Thursday, February 25, 2021

भद्र घाट – पटना में गंगा तट पर मरीन ड्राईव सा नजारा


पटना से हाजीपुर की राह पर हूं। बाइक से जा रहा हूं। तो इस बार सोचा कि महात्मा गांधी सेतु से न जाकर नए बने अस्थायी पीपा पुल से यात्रा की जाए। यह पीपा पुल महात्मा गांधी सेतु के पूर्वी इलाके में बना है। यह सेतु से आते समय दिखाई देता है। गाय घाट गुरुद्वारा के पास पहुंचकर मैं स्थानीय लोगों से पीपा पुल जाने का रास्ता पूछता हूं। वे लोग बताते हैं कि भद्र घाट से होकर जाना होगा। थोड़ा आगे जाने पर आलमगंज थाना का भवन आता है। 


थाना के दीवारों पर मधुबनी पेंटिंग दिखाई देती है। यह पटना को सुंदर बनाने की कवायद है। थाने के बगल वाली गली पर लिखा है पीपा पुल जाने का रास्ता। मैं भद्र घाट पहुंच गया हूं। पहली बार भद्र घाट आया हूं। पर यह पटना का बहुत ही प्राचीन और लोकप्रिय घाट है। खास तौर पर छठ पूजा के समय इस घाट पर भारी भीड़ उमड़ती है।  


पटना    सिटी के   इस भद्र घाट पर मां गंगा का एक छोटा सा मंदिर भी बनाया गया है। श्रद्धालु इस मंदिर में पूजा अर्चना करने आते हैं। मंदिर के पास के बूढ़ी माता पूजन सामग्री की दुकान लगाए बैठी हैं। पर अब भद्र घाट के आसपास का इलाका नए रंग रूप में दिखाई दे रहा है। 


दरअसल पटना के गंगा तट पर पक्का पैदल चलन पथ ( वाक वे) बनाने का कार्य जोर शोर से जारी है। इससे सारे घाट आपस में एक दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। आपको एक घाट से दूसरे घाट तक जाने के लिए वापस सड़क पर जाने की कोई जरूरत नहीं है। अब तक कई किलोमीटर लंबा वाक वे बन चुका है। इसके साथ कई जगह रेलिंग भी लगाई जा रही है। 


यहां से खड़े होकर गंगा का नजारा किया जा सकता है। इससे गंगा नदी का नजारा मुंबई के मरीन ड्राईव जैसा दिखाई देने लगा है। इस वाक वे से नीचे गंगा में पाया डालकर अशोक राजपथ के समानांतर एक लंबी सड़क बनाने का कार्य भी जारी है। यह सड़क दानापुर से पटना सिटी के बीच बन रही है। यह भविष्य में अशोक राजपथ से ट्रैफिक के दबाव को कम करेगी।


सिर्फ भद्र घाट ही नहीं पटना के कलेक्ट्रेट घाट, कृष्णा घाट, रानी घाट से लेकर महेंद्रू घाट तक ऐसे पाथ वे का निर्माण हो चुका है। पटना के काफी लोग अब सुबह सुबह गंगा तट पर इस वाक वे पर टहलने के लिए आने लगे हैं। इस पाथ वे की औसत चौड़ाई 18 फीट से 22 फीट के बीच है। इस पाथ वे ने कलेक्ट्रेट घाट, महेन्द्रू घाट, बंशी घाट, काली घाट, कदम घाट, पटना कॉलेज घाट, कृष्णा घाट, गांधी घाट, गोलकपुर घाट, लॉ कॉलेज घाट, वंशी घाट, रानी घाट, प्रोफेसर कॉलोनी घाट, बहरवा घाट का नजारा बदल दिया है। 


भविष्य में जब ये पाथ वे पूरी तरह तैयार हो जाएगा तो गंगा तट का नजारा काफी मनोरम प्रतीत होगा। इस पाथवे पर रोशनी का भी पर्याप्त इंतजाम किया गया है।

बहुत पुरानी योजना - पटना के गंगा तट को विकसित करने की ये बहुत पुरानी योजना थी। सन 1970 में 19 जून इंदिरा गांधी जब पटना में महात्मा गांधी सेतु का शिलान्यास करने आईं तो इस मरीन ड्राईव बनाने का ऐलान हुआ था। संयोग से उसी दिन उनके पोते राहुल गांधी का जन्म हुआ था। तब स्थानीय नेताओं के आग्रह पर  उन्होंने पटना को ये तोहफा देने का ऐलान किया था। पर इस पर काम अब जाकर हो सका है। तो अब चलें आगे।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com ( PATNA , BHADRA GHAT, PIPA PUL,   ROAD  ON GANGA ) 



Tuesday, February 23, 2021

पटना का गायघाट गुरुद्वारा – पहली पातशाही की याद


पटना को ये सौभाग्य प्राप्त है कि इस धरती को कई सिख गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त है। पटना में महात्मा गांधी सेतु पर पहुंचते ही आपको पुल के बगल में एक गुरुद्वारा नजर आता है। गायघाट का यह गुरुद्वारा ऐतिहासिक है। यह गुरुद्वारा सिख धर्म के पहले गुरु गुरुनानक देव जी की याद दिलाता है। यह माना जाता है कि गुरुनानक देव जी अपनी उदासियों के क्रम में यहां 1509 ईस्वी में पधारे थे। यहां पर उन्होंने अच्छा वक्त गुजारा था। अपने आशीर्वाद से उन्होंने यहां के लोगों को उपकृत किया था। इसलिए सिख इतिहास में यह गुरुद्वारा काफी अहम स्थान रखता है।

जहां पर यह गुरुद्वारा स्थित है पहले भक्त जैतामल का आवास हुआ करता था। पेशे से व्यापारी जैतामल गुरु की शिक्षाओं से काफी प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने अपना घर बाद में धर्मशाला के लिए दान में दे दिया था। पटना के आलमगंज के पास स्थित इस गुरु घर को गुरुद्वारा पहिला बाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि भगत जैतामल जब ज्यादा वृद्ध हो गए तो रोज गंगा स्नान  करने नहीं जा पाते थे। तब उन्होंने गुरु महाराज को याद किया। उनके लिए गुरुनानक देव जी ने अपने प्रताप से गाय के रुप में गंगा जी को उसके घर तक ला दिया था। यह गाय ही उन्हें हर रोज गंगा स्नान कराती थी। इसी कथा के नाम पर इस इलाके का नाम गाय घाट पड़ गया।  


बाद में 1666 में नवम पातशाही गुरुतेग बहादुर भी बंगाल यात्रा से लौटते समय यहां पधारे थे। वे भक्त जैतामल की कुटिया में पहुंचे। जिस खिड़की से उन्होंने भक्त जैतामल की कुटिया में प्रवेश किया उसे खिड़की साहिब कहा जाता है। कहा जाता है कि भक्त जैतामल को उनके अंदर गुरुनानक देव की छवि दिखाई दी। उनकी मौजूदगी में ही भक्त जैतामल को मुक्ति मिली। इसी स्थान पर यह गुरुद्वारा निर्मित किया गया है। 


गुरुद्वारा का ऐतिहासिक महत्व - इस गुरुद्वारे का ऐतिहासिक महत्व इस मायने में भी है कि यहां पर गुरुनानक देव जी के साथ हमेशा रहने वाले भाई मरदाना के रबाब को संरक्षित करके रखा गया है। गुरुनानक देव के मुसलिम शिष्य मरदाना बहुत अच्छे गायक होने के साथ रबाब भी बजाते थे। यहां पर माता गुजरी द्वारा इस्तेमाल की गई चक्की भी संरक्षित करके रखी गई है। यहां पर वह पेड़ भी है जहां नवम पातशाही गुरु तेग बहादुर ने अपना घोड़ा बांधा था। तब गुरुतेग बहादुर ने पटना में चार महीने तक प्रवास किया था।


गायघाट का यह गुरुद्वारा पटना के प्रसिद्ध गुरुद्वारा हरिमंदिर साहिब से चार किलोमीटर की दूरी पर है। यह गुरुद्वारा सिख सरकिट का प्रमुख हिस्सा है। सिख श्रद्धालुओं में गायघाट गुरुद्वारा को लेकर बड़ी आस्था है। पटना आने वाले श्रद्धालु इस गुरुद्वारे में भी मत्था टेकने आते हैं।

गायघाट के गुरुद्वारा में हर साल गुरुनानक देव के जन्मदिन पर गुरु पर्व का आयोजन बड़े ही धूमधाम से किया जाता है। तब यहां दीवान सजते हैं। अखंड पाठ, विशाल लंगर और भव्य नगर कीर्तन का भी आयोजन किया जाता है।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-         ( GAI GHAT GURUDWAR, PATNA SAHIB, GURU NANAK DEV, GURU TEG BHADUR )



Sunday, February 21, 2021

सीवान से पटना - बेला का रेल पहिया कारखाना


थावे में माता के दर्शन करके हमलोग सीवान की तरफ चल पड़े हैं। रास्ते में मीरगंज बाजार आता है। सीवान बाइपास से पहले एक दुकान के आगे रुककर हमलोग चाय पीते हैं फिर आगे बढ़ जाते हैं। दूसरी बार सीवान बाजार में हूं पर सीवान कभी मुझे आकर्षक शहर नहीं लगा।  बाकी सहयात्री रेलवे स्टेशन जाने वाले थे। मुझे बस पकड़नी थी। 


शहर के बबुनिया मोड़ से मुझे पटना जाने वाली बस मिल गई है। बस चल पड़ी है। इस बार भी रास्ते में तरवारा, बसंतपुर, मलमलिया जैसे कस्बे आए। भले बिहार में चुनाव खत्म हो चुका है पर रास्ते में अभी चुनावी कार्यालयों के पोस्टर लगे हुए नजर आ रहे हैं। रास्ते में जगह जगह मिठाई की दुकाने नजर आ रही हैं। बिहार में मिठाई की दुकानों के साईनबोर्ड शुद्ध हिंदी में होते हैं। जैसे विशाल मिष्टान भंडार।

बिहार बस सेवा - इसके बाद बस मशरक से गुजर रही है। सीवान पीछे छूट चुका है। सारण जिला शुरू हो चुका है। हमें रास्ते में जगह जगब बस बुकिंग के दफ्तर दिखाई देते हैं। मशरक से दिल्ली के लिए सीधी बस सेवा। दिल्ली ही क्या कोलकाता और सिलिगुड़ी के लिए भी सीधी बस सेवाएं हैं। जिन लोगों को ट्रेन में कनफर्म टिकट नहीं मिलता है वे बसों का रुख करते हैं। इन दिनों सड़कों की स्थिति सुधरने से बस सेवाओं की बाढ़ सी आ गई है। यहां तक की बिहार से अहमदाबाद और पुणे के लिए भी सीधी बसें चलने लगी हैं। जहां की मांग ज्यादा वहां के लिए बस सेवाएं। ये बसें आमतौर पर टूरिस्ट परमिट पर चलती हैं।


मढौरा और मार्टन चॉकलेट की याद - फिर आया तरैया। तरैया भी सारण जिले में पड़ता है। तरैया के बाद हम पहुंचे हैं मढ़ौरा। उसी मढ़ौरा में जहां कभी बिरला समूह की मार्टन चॉकलेट की प्रसिद्ध फैक्टरी हुआ करती थी। बचपन में हमारा यह पसंदीदा चाकलेट हुआ करता था। इसकी एक टॉफी 10 पैसे की आती थी तो दूसरी 35 पैसे की। तब 35 पैसे वाली टॉफी हमारे लिए किसी मिठाई से कम नहीं हुआ करती थी। पर अब यह फैक्टरी बंद हो चुकी है।


मढौरा के बाद आता है अमनौर। अमनौर के बाद पहुंचे हैं सोनहो। सोनहो से एक रास्ता वैशाली तरह जाता हुआ दिखाई देता है। पर हमारी बस आगे बढ़ चली है। इसके बाद हम पहुंचे हैं परसा। परसा के बाद इस बार बस का रास्ता बदल गया है। यह नया गांव की तरफ न जाकर बेला होकर जा रही है। बेला में रेल पहिया कारखाना दिखाई देता है। 



रेल पहिया कारखाना इस क्षेत्र के पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की देन है। यहां पर रेल गाड़ी के पैसेंजर कोच के लिए पहिया बनता है। पहिए ट्रांसपोर्ट के लिए कारखाने तक रेलवे लाइन भी पहुंचाई गई है। इसकी स्थापना 2004 में हुई थी। पर वास्तव में इसका निर्माण कार्य 2008 में आरंभ हुआ। यह कारखाना 295 एकड़ जमीन में लगाया गया है।



भारतीय रेलवे के इतिहास में यह पहला कारखाना है जो बिना किसी विदेशी सहयोग के स्थापित किया गया है। इसका प्रशासनिक भवन चार मंजिला है। इसमें रोशनी के लिए सीसे की दीवारें बनाई गई हैं। साल 2016 में इस प्लांट से पहली बार 250 ब्रॉड गेज पैसेंजर कोच के रेल पहिए निर्मित करके भेजे गए। 


यहां पर नयागांव रेलवे स्टेशन से एक रेलवे लाइन लाई गई है। इस कारखाना के खुलने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है। बेला से बस एक नए रास्ते से होती हुई सीधे नारायणी नदी पर सोनपुर हाजीपुर के बीच बने नए पुल पर पहुंच गई है। गंडक नदी के पुल को पार करने के बाद हम हाजीपुर शहर में हैं। संयोग से आज महात्मा गांधी सेतु पर जाम की स्थिति नहीं है। इसलिए हमारी बस शीघ्र ही पटना में प्रवेश कर गई है।

-          विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-          ( SIWAN, TARWARA, BASANTPUR, MARHURA, MORTON, PARSA, BELA, RAIL COACH FACTORY )

  


 

 

Friday, February 19, 2021

कामाख्या से चलकर थावे आईं थी मैया


थावे की मां भवानी दुर्गा मंदिर सिद्धपीठ माना जाता है। स्थानीय लोग से जागृत शक्ति पीठ मानते हैं। थावे का दुर्गा मंदिर कभी जंगल में हुआ करता था। आज भी यह दो तरफ से जंगलों से घिरा हुआ है। इस मंदिर का गर्भगृह काफी पुराना बताया जाता है। मंदिर पर लगे साइन बोर्ड पर लिखा है कि यह हथुआ राज की कुल देवी हैं। मंदिर का परिसर मनोरम है। मंदिर मां की प्रतिमा काले पत्थरों की बनी हुई है। यहां आने वाले भक्त माता को नारियल और चुनरी चढ़ा कर मन्नत मांगते हैं। आसपास के लोग परिवार में संस्कारों के लिए यहां पहुंचते हैं।

प्रतिवर्ष अष्टमी को यहां बलि का भी विधान है। इसे हथुआ राजपरिवार की ओर से संपन्न कराया जाता है। मंदिर के परिसर में एक अजीब वृक्ष है। इसके वनस्पति परिवार का अभी तक पहचान नहीं की जा सकी है। पेड़ क्रॉस की तरह बढ़ा हुआ है। मंदिर की मूर्ति और पेड़ के संबंध में लोगों में कई तरह की किंवंदन्तियां प्रचलित हैं।


मंदिर परिसर में पंडे बड़ी संख्या में तैनात नजर आते हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से मुंडन, यज्ञोपवीत, शादी आदि की दरें लिखी हुई हैं। पर यहां मौजूद पंडे लोगों से अतिरिक्त राशि लेने की कोशिश में लगे रहते हैं। मंदिर से जुडे हुए 300 पंडे हैं। हर रोज अलग अलग समय में इन पंडों की मंदिर में ड्यूटी की बारी आती है। श्रद्धालुओं की भीड़ के अनुसार पंडों ने आपस में अपना अपना समय तय कर रखा है। 


मंदिर की कथा - हथुआ के राजा युवराज शाही बहादुर वर्ष 1714 में चंपारण के जमींदार काबुल मोहम्मद बड़हरिया से दसवीं बार लड़ाई हारने के बाद फौज के साथ हथुआ वापस लौट रहे थे। वे थावे जंगल मे एक विशाल वृक्ष के नीचे पड़ाव डाल कर आराम करने लगे। के समय उन्हें अचानक स्वप्न में मां दुर्गा दिखीं। 


कहा जाता है कि स्वप्न में आए तथ्यों के अनुरूप राजा ने काबुल मोहम्मद बड़हरिया पर फिर से आक्रमण किया और जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने कल्याणपुर, हुसेपुर, सेलारी,  भेलारी, तुरकहा और भुरकाहा को अपने राज के अधीन कर लिया। जीत हासिल करने के बाद उस वृक्ष के चार कदम उत्तर दिशा में राजा ने खुदाई कराई। वहां दस फीट नीचे वन दुर्गा की प्रतिमा मिली। यहीं पर मंदिर की स्थापना की गई। 


 

भक्त रहषु की कथा-  शाही वंश से पहले इस क्षेत्र में चेरो वंश का राज हुआ करता था। चेरो वंश के राजा मनन सिंह खुद को मां दुर्गा के बड़े भक्त थे। एक बार उनके राज्य में अकाल पड़ गया। उनके राज में थावे में माता रानी का एक अनन्य भक्त रहषु भगत हुआ करता था। रहषु अकाल में बाघ से दौनी कराकर चावल निकालने लगा। यही वजह थी कि वहां के लोगों को खाने के लिए अनाज मिलने लगा। 


यह बात राजा तक पता चली तो राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने रहषु को बुलाकर पूछा। रहषु ने इस मां दुर्गा का प्रताप बताया।  राजा ने कहा मुझे भरोसा नहीं तुम मां को यहां बुलाओ। इस पर रहषु ने राजा से कहा कि यदि मां यहां आईं तो राज्य को बर्बाद कर देंगी, पर राजा नहीं माना। रहषु भगत के आह्वान पर देवी मां कामाख्या से चलकर पटना और सारण के आमी होते हुए थावे तो पहुंच गईं। पर इसके बाद राजा के सभी भवन गिर गए। थोड़े दिन बाद राजा भी मर गया।

 


थावे मंदिर में नेपाल, उत्तर प्रदेश, बिहार के कई जिले से श्रद्धालु पूजा-अर्चना एवं दर्शन करने आते हैं। वैसे यहां सालों भर भक्तों की कतार लगी रहती है। पर यहां चैत्र और शारदीय नवरात्र में पूजा करने का ज्यादा महत्व है। नवरात्रि के नौ दिनों में यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रों में यहां पर विशेष मेला भी लगता है। इसके अलावा इस मंदिर में सोमवार और शुक्रवार को विशेष पूजा होती है।


कैसे पहुंचे - यह मंदिर गोपालगंज से सिवान जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। गोपालगंज से थावे मंदिर की दूरी सिर्फ छह किलोमीटर है। गोपालगंज शहर से थावे जाने के लिए हर समय वाहन उपलब्ध रहते हैं। सीवान से मंदिर की दूरी 28 किलोमीटर है। वैसे थावे रेलवे स्टेशन भी है। यहां छपरा से ट्रेन से भी पहुंचा जा सकता है।

-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 



Wednesday, February 17, 2021

थावे की प्रसिद्ध मिठाई पैड़किया का स्वाद


चाचा जी के श्राद्ध कर्म में दो दिन गोपालगंज में गुजरा। हालांकि मैं मृतक भोज के खिलाफ हूं पर परिवार के सदस्यों के इच्छा के अनुरूप सब कुछ हुआ। अपनी इस बिहार यात्रा के दौरान गांव में कई तरह के बदलाव देख रहा हूं। पंजाब की तरह यहां भी मोबाइल आटा चक्की और धान कुटने वाली चक्कियां बन गई हैं। ट्रैक्टर के इंजन के साथ बनी ये चक्कियां आपके घर के दरवाजे पर पहुंच जाती हैं और आपके आर्डर के मुताबिक धान कूट कर निपटारा कर देती हैं। पहले हमलोग बैलगाड़ियों में धान को लाद कर पड़ोस के गांव के मिल तक ले जाते थे अब उसकी जरूरत ही नहीं रही। तो ये तकनीक का बदलाव है।

हमें 18 दिसंबर की सुबह पटना के लिए प्रस्थान करना था। पर इस बार इच्छा हुई कि गोपालगंज आना हुआ है तो थावे में प्रसिद्ध शक्ति स्थल भवानी माता के दर्शन कर लिए जाएं। तो हमलोग चल पड़े थावे के लिए। मंदिर के ठीक पहले थावे में छोटा सा बाजार है। पर इस बाजार में मुख्य रूप से थावे की स्थानीय मिठाई पेड़किया की दुकानें हैं।


थावे का पेड़किया लाजवाब मिठाई है। यह रसदार भी होता है और सूखा भी। जाहिर है कि दोनों के स्वाद में थोड़ा अंतर होता है। मूल रूप से इसमें खोवा भरा जाता है। यही सूजी या आटे के आधार पर बनाया जाता है। यहां पर वनस्पति में बने मिठाई की दरें 160 रुपये किलो है तो घी में बनी पेड़किया की दरें 250 से 300 रुपये किलो के बीच है। थावे के पेड़किया के दीवाने दूर दूर तक हैं। जिसे इसका स्वाद लग गया वह पैक कराकर अपने साथ ले जाता है।


यह मिठाई बिहार के शेष इलाके में मिलने वाली चंद्रकला या बनारस के प्रसिद्ध मिठाई लौंगलता की तरह ही है। इस मिठाई ने थावे की पहचान कुछ इस कदर बना दी है कि अब तो थावे का मतलब हो गया है पेड़किया।

थावे मंदिर के मार्ग में कई सारी दुकानें हैं जो पेड़किया बनाती हैं। पर इनमें गौरी शंकर के नाम से कई सारी दुकानें दिखाई देती हैं। सबके साईनबोर्ड पर लिखा दिखाई देता है  गौरी शंकर की शुद्ध मिठाई की दुकान।




तो ये गौरी शंकर कौन थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी मिठाई की दुकान खोली। बाद में उनके भाई और बच्चे अपनी अपनी दुकानें अलग करते गए। सबने इस विरासत को भुनाया। तो गौरी शंकर मिठाई की दुकानें कई दिखाई देने लगी हैं।   गौरीशंकर साह मूल रूप से सीवान जिले के जीरादेई थाना क्षेत्र के नरेंद्रपुर गांव के रहने वाले थे।


 उन्होंने सन 1947 में ठीक उसी साल जब देश आजाद हुआ था, एक साधु की सलाह पर पेड़किया बनाने का काम शुरू किया था। लोग  बताते हैं कि अपने पिता की मृत्यु के बाद गौरीशंकर साह अपने चार भाइयों के साथ थावे के विदेशी टोला निवासी अपने मामा बुनिलाल साह के यहां रखकर मिठाई का कारोबार शुरू किया। तब वे ये गांव-गांव में घूम कर गट्टा मिठाई बेचा करते थे। 



खाली समय में स्टेशन के पास दुकान खोल कर मिठाई बेचने लगे। इसी दौरान एक साधु  से उनकी मुलाकात हुई। साधु ने उन्हें आर्शीवाद देते हुए शुद्ध घी मिठाई बनाने की सलाह दी। इसके बाद गौरीशंकर पेड़किया बनाकर बेचने लगे। उनका यह कारोबार चल निकला। अब उनके परिवार के लोगों ने अलग अलग नाम से भी पेड़किया की दुकाने जमा ली हैं। वे दूसरी मिठाइयां भी बनाते हैं पर मांग सबसे ज्यादा पेड़किया की ही होती है।


ऐसे बनता है पेड़किया – पेड़किया में खोवा, मैदा, चीनी और शुद्ध घी का मिश्रण होता है। यह मिठाई सेहत के लिहाज से भी ठीक मानी जाती है। लोग सुबह के नाश्ते में एक पेड़किया खाते हैं।  इसका घी लोगों की सेहत ठीक रखता है।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( THAWE,SWEETS, PAIRAKIYA,  KHOWA ) 

Monday, February 15, 2021

उत्तर बिहार का लोकप्रिय नास्ता- लिट्टी और घुघनी


खिली खिली धूप में केसरिया बौद्ध स्तूप काफी सुंदर नजर आ रहा है। अच्छा लग रहा है कि स्थानीय लोग भी इसे देखने पहुंचते हैं। हम अपनी विरासत को नहीं पहचानेंगे तो और कौन इसका महत्व जानेगा। बौद्ध स्तूप के आसपास दूर-दूर तक खेत नजर आते हैं। पर अब सड़क पर थोड़ी दूर आगे एक लाइन होटल बन गया है। 


केसरिया का बाजार जिस तरह विस्तार ले रहा है उसे देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में बौद्ध स्तूप के आसपास काफी रौनक बढ़ जाएगी। फिलहाल तो स्तूप के आगे सिर्फ एक चाय नास्ते की दुकान है। मैं इस दुकान पर बैठ जाता हूं। यहां लिट्टी और घुघनी देखकर वैशाली जिले में गुजरा हुआ बचपन याद आ जाता है।


 दरअसल लिट्टी और घुघनी वैशाली जिले का लोकप्रिय नास्ता है। यह दक्षिण बिहार में बनने वाली लिट्टी से अलग होती है। वैशाली जिले की लिट्टी को तेल में छानकर बनाया जाता है। हालांकि इसके अंदर भी थोड़ा सा मशाला भरा जाता है। इसे चना मसाला यानी काले चने की बनी रसदान घुघनी के संग खाया जाता है।

मेरा बचपन कन्हौली में गुजरा। वहां पर बिट्ठल पंडित की लिट्टी घुघनी की दुकान हुआ करती थी। तब उसकी दरें बहुत कम हुआ करती थीं। पर बिट्टठल की लिट्टी खाने के लिए लोग दूर दूर से आते थे। आज एक बार फिर वही लिट्टी मेरी नजरों के सामने हैं। केसरिया में इस दुकान को एक गुप्ताजी चलाते हैं। एक प्लेट यानी दो लिट्टी और घुघनी 15 रुपये की है। मैं एक प्लेट आर्डर करके बैठ जाता हूं। वे लिट्टी के साथ कचरी भी बनाते हैं। पर मैं कचरी नहीं खाता। गुप्ता जी की लिट्टी और घुघनी का स्वाद अच्छा है। मैं सुबह सात बजे नास्ता करके चला हूं। अब दोपहर में बस एक प्लेट लिट्टी और घुघनी।   इतना ही काफी है।


पर गुप्ता जी बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान चार महीने स्तूप बंद रहा तो उनका काम भी बंद रहा। अब स्थानीय सैलानी आने लगे हैं तो थोड़ा बहुत काम चल पड़ा है। पर पहले जैसी रौनक अभी नहीं लौटी। वे बताते हैं कि जब विदेशी सैलानी आते थे तो खूब बिक्री होती थी। 


दरअसल आम दिनों में रोज केसरिया में 100 के करीब टूरिस्ट बसों में विदेशी सैलानी आते हैं। कुशीनगर से होकर वैशाली जाने वाले दुनिया के तमाम देशों के बौद्ध श्रद्धालु केसरिया में जरूर रुकते हैं। दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्तूप की परिक्रमा करने के बाद ही वे वैशाली का रुख करते हैं। तो इस दौरान उनके लिट्टी घुघनी की अच्छी बिक्री हो जाती है। अब गुप्ता जी को उम्मीद है कि भारत सरकार विदेशों से हवाई यात्राएं शुरू कर देगी तब विदेशी सैलानी इधर का रुख करेंगे। उन्हें भी इंतजार है कि कोरना काल का जल्दी से अंत हो और सब कुछ पहले की तरह चले।


लिट्टी घुघनी का स्वाद लेने के बाद मुझे यहां से केसरिया बाजार तक जाने के लिए एक शेयरिंग आटो रिक्शा मिल जाता है। दस रुपये में केसरिया बाजार में पहुंच गया। यहां से खजुरिया के लिए तुरंत ही बस मिल गई। ये बस पटना से आ रही है। खजुरिया में भी इंतजार नहीं करना पड़ा। गोपालगंज जाने वाली बस सामने चलने को तैयार थी। इसमें भीड़ बिल्कुल नहीं है। तो अगले एक घंटे में गोपालगंज। उसी मार्ग पर जिससे होकर तथागत कभी कुशीनगर गए होंगे।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

(   ( KESARIA, BUDDHA , LITTI GHUGHNI ) 


Saturday, February 13, 2021

केसरिया - दुनिया का सबसे बड़ा और विशाल बौद्ध स्तूप


अरेराज से पटना जाने वाली बस में बैठा हूं। बस खजुरिया से आगे बढ़ती हुई केसरिया पहुंचती है। खजुरिया मोड पर लोगों ने बताया था कि यहां से केसरिया की दूरी महज 10 किलोमीटर है। खजुरिया नेशनल हाईवे नंबर 27 पर है। यहां से आप अरेराज और केसरिया दोनों जगह सुगमता से जा सकते हैं। 


खजुरिया के बाद हुसैनी, नया गांव फिर केसरिया बाजार आ जाता है। खजुरिया से केसरिया तक आटो रिक्शा से भी पहुंचा जा सकता है। केसरिया बाजार में बस से काफी लोग उतरते हैं। पर मैं बस कंडक्टर से आग्रह  करता हूं कि मुझे बौद्ध स्तूप के पास उतरना है। केसरिया बौद्ध स्तूप केसरिया बाजार से दो किलोमीटर आगे साहेबगंज रोड पर है। तो मैं बस से ठीक स्तूप के सामने उतर जाता हूं।

मुझे थोड़ा अफसोस हो रहा है कि वैशाली जिले में अपना लंबा वक्त गुजारने के बाद भी मैं यहां पर इतनी देर से क्यों पहुंचा हूं।  वैसे केसरिया पूर्वी चंपारण जिले में है। पर यह मुजफ्फरपुर के साहेबगंज शहर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं वैशाली से इसकी दूरी 50 किलोमीटर है। केसरिया बौद्ध धर्म के पावन तीर्थ स्थलों में से एक है। 


मेरी आंखों के सामने केसरिया का विशाल बौद्ध स्तूप है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध अपने आखिरी दिनों में जब महापरिनिर्वाण ग्रहण करने कुशीनगर जा रहे थे तो उस यात्रा के दौरान वह एक दिन के लिए केसरिया में ठहरे थे। बुद्ध जिस स्‍थान पर पर वह ठहरे थे वहीं पर सम्राट अशोक ने उनकी याद में विशाल स्‍तूप का निर्माण करवाया था। इसे विश्‍व का सबसे बड़ा स्‍तूप माना जाता है। 


1998 खुदाई में पता चला - पर यह विशाल स्तूप 1998 से पहले ज्यादा लोगों के ध्यान में नहीं था। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा केसरिया में उत्खनन के बाद दुनिया का सबसे ऊंचे बौद्ध स्तूप के बारे में पता चला। इसके मिलने के बाद बिहार ने अपने अतीत का एक विशाल गौरव फिर से प्राप्त कर लिया।


केसरिया के बौद्ध स्तूप की ऊंचाई  अभी भी 104 फीट है। हालांकि अतीत में यह स्तूप और भी ऊंचा था। इंडोनेशिया स्थित विश्व प्रसिद्ध बोरोबदुर (जावा) बौद्ध स्तूप की ऊंचाई 103 फीट है। इस तरह से केसरिया विश्व का सबसे चा स्तूप है। ये दोनों ही स्तूप छह तल्ले वाले हैं। इनके प्रत्येक दिवाक खंड में बुद्ध की मूर्तिया स्थापित की गई हैं। स्तूप में लगी ईंटों की पहचान मौर्य कालीन के तौर  पर हुई है। स्तूप में स्थापित सभी बुद्ध मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में है। हालांकि इनमें से कई बुद्ध मूर्तियां खंडित हो गई हैं।


इस स्तूप के बारे में 1861-62 में  कनिंघम ने लिखा है कि केसरिया का यह स्तूप 200 ईस्वी से 700 ईस्वी के बीच में कभी बना होगा। वहीं चीनी यात्री फाहियान के अनुसार केसरिया के देउरा स्थल पर भगवान बुद्ध कुशीनगर जाने के क्रम में अपने साथ आए वैशाली के भिझुकों को अपना भिक्षा पात्र प्रदान किया था।


आज केसरिया के विशाल बौद्ध स्तूप को देखने बड़ी संख्या में स्थानीय सैलानी तो पहुंचते ही हैं, विदेशों से हजारों  पर्यटक एवं बौद्ध भिक्षुक रोजाना पहुंचते हैं।  मैं केसरिया बौद्ध स्तूप की चारों तरफ से परिक्रमा करता हूं। स्तूप को हर ओर से निहारने की कोशिश करता हूं।


स्तूप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से संरक्षित है। फिलहाल प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। पर बिहार सरकार की ओर से इसके चारों तरफ बाउंड्री करा दी गई है। प्रवेश द्वार पर पेयजल और शौचालय का निर्माण कराया गया है। यहां सुरक्षा गार्ड और बिहार पुलिस के जवान भी तैनात रहते हैं। स्तूप के ऊपर किसी को भी चढ़ने की मनाही है। पहले काफी लोग ऊपर चढ़ने लगते थे। अब पुलिस ऐसा करने वालों को रोकती है।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 

     ( KESARIA, CHAMPARAN, BUDDHA )