का इंतजाम हो जाता है। कौनहारा घाट में एक विद्युत शवदाह गृह भी काफी पहले बन चुका है। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान के लिए यहां भारी भीड़ उमड़ती है। 


वैसे सालों भर श्रद्धालु यहां गंगा स्नान के लिए आते हैं। तो यहां पूरा पाठ कराने वाले कुछ पंडे भी सक्रिय रहते हैं। पर इस घाट का नाम कौन हारा क्यों है... यह गज और ग्राह की युद्ध स्थल है। गज (हाथी) विष्णु भक्त था। जब वह जीवन से हारने लगा तो उसने नारायण को पुकारा। 


विष्णु यहां पर आए और गज को बचा लिया। तो युद्ध में कौन हारा। गज या ग्राह। तो इस सवाल पर इस घाट का नाम बना है। आज भी सुबह सुबह कौनहारा घाट पर श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी है। घाट पर कई अस्थायी दुकानें खुली हुई हैं। नदी के उस पार सामने सोनपुर के घाट दिखाई दे रहे हैं। कौनहारा घाट पर कई मंदिर बन गए हैं। पर इन सबमें सबसे पुराना है नेपाली छावनी मंदिर। तो अब आगे चलते हैं।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

( HAJIPUR, KAUNHARA GHAT, MINAPUR, CHAKWARA, RAM CHAURA MANDIR, SEEDS ) 


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