Friday, October 30, 2020

बनारस - हम इस शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह...




जिस शहर में मैंने जिंदगी के पांच साल गुजारे हों उसी शहर में एक बार फिर मुसाफिर की तरह भटकना। गुलाम अली की गजल याद आती है हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह। बस एक मुलाकात का मौका दे दो... मिलने वाले तो कई हैं पर फिलहाल किसी से नहीं मिलना। कचौड़ी गली से निकलकर मैं पैदल ही मैदागिन की तरफ बढ़ चलता हूं। चौक। बनारस का प्रसिद्ध चौराहा। गोदौलिया चौराहा से सीधी सड़क बांस फाटक होते हुए चौक तक आती है।   


चौक पर चौक थाना की ऐतिहासिक लाल रंग की इमारत नजर आती है। सड़क पार करके दूसरी तरफ जाएं तो दाल मंडी का इलाका है। इसी दाल मंडी में बनारस के प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद रहते थे। उनके पिता का नाम सुंघनी साहू था। बनारस में काशी हिंदू विश्व विद्यालय में पढ़ाई के दौरान जब मैं गोदौलिया की तरफ घूमने आता था तो बांस फाटक पर राम मंदिर के परिसर में साइकिल लगा देता था उसके बाद मैदागिन तक पैदल घूमता हुआ जाता था। दोनों तरफ के बाजारों को देखते हुए। आज फिर उसी वक्त को जीना चाहता हूं। उसी तरह पैदल-पैदल। 

चौक पर बनारस की प्रसिद्ध पान की दुकान मेरी नजरों के सामने है। रामेश्वर प्रसाद चौरसिया की पान की दुकान। बनारस तो पान के लिए प्रसिद्ध है। फिल्म डॉन में खाइके पान बनारस वाला गीत ने यहां के पान को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। तो बनारस के हर चौक चौराहे पर पान की प्रसिद्ध दुकाने हैं। चौक पर रामेश्वर प्रसाद चौरसिया  की दुकान कई पीढियों से चलती आ रही है। यहां आप कई तरह के पान का स्वाद ले सकते हैं। इनकी दुकान पर लगे बोर्ड पर लिखा है - छोटी सी दुकान बड़ी दास्तान... साइन बोर्ड पर कुछ प्रसिद्ध हस्तियों की पान खाती हुई तस्वीर भी लगी है। इंदिरा गांधी, कमलापति त्रिपाठी, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों ने भी इस दुकान के पान का स्वाद चखा है। 

इसी चौक पर विश्वविद्यालय प्रकाशन की पुस्तकों के विशाल दुकान है। वे बनारस के लोकप्रिय प्रकाशक भी हैं। अपने पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में मैंने एक फीचर लिखा था तब विश्वविद्यालय प्रकाशन के मालिक पुरुषोत्तम दास मोदी का साक्षात्कार करने के लिए उनसे मुलाकात की थी। अब प्रकाशन को उनकी अगली पीढ़ी देखती है। 
इसी चौक पर चौखंबा विद्या भवन भी है। वे संस्कृत भाषा  की पुस्तकों के जाने माने प्रकाशक हैं। उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकें दुनिया के 40 देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। देश दुनिया हर संस्कृत विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में उनकी पुस्तकें चलाई जाती हैं। 
चौक से आगे बढने पर आता है बुलानाला। बताते हैं कि यहां कभी नाला बहता था इसलिए नाम है बुलानाला। पर अब बुलानाला बनारस का बड़ा व्यापारिक केंद्र है। मैंने छात्र जीवन में अपनी हरे रंग की प्यारी सी साइकिल यहीं से खरीदी थी। 

बनारस के पुराने प्रसिद्ध सिनेमा घर चौक से मैदागिन के बीच में हुआ करते थे। दीपक, राधा और चित्रा। ये सिनेमा घर थियेटर के जमाने के थे। जब पृथ्वी राज कपूर अपना थियेटर लेकर यहां आते थे। अब वे पुराने सिनेमा घर बंद हो चुके हैं। पर इस सड़क पर पुरानी नक्काशीदार इमारतें आज भी मौजूद हैं जो बनारस के पुराने दिनों की याद दिलाती हैं। 

बुलानाला से आगे बढ़कर आप नीची बाग पहुंच जाते थे। हो सकता है किसी जमाने में यहां बाग रहा हो पर अब तो कई प्रसिद्ध साड़ियों की दुकाने हैं। इसी इलाके में बनारस के प्रसिद्ध सांध्यकालीन अखबार गांडीव का दफ्तर हुआ करता है। इस अखबार के फीचर प्रभारी अत्रि भारद्वाज के पास मैं अपने लेख और कविताएं प्रकाशन के लिए देने जाया करता था। कई बार वे मुझसे ऑन डिमांड लेख और कविताएं लिखवाया करते थे। हालांकि पैसे नहीं मिलते थे पर तब इस सांध्यकालीन अखबार गांडीव में अपना नाम प्रकाशित देखकर ही काफी खुशी हो जाती थी। इसी सड़क पर अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज और हरिश्चंद्र डिग्री कॉलेज स्थित हैं। 

बनारस में सड़कों पर रात दस बजे भी बाजार गुलजार है। मैं मैदागिन पहुंच गया हूं। मैदागिन चौराहे पर श्री बिहारी लाल दिगंबर जैन धर्मशाला की विशाल इमारत नजर आती है। यह भी अब बनारस के आईकोनिक इमारतों में शामिल हो चुकी है। इस धर्मशाला का निर्माण 1871 में हुआ था। कभी मैदागिन इलाके में पहले एक गुजराती भोजनालय भी हुआ करता था। वहां जमीन पर बैठकर जीमने की व्यवस्था हुआ करती थी। इसे एक गुजराती परिवार ही चलाता था। पता नहीं अब वह भोजनालय चल रहा है या नहीं। 

मैदागिन से कुछ ऑटो रिक्शा से सीधे मुगलसराय भी जाते हैं। पर वे ज्यादा किराया मांग रहे हैं। तो मैं मैदागिन से कैंट रेलवे स्टेशन का ऑटो रिक्शा ले लेता हूं। कबीर चौरा, लहुराबीर, मलदहिया, इंग्लिशिया लाइन होते हुए वाराणसी कैंट पहुंच गया हूं। कैंट से रात को 11 बजे के बाद एक ऑटो रिक्शा मिला। शेयरिंग में मुगलसराय का किराया 30 रुपये मांगे। मैं ऑटो में बैठ गया। इस आटो वाले ने एक कुत्ता पाला हुआ है। इस कुत्ते को अपने ऑटो की छत पर खड़ा कर रखा है। सारे रास्ते में आसपास लोग इस ऑटो रिक्शा को कौतूहल से देख रहे हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( COLORS OF BANARAS, GODAULIA, BANS PHATAK, CHAWK, BULANALA, NICHIBAG, MAIDAGIN, VISHWAVIDYALAYA PRAKASHAN) 

2 comments:

  1. जीवंतता को समेटे हुए एक सुंदर स्मरण।

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