Sunday, February 21, 2021

सीवान से पटना - बेला का रेल पहिया कारखाना


थावे में माता के दर्शन करके हमलोग सीवान की तरफ चल पड़े हैं। रास्ते में मीरगंज बाजार आता है। सीवान बाइपास से पहले एक दुकान के आगे रुककर हमलोग चाय पीते हैं फिर आगे बढ़ जाते हैं। दूसरी बार सीवान बाजार में हूं पर सीवान कभी मुझे आकर्षक शहर नहीं लगा।  बाकी सहयात्री रेलवे स्टेशन जाने वाले थे। मुझे बस पकड़नी थी। 


शहर के बबुनिया मोड़ से मुझे पटना जाने वाली बस मिल गई है। बस चल पड़ी है। इस बार भी रास्ते में तरवारा, बसंतपुर, मलमलिया जैसे कस्बे आए। भले बिहार में चुनाव खत्म हो चुका है पर रास्ते में अभी चुनावी कार्यालयों के पोस्टर लगे हुए नजर आ रहे हैं। रास्ते में जगह जगह मिठाई की दुकाने नजर आ रही हैं। बिहार में मिठाई की दुकानों के साईनबोर्ड शुद्ध हिंदी में होते हैं। जैसे विशाल मिष्टान भंडार।

बिहार बस सेवा - इसके बाद बस मशरक से गुजर रही है। सीवान पीछे छूट चुका है। सारण जिला शुरू हो चुका है। हमें रास्ते में जगह जगब बस बुकिंग के दफ्तर दिखाई देते हैं। मशरक से दिल्ली के लिए सीधी बस सेवा। दिल्ली ही क्या कोलकाता और सिलिगुड़ी के लिए भी सीधी बस सेवाएं हैं। जिन लोगों को ट्रेन में कनफर्म टिकट नहीं मिलता है वे बसों का रुख करते हैं। इन दिनों सड़कों की स्थिति सुधरने से बस सेवाओं की बाढ़ सी आ गई है। यहां तक की बिहार से अहमदाबाद और पुणे के लिए भी सीधी बसें चलने लगी हैं। जहां की मांग ज्यादा वहां के लिए बस सेवाएं। ये बसें आमतौर पर टूरिस्ट परमिट पर चलती हैं।


मढौरा और मार्टन चॉकलेट की याद - फिर आया तरैया। तरैया भी सारण जिले में पड़ता है। तरैया के बाद हम पहुंचे हैं मढ़ौरा। उसी मढ़ौरा में जहां कभी बिरला समूह की मार्टन चॉकलेट की प्रसिद्ध फैक्टरी हुआ करती थी। बचपन में हमारा यह पसंदीदा चाकलेट हुआ करता था। इसकी एक टॉफी 10 पैसे की आती थी तो दूसरी 35 पैसे की। तब 35 पैसे वाली टॉफी हमारे लिए किसी मिठाई से कम नहीं हुआ करती थी। पर अब यह फैक्टरी बंद हो चुकी है।


मढौरा के बाद आता है अमनौर। अमनौर के बाद पहुंचे हैं सोनहो। सोनहो से एक रास्ता वैशाली तरह जाता हुआ दिखाई देता है। पर हमारी बस आगे बढ़ चली है। इसके बाद हम पहुंचे हैं परसा। परसा के बाद इस बार बस का रास्ता बदल गया है। यह नया गांव की तरफ न जाकर बेला होकर जा रही है। बेला में रेल पहिया कारखाना दिखाई देता है। 



रेल पहिया कारखाना इस क्षेत्र के पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की देन है। यहां पर रेल गाड़ी के पैसेंजर कोच के लिए पहिया बनता है। पहिए ट्रांसपोर्ट के लिए कारखाने तक रेलवे लाइन भी पहुंचाई गई है। इसकी स्थापना 2004 में हुई थी। पर वास्तव में इसका निर्माण कार्य 2008 में आरंभ हुआ। यह कारखाना 295 एकड़ जमीन में लगाया गया है।



भारतीय रेलवे के इतिहास में यह पहला कारखाना है जो बिना किसी विदेशी सहयोग के स्थापित किया गया है। इसका प्रशासनिक भवन चार मंजिला है। इसमें रोशनी के लिए सीसे की दीवारें बनाई गई हैं। साल 2016 में इस प्लांट से पहली बार 250 ब्रॉड गेज पैसेंजर कोच के रेल पहिए निर्मित करके भेजे गए। 


यहां पर नयागांव रेलवे स्टेशन से एक रेलवे लाइन लाई गई है। इस कारखाना के खुलने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है। बेला से बस एक नए रास्ते से होती हुई सीधे नारायणी नदी पर सोनपुर हाजीपुर के बीच बने नए पुल पर पहुंच गई है। गंडक नदी के पुल को पार करने के बाद हम हाजीपुर शहर में हैं। संयोग से आज महात्मा गांधी सेतु पर जाम की स्थिति नहीं है। इसलिए हमारी बस शीघ्र ही पटना में प्रवेश कर गई है।

-          विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-          ( SIWAN, TARWARA, BASANTPUR, MARHURA, MORTON, PARSA, BELA, RAIL COACH FACTORY )

  


 

 

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