Monday, February 15, 2021

उत्तर बिहार का लोकप्रिय नास्ता- लिट्टी और घुघनी


खिली खिली धूप में केसरिया बौद्ध स्तूप काफी सुंदर नजर आ रहा है। अच्छा लग रहा है कि स्थानीय लोग भी इसे देखने पहुंचते हैं। हम अपनी विरासत को नहीं पहचानेंगे तो और कौन इसका महत्व जानेगा। बौद्ध स्तूप के आसपास दूर-दूर तक खेत नजर आते हैं। पर अब सड़क पर थोड़ी दूर आगे एक लाइन होटल बन गया है। 


केसरिया का बाजार जिस तरह विस्तार ले रहा है उसे देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में बौद्ध स्तूप के आसपास काफी रौनक बढ़ जाएगी। फिलहाल तो स्तूप के आगे सिर्फ एक चाय नास्ते की दुकान है। मैं इस दुकान पर बैठ जाता हूं। यहां लिट्टी और घुघनी देखकर वैशाली जिले में गुजरा हुआ बचपन याद आ जाता है।


 दरअसल लिट्टी और घुघनी वैशाली जिले का लोकप्रिय नास्ता है। यह दक्षिण बिहार में बनने वाली लिट्टी से अलग होती है। वैशाली जिले की लिट्टी को तेल में छानकर बनाया जाता है। हालांकि इसके अंदर भी थोड़ा सा मशाला भरा जाता है। इसे चना मसाला यानी काले चने की बनी रसदान घुघनी के संग खाया जाता है।

मेरा बचपन कन्हौली में गुजरा। वहां पर बिट्ठल पंडित की लिट्टी घुघनी की दुकान हुआ करती थी। तब उसकी दरें बहुत कम हुआ करती थीं। पर बिट्टठल की लिट्टी खाने के लिए लोग दूर दूर से आते थे। आज एक बार फिर वही लिट्टी मेरी नजरों के सामने हैं। केसरिया में इस दुकान को एक गुप्ताजी चलाते हैं। एक प्लेट यानी दो लिट्टी और घुघनी 15 रुपये की है। मैं एक प्लेट आर्डर करके बैठ जाता हूं। वे लिट्टी के साथ कचरी भी बनाते हैं। पर मैं कचरी नहीं खाता। गुप्ता जी की लिट्टी और घुघनी का स्वाद अच्छा है। मैं सुबह सात बजे नास्ता करके चला हूं। अब दोपहर में बस एक प्लेट लिट्टी और घुघनी।   इतना ही काफी है।


पर गुप्ता जी बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान चार महीने स्तूप बंद रहा तो उनका काम भी बंद रहा। अब स्थानीय सैलानी आने लगे हैं तो थोड़ा बहुत काम चल पड़ा है। पर पहले जैसी रौनक अभी नहीं लौटी। वे बताते हैं कि जब विदेशी सैलानी आते थे तो खूब बिक्री होती थी। 


दरअसल आम दिनों में रोज केसरिया में 100 के करीब टूरिस्ट बसों में विदेशी सैलानी आते हैं। कुशीनगर से होकर वैशाली जाने वाले दुनिया के तमाम देशों के बौद्ध श्रद्धालु केसरिया में जरूर रुकते हैं। दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्तूप की परिक्रमा करने के बाद ही वे वैशाली का रुख करते हैं। तो इस दौरान उनके लिट्टी घुघनी की अच्छी बिक्री हो जाती है। अब गुप्ता जी को उम्मीद है कि भारत सरकार विदेशों से हवाई यात्राएं शुरू कर देगी तब विदेशी सैलानी इधर का रुख करेंगे। उन्हें भी इंतजार है कि कोरना काल का जल्दी से अंत हो और सब कुछ पहले की तरह चले।


लिट्टी घुघनी का स्वाद लेने के बाद मुझे यहां से केसरिया बाजार तक जाने के लिए एक शेयरिंग आटो रिक्शा मिल जाता है। दस रुपये में केसरिया बाजार में पहुंच गया। यहां से खजुरिया के लिए तुरंत ही बस मिल गई। ये बस पटना से आ रही है। खजुरिया में भी इंतजार नहीं करना पड़ा। गोपालगंज जाने वाली बस सामने चलने को तैयार थी। इसमें भीड़ बिल्कुल नहीं है। तो अगले एक घंटे में गोपालगंज। उसी मार्ग पर जिससे होकर तथागत कभी कुशीनगर गए होंगे।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

(   ( KESARIA, BUDDHA , LITTI GHUGHNI ) 


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