Tuesday, November 3, 2020

कीर्तिमान कायम करता डीजल रेल इंजन कारखाना


वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का जिस तरह हरा भरा खूबसूरत परिसर है, ठीक वैसा है सुंदर परिसर डीजल रेल इंजन कारखाना का है। इसे संक्षेप में डीएलडब्लू या डीरेका कहते हैं। जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि यहां रेलवे का इंजन बनता है।   डीरेका मंडुवाडीह (बनारस) रेलवे स्टेशन के बिल्कुल करीब है। मंडुवाडीह से इलाहाबाद ( प्रयागराज) की ओर जाने वाली रेलवे लाइन डीरेका परिसर से होकर गुजरती है। परिसर में इसका भूलनपुर नामक रेलवे स्टेशन भी है। 


दरअसल डीरेका के निर्माण में जिन गांवों की जमीन ली गई थी उनकी स्मृतियां अभी भी बची हुई हैं। जैसे एक प्रमुख स्टाफ कालोनी का नाम जलालीपट्टी है। मैं जब 1990 में बनारस गया तो डीरेका मेरा बीएचयू के बाद दूसरा घर बन गया। यहां मेरे मामा जी श्री छठू सिंह नौकरी करते थे। तो अक्सर शनिवार रविवार को उनके यहां जाना होता। मेरी सारी स्थायी डाक भी बाद में उनके पते पर ही आने लगी। अब मामाजी अवकाश प्राप्त कर गए हैं पर उनके बेटे मनोज संयोग से डीएलडब्लू में ही कार्यरत हैं।



डीजल रेल इंजन कारखाना वाराणसी की स्थापना 1961 में की गई थी। जैसा कि नाम से स्पष्ट होता है कि यहां पर डीजल रेल इंजन का निर्माण होता था। पश्चिम बंगाल के चित्तरंजन में सीएलडब्लू है जो बाद में सिर्फ बिजली चलित इंजन बनाने लगा। तो डीरेका वाराणसी में मीटरगेज और ब्रॉडगेज के इंजनों का निर्माण किया जा रहा था। 1993 से पहले मीटर गेज के डीजल इंजनों का भी निर्माण किया जाता था। पर मार्च 2019 से यहां डीजल इंजन का भी निर्माण बंद कर दिया गया है। क्योंकि अब देश में रेलवे का 100 फीसदी विद्युतीकरण का लक्ष्य है तो अब डीजल से चलने वाले इंजनों की भविष्य में कोई जरूरत नहीं होगी। वर्तमान में DLW केवल इलेक्ट्रिक इंजन WAP-7 और WAG-9HC का उत्पादन करता है।


डीजल से विद्युत इंजन में कन्वर्जन – डीएलडब्लू में 2018 से डीजल चलित इंजन को विद्युत चलित इंजन में बदलने का भी काम किया जा रह है। दरअसल पूरी तरह सारी लाइनों विद्युतीकृत हो जाएंगी तो डीजल के इंजन बेकार न हो जाएं इसलिए ऐसा किया जा रहा है।

डीरेका पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के सपनों का कारखाना है, जिसे वे राष्ट्र मंदिर की संज्ञा देते थे। 23 अप्रैल 1956 को देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस कारखाने की आधारशिला रखी थी। अगस्त 1961 से यहां लोकोमोटिव का उत्पादन की प्रक्रिया शुरू हुई। शुरुआत में लोकोमोटिव निर्माण के लिए तकनीकी करार अमेरिकन लोकोमोटिव कंपनी (एल्को) से किया गया था।  सन 1964 में यहां से पहला ब्रॉडगेज का लोकोमोटिव डब्लूडीएम2 का उत्पादन हुआ। वहीं 1961 में पहले मीटर गेज लोकोमोटिव वाईडीएम4 का लोकार्पण हुआ। साल 1976 में यहां से तंजानिया के लिए लोकोमोटिव एक्सपोर्ट किया गया। बाद में वियतनाम, श्रीलंका और बांग्लादेश में भी लोकोमोटिव का निर्यात किया गया। मार्च 1999 तक यहां से 4000 लोकोमोटिव का उत्पादन हो चुका था। वहीं 2007 में यह आंकड़ा 5000 को पार कर गया। डीरेका की उत्पादन क्षमता 275 लोकोमोटिव प्रति वर्ष की है। अब तक यहां 8000 से अधिक लोकोमोटिव का उत्पादन हो चुका है।

जनवरी 2013 में संस्थान ने अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया। वहीं 2017 में यहां से पहला विद्युत चलित लोकोमोटिव उत्पादित हुआ। अब 100 से ज्यादा विद्युत चलित लोकोमोटिव उत्पादित हो चुके हैं।
डीरेका का हरा भरा परिसर कई सौ एकड़ में फैला है। कारखाना के अलावा यहां विशाल रेलवे कालोनी बनी है। इसमें अधिकारी और कर्मचारियों के लिए आवास बने हैं। कैंपस में कई स्कूल, अस्पताल और शॉपिंग सेंटर भी हैं। परिसर में देश के हर राज्य लोग रहते हैं। तो डीरेका का परिसर अपने आप में एक मिनी भारत है। यहां पर मनोरंजन के लिए एक सिनेमाघर भी बना है। जहां कभी रियायती दरों पर स्टाफ के लिए फिल्में देखने का इंतजाम था। मामा जी के सौजन्य से मैंने भी इस प्रेक्षागृह में कई फिल्में अत्यंत रियायती दरों पर देखी थीं।

अब बन गया बनारस रेल इंजन कारखाना -
29 अक्तूबर 2020  को  डीएलडब्लू का नाम बदलकर बनारस रेल इंजन कारखाना कर दिया गया। केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन जारी करने के बाद साइन बोर्ड बदलने लगे। दरअसल  अब यहां   इलेक्ट्रिक इंजनों का निर्माण हो रहा है तो ऐसे में  नाम से डीजल शब्द हटाना जरूरी था। तो अब  संक्षेप में इसे BLW  के नाम से जाना जाएगा।   हालांकि  लोगों की जुबान पर चढ़ा डीएलडब्लू बदलते बदलते वक्त लगेगा। 
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(  (DLW, BLW, LOCOMOTIVE, VARANASI, MANDUWADIH ) 




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