Wednesday, February 3, 2021

मैं एक दिन लौट आउंगा, तुम बचाकर रखना फुरसतें अपनी- दिल्ली से मुजफ्फरपुर - हमसफर एक्सप्रेस से


कोरोना काल में मेरी पहली रेल यात्रा शुरू हुई दिल्ली से मुजफ्फरपुर के लिए हमसफर एक्सप्रेस से। यूं तो पहले टिकट पटना का बनवाया था पर ऐन वक्त पर 12 घंटे पहले ट्रेन के रद्द होने का संदेश आ गया। एक बार फिर आईआरसीटीसी के एप पर तलाश की तो 14 दिसंबर को दरभंगा हमसफर एक्सप्रेस में काफी सीटें खाली थीं। तो हमने इसमें ट्रेन खुलने के 10 घंटे पहले रात को दो बजे टिकट बुक करा लिया। नई दिल्ली स्टेशन पर कोई खास जांच नहीं हो रही थी। किसी ने आरोग्य सेतु एप नहीं पूछा। बुखार चेक नहीं किया। सिर्फ बैग की स्कैनिंग हुई। ट्रेन नीयत समय पर दोपहर 12.15 बजे चल पड़ी।  

हमसफर एक्सप्रेस का किराया समान्य ट्रेनों के एसी3 से थोड़ा ज्यादा है। कोच डिजाइन में थोड़ा बदलाव है। पर ऐसा कुछ नहीं जिसके कारण किराया बढ़ाया गया है। ट्रेन में कोरोना काल में चादर कंबल नहीं दिए जा रहे। हम अपना कंबल घर से लेकर चल रहे हैं। हालांकि कोच का तापमान ज्यादा नहीं है। मैं घर से खाना लेकर नहीं चला हूं। यह पहली बार हुआ है कि कोई ट्रेन कानपुर स्टेशन पर आधा घंटे पहले ही पहुंच गई है। ट्रेन कानपुर में रूकी तो देखा यहां फूड पैकेट में खाना मिल रहा है।  कानपुर  रेलवे  स्टेशन पर मुझे 10 रुपये में गर्मा गर्म सूप पीने को मिल गया। 

कानपुर से ट्रेन लखनऊ के ऐशबाग स्टेशन से होकर गोरखपुर की तरफ बढ़ चली है। आजकल 50 फीसदी रेलगाड़ियां ही संचालित हो रही  हैं। ट्रैक खाली है तो हर स्टेशन पर ट्रेन समय से पहले पहुंच जा रही है। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर तो हमारी ट्रेन एक घंटे पहले ही पहुंच गई है। हमारे पड़ोसी यात्री की एक नन्हीं बच्ची रो रही है। वे  उसके लिए स्टेशन से बाहर दवा लेने चले गए।  उनके लौट कर आने के बाद ट्रेन  अपने समय से खुलने के बाद  बिहार में प्रवेश कर गई। 


ट्रेन का ठहराव छपरा में है। यह बिहार का पहला रेलवे  स्टेशन है हमसफर एक्सप्रेस  के लिए। पर यह छपरा के बाद  सोनपुर और हाजीपुर में रूक गई।  पर इतना रुकने  के बाद भी  मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गई।  मुजफ्फरपुर से पहले ट्रेन   रामदयालुनगर रेलवे स्टेशन पर भी रुकी।  पर मैं यहां नहीं उतरा।  सालों बाद मुजफ्फरपुर जंक्शन को देखने की इच्छा थी।


तो कई सालों बाद मैं मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर उतरा हूं। वैसे इस  शहर में हमने चार साल गुजारे हैं। अनगिनत बार मुजफ्फरपुर  रेलवे स्टेशन आना हुआ है। पर इस ये स्टेशन आज मुझे उदास उदास नजर आया। यात्रियों की भीड़ कम है। स्टेशन का भवन भी आकर्षक नहीं बन सका है। देश के बाकी स्टेशनों   के हो रहे आधुनिकीकरण के दौर में ये स्टेशन पिछड़ गया लगता है।  स्टेशन के बाहर का फ्रंट यानी बाजार भी  आकर्षक नहीं लग रहे हैं।  सुबह के सात बजे हैं। मेरे लंगट सिंह कॉलेज के दिनों के साथी विष्णु वैभव ( मनोज) मुझे  लेने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंच गए हैं। 

आज का सारा दिन विष्णु वैभव के साथ  गुजरेगा।  उन्होंने मेरे लिए अपने सारे कारोबार से छुट्टी कर रखी है। मैं उनसे 17 साल बाद मिला हूं।  किसी शायर ने कहा है- 

मैं लौट कर आउंगा एक दिन, तुम बचा कर रखना  फुर्सतें अपनी...

 मैंने उन्हें बाइक  से लंगट सिंह कॉलेज के गेट से होकर चलने को कहा। जरा अपना कॉलेज देख लें। विष्णु का नया घर कच्ची पक्की चौक के पास इंदिरा नगर में है। इन 17 सालों में  काफी कुछ बदल गया है। विष्णु की माता जी  जिनके हाथों की बनी रोटियां अनगिनत बार खाई  होगी वे नहीं रहीं। पिता जी भी नहीं रहे। विष्णु  की प्यारी सी बिटिया छठी कक्षा में पढती है। 



 विष्णु के साथ दिन में जिला स्कूल की इमारत को भी देखने गया, जहां मैंने सातवीं और आठवीं में पढ़ाई की।  जिला स्कूल के चौराहे पर विशाल  लाल रंग की पानी टंकी उसी तरह दिखाई दे रही है, जैसी बचपन में  दिखाई देती थी।

- विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com  

( MUZAFFARPUR, HAMSAFAR EXPRESS, RAMDAYALU NAGAR, KACHHI PAKKI ) 

कोहरे के बीच रामदयालुनगर रेलवे स्टेशन। 


4 comments:

  1. शानदार यात्रा वृत्तांत व विद्यालय महाविद्यालय की यादें! रेलगाड़ियों का स्पीड बढा है पहले से...

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  2. सुबह सुबह आपका लेख पढ़ने बैठ गई. एक बार में पूरा पढ़ गई. आपके स्कूल कॉलेज के ज़िक्र ने मुझे भी वहीं पहुंचा दिया. यात्रा वृतांत यादों की यात्रा का होता है, पाठक अपने अनुभवों को उनसे लिंक करता जाता है, शायद इस लिये भी पसन्द किया जाता है. जय हो

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