Wednesday, March 31, 2021

चोखी हवेली नोएडा- स्वाद और संगीत की एक शाम

 


अगर आपको दिल्ली एनसीआर में शाकाहारी स्वाद और सुमधुर संगीत के साथ एक सुहानी शाम गुजारनी हो तो चोखी हवेली पहुंचें। यह जगह है नोएडा सेक्टर 33 में नोएडा हाट और इस्कॉन मंदिर के बिल्कुल बगल में। यहां पर आप एक दमदार दुपहरिया या सुरमई शाम गुजार सकते हैं। संगीत से सजी हुई शाम स्वाद को रोचक बनाती है। राजस्थान में शुरू हुए चोखी ढाणी का ही लघु रूप है चोखी हवेली।


इसमें प्रवेश के लिए 499 रुपये का टिकट है। इस राशि आप क्रेडिट कार्ड या पेटीएम से भी चुका सकते हैं। अगर आप दोपहर में जाते हैं तो यहां शाम के 5 बजे तक रह सकते हैं। वहीं शाम को जाने वालों के लिए प्रवेश 5.30 बजे होता है। शाम को प्रवेश के बाद यहां आप रात्रि 10.30 बजे तक खाने पीने और संगीत का आनंद ले सकते हैं। 


आपका प्रवेश करने के साथ ही चाय, जल जीरा और पकौड़े के साथ स्वागत होता है। इसके बाद आप संगीत और अन्य कई मनोरंजन का यहां मजा लेते रहिए। हां, भोजन कक्ष में एक ही बार जाना है। तो जब मौज मजा से जी भर आए तो भोजन कक्ष की ओर प्रस्थान करें।

इससे पहले आप मुफ्त में हेड मसाज करा सकते हैं। मसाज वाले जैतून का तेल सिर में लगाकर आपकी अच्छी तरह मालिश करते हैं। यह मसाज आपको सुकून दे जाता है। इससे पहले आप चाहें तो कई किस्म के पान भी खा सकते हैं हालांकि इसके लिए आपको धन देना होगा। 


और मसाज से दिल भर आया तो महिलाएं यहां पर हाथों में मेहंदी रचवा सकती हैं। एक हाथ में मेहंदी रचवाने का कोई शुल्क नहीं है। दूसरा हाथ बढ़ाने पर आपको जेब ढीली करनी पड़ेगी। मेंहदी के साथ ही यहां पर कठपुतली नृत्य का भी मजा लिया जा सकता है।



चोखी हवेली में मुझे बनारस के कुम्हार मिल गए। वे अपना चाक लेकर आए हैं। यहां पर आने वालों को वे पॉटरी मेकिंग का ज्ञान देते हैं। यह सब कुछ लाईव देखना और सीखना शहरी बच्चों को लिए नए किस्म का अनुभव हो सकता है। 


और सामने मंच सजा हुआ है। इस मंच पर राजस्थानी कलाकार   नृत्य की लगातार प्रस्तुति देते रहते हैं। राजस्थान से आने वाले ये कलाकार राजस्थानी लोकनृत्य कालबेलिया की प्रस्तुति देते हैं। कई राजस्थानी गीतों  पर मस्त लोक नृत्य पेश करते हैं। पर अगर आपकी इच्छा है तो मंच पर जाकर इनके साथ खुद भी नाच सकते हैं। 


और अब भूख लगने लगी है तो भोजन कक्ष की  ओर प्रस्थान करें। भोजन कक्ष की दीवारें राजस्थानी पेंटिंग से सजी हुई हैं। यहां पर  नीचे बैठकर जीमने का भी इंतजाम है। वहीं  टेबल कुर्सियां भी लगी हुई हैं। पर काफी लोग नीचे बैठना पसंद करते हैं। 


खाने की थाली में क्या है...  बाजरे की रोटी, बाजरे की खीर, चपाती,  दाल बाटी, चूरमा, जलेबी,  गट्टे की सब्जी, मिक्स वेज, कई किस्म की  भूजिया,  अचार, सलाद,  सूखी सब्जियां,  चावल,  करी  ।  ये  सब कुछ आप जितना भी खाना चाहें वे पूछ पूछ कर खिलाते हैं।   आप मना करेंगे पर खिलाने वाले पीछे नहीं हटेंगे।


खाने के बाद भी  आप चाहें तो नृत्य संगीत का आनंद ले सकते हैं। प्रवेश द्वार के बाहर ऊंट की सवारी का भी मजा लिया जा सकता है।  चोखी हवेली में  सोमवार से शुक्रवार तक कम भीड़ होती है। तो आप इन्ही दिनों में जाएं तो अच्छा है।  शनिवार और रविवार   को काफी लोगों की भीड़ उमड़ने लगी है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( CHOKHI HAWELI, RAJSTHANI FOOD AND CULTURE, NOIDA SEC 33 )






Monday, March 29, 2021

रजत जयंती वर्ष की एक यादगार शाम


उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो,  न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए...कुछ हसीन यादें सफर का पाथेय होती हैं।  वे ऊर्जा दे जाती हैं।  मौका अगर खास हो तो कहना ही क्या।   तो ऐसा ही एक मौका था 28 फरवरी 2021 का।  हम लोग जिस  संस्थान से पढ़कर निकले  थे  जीवन पथ पर संघर्ष करने, वह एक बार फिर बुला रहा था।   मौका था रजत जयंती वर्ष का। इस शाम को यादगार बनाने हमारे 11 साथी दुबारा मिले। वैसे तो हमारी कक्षा में कुल 37 लोग थे। उनमें से 30 लोग संपर्क में हैं। पर कई लोग नहीं पहुंच सके।



भारतीय जन संचार संस्थान यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के 1995-96 सत्र के हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कुल पांच लोग चयनित होकर पहुंचे थे। मैं विद्युत प्रकाश मौर्य, मोहनीश मोनी, राजीव रंजन झा, ब्रजेश कुमार सिंह और दयाशंकर गुप्ता। 


यहां आकर कई और नए दोस्त मिले। संतोष कुमार दूबे, अमिष श्रीवास्तव, सुनील कुमार झा, प्रेम प्रकाश, बिनय सौरभ, नलिन कुमार, नलिनी रंजन, आनंद प्रकाश सिंह, अनिल कुमार सिंह, प्रमोद कुमार राउत, इरशादुल हक, सैय्यद शादाब मुज्जतबा, राकेश कुमार सिंह, मनोज कुमार खारी, अजय नंदन, नीरज कुमार, प्रमोद कुमार प्रीतम संपर्क में हैं। पांच छात्राएं भी थी हमारी कक्षा में रश्मि किरण, रश्मि अस्थाना, मधु पासवान, सीमा पठानिया और सुशीला कुमारी। अजेय कुमार, सर्वेश कुमार, भगत राम, योगेश कुमार से संपर्क नहीं हो सका है।


कुछ दिनों पहले आईआईएमसी एलुमिनाई एसोसिएशन से रितेश भाई और साधना का फोन आया कि आपके बैच के 26 साल हो गए हैं और इस बार के मीट में रजत जयंत उत्सव पर आप सबको सम्मानित किया जाएगा। स्मारिका में आप सबका परिचय भी प्रकाशित होगा। रजत जयंती सम्मेलन मे हिंदी पत्रकारिता के अलावा हमारे सत्र के अंग्रेजी पत्रकारिता, विज्ञापन एवं जनसंपर्क, अंग्रेजी पत्रकारिता ढेंकानाल परिसर के कुछ छात्र भी पहुंचे थे। 


इन 25 सालों में सबके पास अपनी अपनी उपलब्धियां थी। कुछ लोग पत्रकारिता में शीर्ष पदों पर जा पहुंचे हैं तो कुछ पत्रकारिता से इतर क्षेत्रों में भी झंडे गाड़ रहे हैं। उन सब पुराने दोस्तों से मिलना उनके साथ कुछ घंटे गुजारना बहुत नई ऊर्जा से लबरेज करता है। 


कुछ साल पहले हम हिंदी पत्रकारिता के मित्रों ने दिल्ली हाट में मिलने का कार्यक्रम रखा था तब कुल 23 लोग वहां पहुंच गए थे। वह मिलन भी बड़ा यादगार रहा था। इस बार के समारोह में आईआईएमसी के महानिदेशक संजय द्विवेदी ने सभी साथियों को सम्मानित किया। सम्मान में हमें गमछा, दो बैग, दो टी शर्ट आदि यादगारी के स्वरूप में मिले। यहां पर हमारी मुलाकात प्रोफेसर गोविंद सिंह जी से भी हुई। वे हमारे सत्र में हमें पढ़ाने आते थे। तब वे नवभारत टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर हुआ करते थे। इन दिनों वे आईआईएमसी में डीन अकादमिक के पद पर आ गए हैं। 



हम सभी लोगों को मंच से अपने अनुभव साझा करने का भी मौका मिला। इस दौरान हमारे साथी संतोष कुमार दूबे ने कहा, 25 साल तो धरती पर कई जीवों की कुल उम्र भी नहीं होती। हम अपने शिक्षण संस्थान से निकले की रजत जंयती मना रहे हैं। यह बड़ा गर्वान्वित करता है। 


पर आईआईएमसी के अंगरेजी पत्रकारिता की शुरुआत 1970-71 बैच से हुई थी। इस बैच के एक टिक्कू साहब भी यहां आए हुए थे। उनसे मिलना बड़ा सुखद रहा। इस उम्मीद के साथ हम अपने अपने घर को रवाना हुए कि जिंदगी रही तो हम भी स्वर्ण जयंती वर्ष में फिर मिलेंगे। सब्बा खैर...

विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( IIMC, HINDI JOURNALISM, SILVER JUBLEE MEET ) 



Saturday, March 27, 2021

सौराठ सभा - मिथिला क्षेत्र की अनूठी पंरपरा


आजकल वर-वधु की तलाश करनी हो तो लोग अखबारों के मेट्रोमोनियल पेज या ऐसी वेबसाइट का सहारा लेते हैं। पर आपको पता है कि बिहार के मिथिला में योग्य वर की तलाश के लिए एक अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है। हम बात कर रहे हैं सौराठ सभा की। हालांकि हाल के सालों में उसकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं रही। 


बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में अनूठी परंपरा का नाम है सौराठ सभा। यह हर साल लगने वाली एक विशाल सभा है। इस सभा में योग्य वर का चयन वहां आए कन्याओं के पिता करते हैं। सौराठ सभा मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड के सौराठ नामक गांव में लगती है। इसका दायरा  22 बीघा जमीन फैला हुआ है। इसे सभागाछी के नाम से भी जाना जाता है।


सौराठ सभा अतीत में मैथिल ब्राह्मणों के लिए वरदान हुआ करती थी। शादी के लिए इच्छुक वर व वधू के घरवाले जुटते थे। आषाढ़ में लगने वाली इस सभा में देश-विदेश से बड़ी संख्या में ब्राह्मण पहुंचते थे। यहीं वैवाहिक संबंध तय होते थे। इस सभा में बिना तामझाम और दहेज के शादियां होती थी।


अनूठी पंजी प्रथा सौराठ सभा में वंश परिचय को लिपिबद्द करने वाली अनूठी पंजी प्रथा सदियों से चली आ रही है। यहां पर सिद्धांत प्रथा के तहत वर-वधू के वंश वृक्षों का मिलान किया जाता है। इसमें सात पीढिय़ों तक देखा जाता है कि गोत्र और मूल नहीं मिल पाएं। इसके बाद ही शादी की अनुमति दी जाती है। यह पंजी प्रथा आज भी  चालू है। अब पंजीकार हाईटेक हो गए हैं। उनके पास मोबाइल  फोन और कंप्यूटर भी हैं। 


चौदहवीं सदी में हुई शुरुआत - इस सभा की शुरुआत 1310   ईस्वी में हुई थी। शुरुआती दौर में पंजी प्रथा का प्रचलन नहीं था। लोग छिटपुट रूप से वंश परिचय रखते थे। वैवाहिक निर्णय स्मरण के आधार पर किए जाते थे। बाद में राजा हरिसिंह देव के समय में पंजी प्रबंधन की शुरुआत हुई। पंजीकार लोगों का वंश परिचय लिखित रूप से रखने लगे। बाद में यहां लोगों के रहने के लिए कमरे बनाए गए। सभा गाछी के पास एक विशाल सरोवर का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे सौराठ सभा की ख्याति बढ़ने लगी।


 
हमारे साथी और मिथिला के प्रसिद्ध सरीसब पाही ग्राम के निवासी यज्ञनाथ झा कहते हैं कि सौराठ सभा का उद्देश्य दहेज मुक्त विवाह था। यह मिथिला के सामाजिक तानाबाना का लोकप्रिय नमूना हुआ करता था। सौराठ सभा को लेकर कई तरह की किवंदंतियां भी हैं। कहा जाता है कि जब इस सभा में कई हजार मैथिल ब्राह्मण के साथ जुट जाते थे तो पास के विशाल वृक्ष के सारे पत्ते झुक जाते थे।

सौराठ सभा के बारे में हमने पहली बार बिहार के स्कूल के पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा था। इस बार की मुजफ्फरपुर यात्रा में वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक भास्कर मुजफ्फरपुर के संपादक कुमार भावानंद जी से मुलाकात में इस सभा की परंपरा को हमने याद किया। वे हाल में सभा गाछी का दौरा करके लौटे थे। 

हालांकि अब सौराठ सभा पहले जैसी नहीं होती । ज्यादा पढ़े लिखे और संपन्न लोग अब इस सभा में आने में  रुचि नहीं दिखाते।  इसलिए सभा की लोकप्रियता में कमी आई है। कोरोना महामारी के कारण साल  में 2020 में सभा  का आयोजन नहीं हो सका।  पर इस तरह की अनूठी पंरपराओं को सहेज कर रखे जाने की जरूरत है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( SAURATH SABHA, MITHILA, VIVAH, SABHA GACHHI, MADHUBANI, BIHAR ) 

Thursday, March 25, 2021

नारायणी की जलधारा में निवास करते हैं भगवान विष्णु



इस बार की बिहार यात्रा में मैंने कई बार नारायणी नदी को पार किया। रेल से और सड़क मार्ग से। हाजीपुर और सोनपुर के बीच नारायणी पर ऐतिहासिक रेल पुल है। मुजफ्फरपुर और गोपालगंज के बीच डुमरियाघाट में एनएच 27 पर सड़क पुल है। अब वैशाली के पास रेवाघाट में भी एक नया पुल बन चुका है। इससे वैशाली का छपरा से संपर्क आसान हो गया है। इसी नारायणी नदी के तट पर मेरे बचपन के कई साल गुजरे हैं।


वास्तव में नारायणी भगवान विष्णु यानी नारायण की प्रेयसी है। गंडक नदी का दूसरा नाम नारायणी है और यह तुलसी का स्वरूप भी मानी जाती है। कहा जाता है नारायणी नदी में स्वयं नारायण यानी भगवान विष्णु शिला के रुप में निवास रहते हैं। गंडक घाटी के इतिहास पर शोध में अपना जीवन खपा देने वाले पत्रकार तेज प्रताप सिंह चौहान कहते थे - गंडक  नदी   के पानी में विशेष प्रकार के काले पत्थर मिलते हैं। इन पर चक्र, गदा आदि के निशान दिखाई देते हैं।


 हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, नारायणी में पाए जाने वाले यही पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप हैं। इन्हें    शालिग्राम   शिला के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। नारायणी नदी में शालिग्राम शिला काले रंग में पाया जाता है। पर कई बार यह सफेद, नीले और ज्योति स्वरुप में भी यह मिलते हैं। नेपाल में तो इस नदी को सदानीरा और शालीग्रामी नाम से पुकारा जाता है।


नारायणी नदी का उदगम काली गंडकी के रूप में नेपाल से आगे दक्षिण तिब्बत के पहाड़ों से होता है। कुल 814 किलोमीटर का सफर तय करके यह बिहार में सोनपुर और हाजीपुर के बीच में गंगा नदी में जाकर मिल जाती है। बिहार में यह पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिले से होकर गुजरती है। नेपाल में त्रिशूली या त्रिशूल गंगा इसकी प्रमुख सहायक नदी है।


भारतीय सीमा तक गंडकी को नारायणी के नाम से जाना जाता है। पर भारत में इसका अधिकृत नाम गंडक है। नारायणी नेपाल की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। महाभारत में भी नारायणी नदी का उल्लेख मिलता है।

तुलसी और जलंदर की कथा -  शिवपुराण के अनुसार दैत्यों के राजा जलंदर की पत्नी तुलसी थी। जलंदर का जन्म भगवान शिव के क्रोधाग्नि से हुआ था। वह शक्तिशाली योद्धा था। जलंदर ने अपने शक्ति के बलबूते पर देवताओं के स्वर्ग पर अधिपत्य स्थापित किया। उसे पराजित करना देवताओं के लिए असंभव था। असहाय देवता मदद के लिए भगवान विष्णु के पास गए। पर जलंदर भगवान शिव के अंश होने के कारण भगवान विष्णु उनका वध नहीं कर सकते थे। भगवान विष्णु ने उन्हें शिवजी के पास जाने की सलाह दी। 


शिवजी मान गए। पर जलंदर को हारने में सबसे बड़ी मुश्किल उसकी पत्नी तुलसी। तुलसी महान पतिव्रता और भगवान विष्णु की भक्त थी। तब भगवान विष्णु ने छल से तुलसी का पतिव्रत भंग कर दिया। इसके कारण जलंदर को हराना आसान हो गया। मगर जब यह बात तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। शिवपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने कहा, तुम धरती पर गंडकी नदी के रूप में बहोगी और मैं शालिग्राम शिला के रूप में नदी की जलधारा में निवास करूंगा। हालांकि आजकल गंडकी में शालिग्राम शिलाएं नहीं मिलती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि नेपाल में अभी भी मिलती हैं।


एक और कथा के अनुसार तुलसी ने नारायणी भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थीं, जिसके फलस्वरूप भगवान ने उसे विवाह का वरदान दिया था। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन शालिग्राम शिला और तुलसी के पौधा का विवाह करवाने की परंपरा है। तो जीवनदायिनी, सदानीरा नारायणी नदी को मेरा एक बार फिर प्रणाम।


गंडक परियोजना - 1959 में शुरू हुई गंडक परियोजना बिहार और उत्तर प्रदेश की संयुक्त नदी घाटी परियोजना है। भारत-नेपाल समझौते के तहत इससे नेपाल को भी लाभ हुआ है। इस परियोजना में गंडक नदी पर त्रिवेणी नहर हेड रेगुलेटर के नीचे बिहार के बाल्मीकि नगर मे बैराज बनाया गया है। इस बैराज से चार नहरें निकली हैं। इसमें से दो नहरें भारत में और दो नहर नेपाल में हैं। गंडक की नहरों से चंपारण और उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में सिंचाई होती है। यहां 15 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी होता है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( GANDAK RIVER, NARAYANI, HAJIPUR, GANGA ) 



Tuesday, March 23, 2021

मिलिए लालू प्रसाद यादव के इस अनूठे प्रशंसक से


कन्हौली में मैं अपने बचपन के दोस्त संजय कुमार की कपड़े की दुकान पर बैठा था कि एक टाटा नैनो कार आकर रूकी। इस कार की छत पर दो विशाल लालटेन लगे थे। चारों तरफ राष्ट्रीय जनता दल का चुनाव चिन्ह लालटेन चस्पा था। इस कार को ड्राईव कर रहे थे नटवर राय। वे निकल कर दुकान पर आए। पास के मानपुरा गांव के रहने वाले नटवर राजद और लालू प्रसाद यादव के अनूठे प्रशंसक हैं।

 उनकी कार पर लालटेन को देखकर कोई पुलिस वाला ट्रैफिक वाला उनसे कुछ नहीं पूछता। वे कहते हैं जिस दिन लालू प्रसाद जेल से बाहर आएंगे उस दिन ही मैं अपना जन्मदिन मनाऊंगा। लालू प्रसाद की तारीफ में वे अपने अंदाज में कई तरह से कसीदे पढ़ते हैं। राजनेताओं के ऐसे भक्त आपको बिहार में ही मिल सकते हैं। भले  ही लालू यादव और उनकी पार्टी  सत्ता में नहीं है लेकिन जनता के बीच उनकी धमक कायम है। 


पटना से दिल्ली 10 घंटे में   -    कन्हौली से पटना की राह पर हूं। कन्हौली के बाद रानीपोखर आया। उसके बाद बिरना लखन सेन। फिर बेलकुंडा। इसके बाद सेंदुआरी गांव फिर दिग्घी कलां फिर हाजीपुर। दिग्घी कलां में मुजफ्फरपुर से आने वाला नेशनल हाईवे महुआ की तरह आ रही सड़क से मिल जाता है। दिग्घी में रेलवे फ्लाईओवर बन जाने से सफर पहले से आसान हो गया है। महात्मा गांधी सेतु पर आज फिर जाम नहीं मिला।


शाम को राजेंद्र नगर से मेरी ट्रेन है दिल्ली के लिए। यह संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस ही है पर स्पेशल के नाम से चल रही है। मेरा वेटिंग टिकट कनफर्म हो चुका है। मैं राजेंद्र नगर स्टेशऩ पहुंचने पर देख रहा हूं कि यहां बैग सेनेटाइज करने के लिए मशीन लगी है। प्रति बैग 10 रुपये वसूले जा रहे हैं। दिल्ली मेट्रो में यह काम फ्री में हो रहा है। रेलवे स्टेशन में प्रवेश करते समय सबको मास्क लगाने को कहा जा  रहा है। पर पूरे बिहार में कई जिलों से गुजरते हुए मुझे कहीं कोई मास्क लगाए नहीं दिखाई दिए लोग। 


कोरोना काल में भी बड़े बेतकल्लुफ हो चुके हैं बिहार के लोग। पर रेलवे स्टेशन पर आने पर सावधानी दिखाई दे रही है। मेरी ट्रेन प्लेटाफार्म नंबर दो पर है। अपने सीट पर आकर लेट गया हूं। अब एसी में भी कंबल नहीं मिल रहा है। तो अपना कंबल लेकर चलना पड़ रहा है। ट्रेन ठीक 7.15 बजे राजेंद्र नगर से चल पड़ी है। पटना जंक्शन पर 5 मिनट के ठहराव के बाद वहां से भी 7.50 में चल पड़ी। दीनदयाल नगर ( मुगल सराय ) में ट्रेन एक घंटे से ज्यादा  पहले पहुंच चुकी है। यहां प्लेटफार्म नंबर सात पर ट्रेन डेढ़ घंटे आराम फरमाती रही।


अगली सुबह सात बजे से पहले हमारी ट्रेन नई दिल्ली जंक्शन को छू रही थी। यानी 11 घंटे में पटना से दिल्ली। अगर मुगलसराय का डेढ घंटा घटा दें तो दस घंटे से कम का सफर रहा। राजधानी एक्सप्रेस से भी कम समय में। अगर पटरियों पर ज्यादा रेलगाड़ियों का बोझ नहीं हो तो यह संभव है। 


यानी हमें बुलेट ट्रेन की कोई खास जरूरत नहीं अगर समान्य ट्रेनें ही समय से चलने लगें और उनकी गति में थोड़ा इजाफा हो जाए। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बन जाने के बाद में मुख्य रेल लाइन से मालगाड़ियों का दबाव कम हो जाएगा तो मेल एक्सप्रेस ट्रेनों को खाली ट्रैक मिल सकेगा। साथ ही इनकी गति में इजाफा होगा। पटना से दिल्ली 1000 किलोमीटर है। यह दूरी महज आठ घंटे में तय हो सकती है। इसमें हमारे वर्तमान लोकोमोटिव (इंजन) और डिब्बे ही सक्षम हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  

( PATNA TO DELHI, SAMPOORN KRANTI EXP) 

 


Sunday, March 21, 2021

बुनियादी विद्यालय कन्हौली - मेरा पहला स्कूल

 


जंगल का राजा सिंह जब पीछे मुड़कर देखता है तो उसे सिंहावलोकन कहते हैं। मेरे जैसा आम आदमी जब पीछे मुड़कर देखे तो यह अतीत की यादों में खो जाने जैसा है। इनमें ढेर सारी यादें ऐसी हैं जो हमेशा साथ-साथ चलती हैं। इन्हीं यादों में एक है मेरा पहला स्कूल, बुनियादी विद्यालय, कन्हौली। दशकों बाद आज उस स्कूल के दरो-दीवार से रुबरू होंगे।

महुआ का गांधी चौक अब यहां छोटे मॉल बन गए हैं

चकफतह से ठंडी हवाओं के बीच चलते हुए रास्ते में मधौल और पकड़ी जैसे गांव आए। मैं चार किलोमीटर चलकर मैं महुआ पहुंच गया। महुआ वैशाली जिले का अनुमंडल शहर है। कभी इस बाजार में हमारा अक्सर आना होता था। पर अब गांधी चौक की सूरत बदल गई है। मिनी मॉल जैसे मार्केट बन गए हैं। आम्रपाली सिनेमा घर, शारदा पुस्तक भवन और लक्ष्मी पुस्तकालय जैसी दुकाने कहीं नजर नहीं आई। 

महुआ बाजार के बीच से गुजरती बाया नदी 

बाया नदी का पुल पार करते हुए उसका ठहरा हुआ गंदला पानी दिखाई दिया। हमें सिर्फ गंगा ही नहीं बल्कि इन छोटी छोटी नदियों को भी स्वच्छ करने की जरूरत है। ये हमारा कचरा ढोने के लिए नहीं बह रही हैं। आगे चलने पर वैशाली विद्यालय नजर आया जो इस इलाके का पुराना हाई स्कूल है। मंगरू चौक के बाद नहर का पुल कब पार कर गया पता नहीं चला। महुआ से कन्हौली की दूरी सिर्फ चार किलोमीटर है।  

वही कन्हौली जहां मेरे बचपन के छह साल गुजरे हैं। मेरे पिताजी यहां वैशाली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के शाखा प्रबंधक रहे। 1978 से से 1983 तक। बाजार में बम शंकर चौधरी के मकान में बैंक की शाखा हुआ करती थी। वह भवन आज भी उसी तरह दिखाई दे रहा है। हालांकि बैंक की शाखा सामने वाले भवन में शिफ्ट हो गई है।


इस बैंक वाले भवन में ही 1978 से 1980 के बीच में पिताजी के साथ रहता था। यहां पर हमारे मकान मालिक के छोटे बेटे संजय कुमार जायसवाल हमारे सहपाठी हुआ करते थे। मैंने बाइक रोककर उनकी तलाश की। नीचे उनकी कपड़े की दुकान है – बाला जी वस्त्रालय। नाम लेने पर वे मुझे पहचान गए। छोटी सी पर यादगार मुलाकात रही। कोई 42 साल बाद  हमलोग मिले थे।


इसके बाद मैं आगे चल पड़ा। कन्हौली में उस भवन को भी देखा जिसे ड्योढ़ी कहा जाता था। शुक्ला परिवार के इस भवन में भी हमलोग करीब पांच साल रहे। हालांकि वह विशाल भवन अब जर्जर हो गया है। उसमें अब कोई नहीं रहता।

वह घर जहां हमारा परिवार छह साल तक रहा। 

कन्हौली बाजार में शुक्ला परिवार द्वारा बनवाया गया श्री रामजानकी मंदिर है। इस मंदिर की बाहरी दीवारों को पेंट कर दिया गया। अब मंदिर बड़ा सुंदर लग रहा है। इसके ठीक बगल में खाली मैदान पर पेठिया यानी साप्ताहिक बाजार लगता है। रविवार, मंगलवार और शुक्रवार को। हमलोग इस बाजार सब्जियां खरीदने आया करते थे।



इसी बाजार के बगल में मेरा स्कूल हुआ करता था। राजकीय उच्च बुनियादी विद्यालय। यहां मेरा चौथी कक्षा में विधिवत नामांकन हुआ था। इससे पहले मैंने जिन स्कूलों में पढ़ाई की वहां मेरा विधिवत कोई नामांकन नहीं हुआ था। स्कूल का नाम बुनियादी विद्यालय इसलिए है कि गांधी जी की प्रेरणा से बिहार में ऐसे स्कूलों स्थापना हुई थी जहां किताबी शिक्षा के साथ करघा चलाना और दूसरी व्यवहारिक किस्म की शिक्षा दी जाए। 


पर हमारे समय में भी व्यवहारिक शिक्षा बंद हो चुकी थी। हमारे समय में स्कूल के प्रधानाध्यापक हुआ करके थे बुद्धदेव शरण। हमारे दूसरे शिक्षक थे – अवधेश सिंह, चंद्रदीप सिंह, देवेंद्र राय, रामानंद सिंह, राम प्रवेश सिंह। इस स्कूल से मेरी ढेर सारी यादें जुड़ी है। 


आज कोरोना काल में स्कूल बंद है। स्कूल का नया भवन बना जरूर है। पर यह भी खंडहर जैसा दिखाई दे रहा है। रंग रोगन के अभाव में इमारत उदास सी  लग रही है। स्कूल को इस हाल में देखकर मुझे सुखद अनुभूति नहीं हुई। इस स्कूल में मेरे सहपाठी थे – चंद्र किशोर पासवान, उमेश पासवान, दिलीप पासवान, सीताराम पासवान, अरुण रजक,  मुकेश सिंह, अशोक सिंह। उन सबसे मेरा अब संपर्क नहीं है। पर चौथी, पांचवी और छठी कक्षा की ढेर सारी यादें हैं हमारे साथ।  यहां आकर हमारे प्रधानाध्यापक बुद्धदेव शरण,  शिक्षक अवधेश सिंह, चंद्रदीप सिंह की  याद आई।  तो इन यादों के साथ अब आगे चलें।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

( ( KANHAULI, VAISHALI, MAHUA, BASIC SCHOOL )