Saturday, November 7, 2020

एएनडी हॉस्टल की वह पहली रात

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रवेश परीक्षा में मेरी रैंक सेकेंड टॉप आई थी। कुल 250 में 222 अंक। मुझसे ज्यादा अंक उत्तम कुमार के थे। तो मुझे मेरा पसंदीदा विषय मिल गया इतिहास में ऑनर्स यानी प्रतिष्ठा। सन 1989 में बिहार में इंटर विज्ञान पास करने के बाद हालांकि मैं बिहार में ही बीए में एडमिशन ले चुका था। पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए मैंने बिहार विश्वविद्यालय का 1989-92 बीए का सत्र छोड़ कर बीएचयू में 1990-93 सत्र में नामांकन ले लिया। हालांकि आगे एक साल पीछे सत्र में आने का भी लाभ हुआ। मैं जून 1993 में बीए पास कर गया। पर मेरे बिहार वाले साथी सत्र लेट होने के कारण अंतिम वर्ष की परीक्षा भी नहीं दे सके थे।


वह जून 1900 का आखिरी सप्ताह था। सामाजिक विज्ञान संकाय में सारे प्रमाण पत्र चेक कराने और सेंट्रल ऑफिस में जाकर फीस जमा करने के बाद मेरा नामांकन हो गया। अब हॉस्टल के लिए आवेदन किया। बीएचयू में हर संकाय के लिए अलग अलग हॉस्टल है। तो सामाजिक विज्ञान संकाय का हॉस्टल है स्नातक कक्षा के लिए आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास। यह 1986 में बना बीएचयू के नए छात्रावासों में एक है। मेरिट के हिसाब से मुझे हॉस्टल तुरंत आवंटित हो गया। हर कमरे में दो छात्र रहते थे। तो मेरे रूम पार्टनर बने राजीव कुमार सिंह। वे बिहार के वैशाली जिले के ही रहने वाले हैं। हमलोग हाजीपुर से ही एक दूसरे को जानते थे।
जुलाई के प्रथम सप्ताह में हॉस्टल आवंटित होने के बाद मैं अपने स्थानीय अभिभावक गजेंद्र नाथ शुक्ला जी के महामना पुरी कालोनी वाले घर से सामान लाकर हॉस्टल में शिफ्ट हो गया। पहले दिन प्रथम वर्ष से मेरा अलावा राजीव भाई, शिवलखन सिंह जैसे कुछ लोग शिफ्ट कर चुके थे। दिन भर शिफ्टिंग की दौड़ भाग में मैं थक चुका था। सो रात को जल्दी ही नींद आ गई। कोई रात क 11 बजे होंगे। किसी ने मेरे 78 नंबर कमरे का दरवाजा जोर से खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला सेकेंड ईयर के एक बंगाली छात्र ने ऊंची कहा कमरा नंबर 52 में पहुंचो। मैं सशंकित सा बनियान और लूंगी पहने कमरा नंबर 52 में पहुंचा।उस कमरे में तकरीबन 20 सेकेंड ईयर के छात्र बैठे थे। मुझे देखते ही बोले ये क्या पेटीकॉट पहनकर आ गए हो जाओ पैंट शर्ट पहनकर आओ। मैं वापस कमरे में आया। दुबारा वापस लौटने के साथ मैं समझ चुका था कि अब मेरी रैगिंग होने वाली है। तो मैं मानसिक रूप से तैयार हो गया। पहले समान्य परिचय, गांव घर, परिवार पढ़ाई लिखाई के बारे में। उसके बाद ढेर सारे कथित  बोल्ड सवाल। मामला दो घंटे से ज्यादा पहुंच गया। मैंने कहा, बाकी बातें कल कर लें तो अच्छा मैं काफी थक चुका हूं। पर सीनियर डांटने लगे। और एक घंटे बाद उन्होंने टास्क दिया – अब नीचे जाओ कमरा नंबर एक से 22 तक थर्ड ईयर के छात्र रहते हैं। हर कमरे को नॉक कर सीनियर को जगाकर अपना परिचय दो। कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। हम जांच भी करेंगे।

मैं रात के तीन बजे थका मांदा इस टास्क को पूरा करने में लग गया। पर तृतीय वर्ष के छात्रों का व्यवहार अच्छा था। हर कमरे में परिचय देने में मुझे तीन से पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगे। एक, दो, तीन, चार, पांच, छह के बाद जैसे ही मैंने सात नंबर का दरवाजा खटखटाया जीतेंद्र द्विवेदी ने दरवाजा खोला। मैंने बताया फ्रेशर हूं। सेकेंड इयर वालों ने हर कमरे में जाकर परिचय देने को कहा है। कहां घर है- मैंने कहा वैसे तो रोहतास जिले में है पर वैशाली और मुजफ्फरपुर जिले से पढ़ाई करके यहां आया हूं। रोहतास जिले में कौन सा गांव – सोहवलिया। तो तुम मदन दूबे को जानते हो। मैंने अपने दिमाग की स्मृतियों के गलियारे में ले गया। करोगे याद तो हर बात याद आएगी। मदन दूबे मेरे गांव के रंगनाथ दूबे के बेटे हैं। मुझसे पांच-छह साल बड़े। जीतेंद्र भाई ने बताया – मदन दूबे बीएचयू में एमए पॉलिटिकल साइंस के छात्र हैं। साथ ही एनएसयूआई के छात्र नेता भी हैं। मैं उनके साथ ही रहता हूं। तुम उनके गांव के हो, यह खुशी की बात है। भला तुम्हारी रैगिंग करने की कोई हिम्मत कैसे कर सकता है। जाओ अपने कमरे में सो जाओ। कोई पूछे तो मेरा नाम लेकर मेरे कमरे में भेज देना। घंटों की रैंगिग से मैं टूट गया था पर जीतेंद्र द्विवेदी से मुलाकात से ढाढस बंधी। अगले फैकल्टी में मैत्री जलपान गृह में पार्थ बनर्जी मिल गए। हमारे सेकेंड ईयर के इस सीनियर ने पूछा, तुमने बाहों में काली पट्टी क्यों नहीं बांधी... दरअसल हमें सीनियर का आदेश हुआ था कि जब तक फ्रेशर पार्टी न हो जाए सबको हॉस्टल में हर वक्त काली पट्टी बांधनी है। मैंने बड़े अदब से कहा, पट्टी बांधने का फरमान तो सिर्फ हॉस्टल के लिए है। कैंटीन और फैकल्टी में पट्टी बांधे तो डे स्कॉलर छात्रों के बीच हम हीन भावना से ग्रस्त हो जाएंगे। पर पार्थ ने मुझे बुरी तरह डांटते हुए कहा, चुपचाप हमारा आदेश मानो।
थोड़ी देर बाद मैं दोपहर में हॉस्टल लौटा तो 34 नंबर कमरे में फिर सेकेंड ईयर के छात्रों ने बुलाया। वे लोग फिर कई तरह के सवाल करने लगे। मैंने आग्रह किया, रैगिंग रात में होती है, आपलोग दिन में भी। फिर मुझे तेज डांट पड़ी। फिर कहा, चलो इस कुरसी के नीचे से लेटकर आरपार हो जाओ। मैंने कोशिश की और आरपार हो गया। बड़ी मुश्किल से जान छूटी अपने कमरे में पहुंचा। इसी बीच सात नंबर वाले जीतेंद्र द्विवेदी मेरे कमरे में आए। चलो मदन दूबे आए हैं। तुम्हें बुला रहे हैं। मुझसे मिलते ही मदन दूबे ने पूछा – तो तुम कन्हैया सिंह के बेटे हो। प्रयाग सिंह के नाती। मुझे पहचानते हो। मैंने कहा, बचपन में आपको देखा था। वे बोले हां, मैं तुम्हारे बगीचे से नीबू तोड़ा करता था। अब मुझे मदन दूबे से मुलाकात के बाद एक संबल मिल चुका था।
उन्होंने पूछा सुना है तुम्हारी रैगिंग हुई। क्या क्या हुआ। दोपहर में कुरसी वाले प्रकरण और कैंटीन में काली पट्टी बांधने वाली बातें मैंने उन्हें बता दीं। वे गरजते हुए बाहर निकले। कुछ सेकेंड ईयर के छात्रों को बुलाया। उन्हें फटकार लगाने लगे। तभी पार्थ बनर्जी ने उन्हें कुछ समझाने की कोशिश की। गुस्से में मदन दूबे ने पार्थ बनर्जी को कुछ थप्पड़ मारे। पार्थ नीचे गिर पड़े। उसके बाद हंगामा हो गया। इस घटना से मैं कुख्यात हो गया। मेरी ही क्या हॉस्टल में सबकी रैगिंग बंद हो गई। पर इसके आगे भी काफी कुछ हुआ, इस पर फिर बात करेंगे।
-       विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-       (AND HOSTEL, BHU, RAGGING, SOCIAL SCIENCES, COLORS OF BANARAS )  
   

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