Saturday, October 24, 2020

भारत कला भवन - यहां देखिए अकबर ने चलाया था राम सीता का सिक्का


पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्लाय परिसर में पढ़ाई के दौरान बीएचयू के हरी भरी सड़कों पर अक्सर घूमता रहता। कभी पैदल कभी अपनी हरी साइकिल पर। इस दौरान हमारे सामाजिक विज्ञान संकाय से लंका की तरफ बढने पर दाहिनी तरफ भारत कला भवन  का साइनबोर्ड दिखाई देता था। अक्सर कौतूहल होता की ये क्या है। तो एक दिन मैं भारत कला भवन के अंदर चला गया। वहां स्वागत कक्ष पर डॉक्टर रघुबीर कुशवाहा मिले। उनसे पता चला कि भारत कला भवन एक संग्रहालय है। तो मैं अंदर घूमने चला गया।

दरअसल भारत कला भवन दो मंजिला संग्रहालय भारतीय इतिहास और संस्कृति का अदभुत संग्रह है। मूर्तिकला, पांडुलिपियां, सिक्के, कठपुतली और तमाम तरह के संग्रह जो इतिहास संस्कृति में रूचि रखने वालों को लुभाते हैं। पांच साल के दौरान कई बार और भारत कला भवन जाना हुआ। कई बार दोस्तों के साथ कई बार बीएचयू आने वाले मित्रों को दिखाने के लिए।

अकबर ने चलाया था राम सीता का सिक्का - भारत कला भवन में अकबर द्वारा चलाया गया वह चांदी का सिक्का भी देखा जा सकता है, जिसमें राम और सीता की मूर्तियां बनी हुई हैं। इनमें एक तरफ भगवान राम हाथ में धनुष लिए और माता सीता हाथ में पुष्प लिए है। इसमें नागरी भाषा में राम-सीया लिखा है। यह सिक्का 1604 में जारी किया गया था। अकबर ने चांदी के अलावा सोने भी राम सीता का सिक्का जारी करवाया था। अकबर ने ये सिक्का जारी कर तू ही राम है तू ही रहीम है का सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया था।

एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय संग्रहालय -  विश्वविद्यालय परिसर में स्थित इस संग्रहालय को देखने के लिए तब कोई प्रवेश शुल्क नहीं था। तो यह भी जान लिजिए कि यह एशिया का सबसे बड़ा किसी विश्वविद्यालय में स्थित संग्रहालय है। यहां की चित्र वीथिकाओं में 12वीं से 20वीं शती तक के भारतीय लघु चित्र प्रदर्शित हैं। इनके चित्रण में ताड़ पत्र, कागज, कपड़ा, काठ, हाथी दांत आदि का उपयोग किया गया है।

चित्र वीथिका में प्रदर्शित चित्रों का क्रम गोविन्द पाल के शासन के चतुर्थ वर्ष (12वीं शती) में चित्रित बौद्ध ग्रंथ 'प्रज्ञा पारमिता' से प्रारंभ होता है। वहीं लघु चित्रों की विकास गाथा पूर्वी भारत में चित्रित पोथी चित्रों से आरंभ होती है, जिनमें अजंता-भित्ति चित्रों की उत्कृष्ट परंपरा के साथ ही मध्यकालीन कला विशिष्टताओं का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है। भारत कला भवन के ठीक बगल में बीएचयू का फाइन आर्ट्स संकाय स्थित है।

अक्सर फाइन आर्ट्स के छात्र संग्रहालय में आकर अपना ज्ञानवर्धन करते देखे जा सकते हैं। यहां का चित्र संग्रह, विशेषकर लघु चित्रों का विश्व में विशिष्ट स्थान है। भारत में प्रचलित लगभग समस्त शैलियों के चित्रों का विशाल संग्रह इस संग्रहालय में है।

पद्मभूषण रायकृष्ण दास ने की थी स्थापना - भारत कला भवन की स्थापना 1920 में भारत कला परिषद के तौर पर हुई थी। इसकी स्थापना विख्यात कला मर्मज्ञ राय कृष्णदास ने की थी। उन्हें भारत सरकार ने पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन 'भारत कला भवन' के लिए संग्रह हेतु समर्पित कर दिया। उनकी कला कृतियों के संयोजन में काफी अभिरुचि थी। रायकृष्ण दास का जन्म 7 नवंबर 1892 को वाराणसी में हुआ था। उनकी निधन 1980 में 21 जुलाई को हुआ। वे आजीवन भारत कला भवन को अपनी सेवाएं देते रहे। उनका संबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से था। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना भी की और कला पत्रिका का संपादन किया। 

भारत कला भवन को वर्तमान स्वरूप 1950 में मिला। राय कृष्णदास का नंदलाल बसु, काशी प्रसाद जायसवाल और अवनींद्र नाथ बसु जैसी महान हस्तियों से मित्रता थी। कला भवन संग्रह में इन सब लोगों की सलाह ली गई। इसके संग्रहालय में लगभग 12 हजार विभिन्न शैलियों के चित्र संकलित हैं। यहां मुगल चित्र कला, बसोही चित्रकला और बंगाल शैली के चित्र बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। तो कभी बनारस जाना हो तो आप भारत कला भवन जरूर जाएं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( BHARAT KALA BHAWAN, BHU, VARANASI, COLORS OF BANARAS )

2 comments:

  1. मैं कई बार इसके अंदर घूमने गया हूं। मुझे बड़ा ही रमणीय लगता है। सचमुच बीएचयू ज्ञान का अथाह समंदर है।

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