Wednesday, January 20, 2021

हस्तिनापुर का जंबूदीप - विशाल अनूठा मंदिर



वैसे तो हस्तिनापुर पांडवकालीन शहर माना जाता है। पर आजकल यहां कई  प्रसिद्ध जैन मंदिर हैं। यहां का  जंबूदीप मंदिर जैन समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की आधारशिला 1974 में रखी गई थी, जो पूरी तरीके से 1985 में बनकर तैयार हुआ था। 


 आखिर क्या है जंबू दीप। यह एक दिगंंबर जैन मंदिर है।  यह   
जैन भूगोल का ज्ञान कराने वाली जम्बू द्वीप रचना हमारी विशाल सृष्टि की प्रतिकृति है।   जैन जम्बूद्वीप मंदिर अत्यंत सम्मानित और प्रसिद्ध जैन साध्वी श्री ज्ञानमती माताजी के अथक और समर्पित प्रयासों द्वारा बनाया गया था। 





ऐसा माना जाता है कि साध्‍वी ने 1965 में विंध्‍य पर्वत श्रेणी में भगवान बाहुबली की पवित्र मूर्ति के नीचे ध्‍यान लगाते हुए एक स्‍वप्‍न देखा। इसमें उन्‍होंने मध्‍यलोक के साथ तेरह द्वीपों को देखा था। उसके बाद से साध्वी ने मंदिर बनाने के लिए सही जगह की तलाश में पूरे देश में पदयात्रा शुरू कर दी। अंत में वे हस्तिनापुर आ पहुंची और इस पवित्र जगह पर अपनी स्वप्न परियोजना को शुरू करने का फैसला किया। 


यह मंदिर अपने समृद्ध इतिहास, स्वच्छता और कायाकल्प अनुभव के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है। इस तीर्थ का आधिकारिक नाम दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थानहै और इसका मुख्य आकर्षण जम्बूद्वीप के प्रतिरूप में निर्मित भवन है।

 


सन 1972 में सर्वोच्च जैन साध्वी पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से स्थापित संस्था के द्वारा जम्बूद्वीप रचना के निर्माण के लिए हस्तिनापुर में नशिया मार्ग पर जुलाई 1974 में जमीन खरीदी गई और मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हुआ।



अनूठा कमल मंदिर - सबसे पहले 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की अवगाहना प्रमाण सात हाथ (सवा दस फीट) ऊंची खड़गासन प्रतिमा के लिए के लिए फरवरी 1975 में एक जिनालय का निर्माण कराया गया। वहीं सन 1990 में एक अनोखे कमल मंदिरका निर्माण हुआ है, जो जंबूदीप का प्रमुख आकर्षण है। कमल मंदिर में कल्पवृक्ष भगवान महावीर की अतिशयकारी, मनोहारी सवा दस फीट ऊंची खड्गासन प्रतिमा विराजमान है।


जंबूदीप में सोलह जिन मंदिरों से समन्वित सुमेरु पर्वत का निर्माण किया गया है। इसके अंदर 136 सीढ़ियों से चढ़कर श्रद्धालु समस्त देवतों के दर्शन कर सबसे ऊपर पाण्डुक शिला के निकट पहुंचते हैं। यहां जम्बूद्वीप रचना का विहंगम  नजारा दिखाई देता है। यहां से नदी, पर्वत, मंदिर, उपवन आदि दृश्यों को देखा जा सकता है। इसके साथ ही हस्तिनापुर के आसपास के सुदूरवर्ती ग्रामों का भी प्राकृतिक सौंदर्य भी देखा जा सकता है।  

 


जंबूदीप के प्रवेश द्वार पर णमोकार महामंत्र लिखा हुआ है  - 

- णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं। एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पाव प्पणासणो ।  

 जैन धर्म में यह नमस्कार महामंत्र सर्वोत्कृष्ट मंत्र है।  यह   मंत्राधिराज है।

 


तीर्थंकर जन्मभूमियों के इतिहास में हस्तिनापुर का खास महत्व है। यह तीन जैन तीर्थंकरों भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ की जन्मभूमि मानी जाती है। इसलिए हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पत्थर की बनी हुई 31-31 फीट की तीनों तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। ये जैन धर्म के 16वें, 17वें और 18वें तीर्थंकर थे।

 


हस्तिनापुर में जितने भी मंदिर में उनमें सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ जंबूदीप मंदिर परिसर को देखने के लिए ही उमड़ती है। मंदिर परिसर में फव्वारे, झांकियों का भी निर्माण कराया गया है जो श्रद्धालुओं के मनोरंजन करते हैं।



जंबूदीप मंदिर के सामने पार्किंग के लिए काफी जगह उपलब्ध है। इसके प्रवेश द्वार के पास एक छोटा सा बाजार है। यहां खाने पीने की वस्तुएं उपलब्ध है। आप यहां से थोड़ी बहुत खरीददारी भी कर सकते हैं।

विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyutp@gmail.com

( JAMBUDEEP, HASTINAPUR, DIGAMBAR JAIN TEMPLE )

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