Tuesday, January 26, 2021

पांडवेश्वर महादेव मंदिर – यहां पांडवों ने की थी पूजा


महाभारत काल में   कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर हुआ करती थी। इसी हस्तिनापुर के लिए महाभारत का  युद्ध लड़ा गया। पर आज हस्तिनापुर में पांडवकालीन स्मृतियां  तलाशना मुश्किल है। हस्तिनापुर में महाभारत कालीन अवशेष के नाम पर कुछ खास नहीं है। पर गंगा नदी के तट पर बसे इस कस्बे में एक महादेव शिव का सुंदर मंदिर है। इस मंदिर को पांडव कालीन कहा जाता है। इस मंदिर को पांडवेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जानते हैं।


पांडवेश्वर मंदिर में विराजमान शिवलिंगम के बारे में कहा जाता है कि यह आपरूपि शिवलिंगम है। इसलिए इस मंदिर की क्षेत्र में काफी मान्यता है। मंदिर के परिसर में एक विशाल वट वृक्ष भी है। इस वृक्ष को भी काफी पुराना बताया जाता है। लोग इस वृक्ष के नीचे दीपक जलाते हैं।


मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी। उन्होने शिव से विजयी होने की मन्नत मांगी थी। तब यहां गंगा नदी करीब बहती थी। कहा जाता है कि द्रौपदी भी इस मंदिर में नियमित पूजा करती थीं। यह भी कहा जाता है कि पांचो पांडव भी इस मंदिर में नियमित पूजा करते थे।


पर वर्तमान में जो मंदिर बना हुआ उसका निर्माण बहमूसा परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह ने 1798 में बनवाया था। मंदिर में पांच पांडवों की मूर्तियां भी हैं। इन्हें काफी प्राचीन बताया जाता है। मंदिर में स्थित शिवलिंग का लगातार जलाभिषेक के कारण क्षरण होकर आधा रह गया है।


हर साल महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है। तब हजारों कांवड़िया भक्त यहां पर अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर शिवरात्रि के अवसर पर कांवड़ लेकर पहुंते हैं और भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।


मंदिर परिसर में एक शीतल जल का कुआं भी है। यहां आने वाले श्रद्धालु इस कुएं का जल अपने साथ ले जाते हैं। लोग इस कुएं के पानी को काफी पवित्र मानते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु इस जल में स्वस्थ होने की शक्ति बताते हैं।


पांडवेश्वर मंदिर परिसर में दूर दूर से सालों भर श्रद्धालु पहुंचते हैं। पर सोमवार  को और शिवरात्रि  के दिन यहां मेले से वातावरण होता है।  मंदिर परिसर के आसपास  हरा भरा मनोरम वातावरण है। 

 


जयंती माता मंदिर, शक्तिपीठ

प्राचीन जयंती माता शक्ति पीठ मंदिर मेरठ जिले के हस्तिनापुर में पांडव टीला के पास स्थित है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है। यहां पर माता सती का दाहिना गुल्फ अंग गिरा था। जिसका नाम जयंती माता पड़ा। महाभारत कालीन पांडव टीला स्थित   प्राचीन    श्री   जयंती माता   सिद्धपीठ की महत्ता पुराणों में कही गई है।   मंदिर के उपासकों का मानना है कि इस का वर्णन देवी भागवत और शिव पुराण में भी आता है। शिव तांडव के समय यहां पर भी सती का एक अंग गिरा था। जयंती माता का छोटा सा मंदिर पांडव टीला के ऊपर स्थित है।


कहा जाता है कि पांडवों को कई दिव्य अस्त्र-शस्त्र जयंती माता से ही प्राप्त हुए थे। पांडेश्वर महादेव मंदिर और जयंती माता की पूजा के बाद ही उन्हें कुरुक्षेत्र के मैदान में विजय प्राप्त हुई थी। इसलिए ऐतिहासिक नगरी में इन स्थानों का बड़ा महत्व है।



यह टीला पुरात्तव विभाग की ओर से संरक्षित है। यहां पर किसी तरह के नए निर्माण की मनाही है। इसलिए मंदिर को भव्य रूप नहीं दिया जा पा रहा है। पर आसपास से काफी श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

इस मंदिर के सामने एक धर्मशाला का निर्माण कराया गया है। इस धर्मशाला के साथ ही एक भोजनालय भी बना हुआ है। मेले के समय इस क्षेत्र में काफी रौनक रहती है।


कैसे पहुंचे – हस्तिनापुर मुख्य बाजार से मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। पांडवेश्वर शिव मंदिर और जंयती मंदिर जैन मंदिरों के समूह से एक किलोमीटर वन क्षेत्र में स्थित है।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

 ( PANNDWESHARA TEMPLE, SHIVA, JAYANTI TEMPLE, HASTINAPUR ) 



2 comments:

  1. hameshaa ki tarah jaankari se bhari hui khoobsoorat post . devnagri me type karne me kathinai ke kaaran ek tippani aise hi jheliye sir . bahut kamaal ki post

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