Friday, February 19, 2021

कामाख्या से चलकर थावे आईं थी मैया


थावे की मां भवानी दुर्गा मंदिर सिद्धपीठ माना जाता है। स्थानीय लोग से जागृत शक्ति पीठ मानते हैं। थावे का दुर्गा मंदिर कभी जंगल में हुआ करता था। आज भी यह दो तरफ से जंगलों से घिरा हुआ है। इस मंदिर का गर्भगृह काफी पुराना बताया जाता है। मंदिर पर लगे साइन बोर्ड पर लिखा है कि यह हथुआ राज की कुल देवी हैं। मंदिर का परिसर मनोरम है। मंदिर मां की प्रतिमा काले पत्थरों की बनी हुई है। यहां आने वाले भक्त माता को नारियल और चुनरी चढ़ा कर मन्नत मांगते हैं। आसपास के लोग परिवार में संस्कारों के लिए यहां पहुंचते हैं।

प्रतिवर्ष अष्टमी को यहां बलि का भी विधान है। इसे हथुआ राजपरिवार की ओर से संपन्न कराया जाता है। मंदिर के परिसर में एक अजीब वृक्ष है। इसके वनस्पति परिवार का अभी तक पहचान नहीं की जा सकी है। पेड़ क्रॉस की तरह बढ़ा हुआ है। मंदिर की मूर्ति और पेड़ के संबंध में लोगों में कई तरह की किंवंदन्तियां प्रचलित हैं।


मंदिर परिसर में पंडे बड़ी संख्या में तैनात नजर आते हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से मुंडन, यज्ञोपवीत, शादी आदि की दरें लिखी हुई हैं। पर यहां मौजूद पंडे लोगों से अतिरिक्त राशि लेने की कोशिश में लगे रहते हैं। मंदिर से जुडे हुए 300 पंडे हैं। हर रोज अलग अलग समय में इन पंडों की मंदिर में ड्यूटी की बारी आती है। श्रद्धालुओं की भीड़ के अनुसार पंडों ने आपस में अपना अपना समय तय कर रखा है। 


मंदिर की कथा - हथुआ के राजा युवराज शाही बहादुर वर्ष 1714 में चंपारण के जमींदार काबुल मोहम्मद बड़हरिया से दसवीं बार लड़ाई हारने के बाद फौज के साथ हथुआ वापस लौट रहे थे। वे थावे जंगल मे एक विशाल वृक्ष के नीचे पड़ाव डाल कर आराम करने लगे। के समय उन्हें अचानक स्वप्न में मां दुर्गा दिखीं। 


कहा जाता है कि स्वप्न में आए तथ्यों के अनुरूप राजा ने काबुल मोहम्मद बड़हरिया पर फिर से आक्रमण किया और जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने कल्याणपुर, हुसेपुर, सेलारी,  भेलारी, तुरकहा और भुरकाहा को अपने राज के अधीन कर लिया। जीत हासिल करने के बाद उस वृक्ष के चार कदम उत्तर दिशा में राजा ने खुदाई कराई। वहां दस फीट नीचे वन दुर्गा की प्रतिमा मिली। यहीं पर मंदिर की स्थापना की गई। 


 

भक्त रहषु की कथा-  शाही वंश से पहले इस क्षेत्र में चेरो वंश का राज हुआ करता था। चेरो वंश के राजा मनन सिंह खुद को मां दुर्गा के बड़े भक्त थे। एक बार उनके राज्य में अकाल पड़ गया। उनके राज में थावे में माता रानी का एक अनन्य भक्त रहषु भगत हुआ करता था। रहषु अकाल में बाघ से दौनी कराकर चावल निकालने लगा। यही वजह थी कि वहां के लोगों को खाने के लिए अनाज मिलने लगा। 


यह बात राजा तक पता चली तो राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने रहषु को बुलाकर पूछा। रहषु ने इस मां दुर्गा का प्रताप बताया।  राजा ने कहा मुझे भरोसा नहीं तुम मां को यहां बुलाओ। इस पर रहषु ने राजा से कहा कि यदि मां यहां आईं तो राज्य को बर्बाद कर देंगी, पर राजा नहीं माना। रहषु भगत के आह्वान पर देवी मां कामाख्या से चलकर पटना और सारण के आमी होते हुए थावे तो पहुंच गईं। पर इसके बाद राजा के सभी भवन गिर गए। थोड़े दिन बाद राजा भी मर गया।

 


थावे मंदिर में नेपाल, उत्तर प्रदेश, बिहार के कई जिले से श्रद्धालु पूजा-अर्चना एवं दर्शन करने आते हैं। वैसे यहां सालों भर भक्तों की कतार लगी रहती है। पर यहां चैत्र और शारदीय नवरात्र में पूजा करने का ज्यादा महत्व है। नवरात्रि के नौ दिनों में यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रों में यहां पर विशेष मेला भी लगता है। इसके अलावा इस मंदिर में सोमवार और शुक्रवार को विशेष पूजा होती है।


कैसे पहुंचे - यह मंदिर गोपालगंज से सिवान जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। गोपालगंज से थावे मंदिर की दूरी सिर्फ छह किलोमीटर है। गोपालगंज शहर से थावे जाने के लिए हर समय वाहन उपलब्ध रहते हैं। सीवान से मंदिर की दूरी 28 किलोमीटर है। वैसे थावे रेलवे स्टेशन भी है। यहां छपरा से ट्रेन से भी पहुंचा जा सकता है।

-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 



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