Friday, November 13, 2020

लद्दाख से परिचित कराती एक बेहतरीन पुस्तक

 सन 2019 में लद्दाख भारत देश में एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गया। वैसे लद्दाख तो सांस्कृतिक तौर पर काफी पहले से ही जम्मू और कश्मीर से अलग था। लद्दाख के लोगों की लंबे समय से यह दबी इच्छा थी  कि उनका अलग राज्य बन जाए। हालांकि इसके लिए कभी कोई उग्र आंदोलन नहीं हुआ। पर उनकी मुराद पूरी हो गई है। महान घुमक्कड़ और समाजवादी चिंतक कृष्णनाथ ने काफी पहले लद्दाख की बड़ी रोचक यात्राएं की थी।

हालांकि वे अलग प्रदेश बने लद्दाख को देखने के लिए कृष्णनाथ इस दुनिया में नहीं हैं। पर उनकी यात्रा वृतांत पर आधारित अनूठी पुस्तक लदाख में राग-विराग हमारे पास मौजूद है।
वैसे हिमालय पर कृष्णनाथ की कुल तीन पुस्तकें हैं। स्पिति में बारिश, किन्नर धर्मलोक और तीसरी पुस्तक है लदाख में राग-विराग। तीनों ही पुस्तकें अदभुत हैं। दो मैं पढ़ चुका था लद्दाख पर ये पुस्तक काफी देर से पढ़ने को मिली। अपने साथी धर्मेंद्र सुशांत की सौजन्य से।
लेखक लद्दाख की यात्रा पर निकलें हैं। वे श्रीनगर से लद्दाख की राजधानी के शहर लेह की ओर जा रहे हैं। कृष्णनाथ की खास बात है कि वे आम आदमी की तरह यात्राएं करते हैं। सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं। वे करगिल होते हुए लेह पहुंच रहे हैं। उनकी यात्रा संस्मरण में उनका चिंतन और दर्शन भी साथ साथ चलता रहता है। यह साहित्य प्रेमियों और ज्ञान पिपासु लोगों को आनंदित करता है। 

उनकी यात्रा में लेह में उनका लंबे समय तक प्रवास के रंगों का चित्रण है। बौद्ध मठों में उनकी खास रुचि है। तो बौद्ध गोंपाओं की सैर कराते हैं वे पाठकों को। साथ ही लद्दाख में बौद्ध धर्म पर काफी सूक्ष्मता से प्रकाश डालते हैं। लद्दाख के लोगों के तिब्बत से लगाव की बातें भी सुनाते हैं।
लद्दाख में आज भी जो बौद्ध भिक्षु कभी अपने जीवन काल में तिब्बत गया हो तो उसका सम्मान बढ़ जाता है।
पिछले कुछ सालों से लद्दाख में पर्यटन काफी बढ गया है। 

आजकल सैलानी हवाई जहाज, मोटरकार, बाइक और बस से खूब लेह की तरफ जाने लगे हैं। पर लद्दाख के जीवन को जैसा कृष्णनाथ जी ने अनुभूत किया है बहुत कम लोग ही कर पाते होंगे। पुस्तक में लद्दाख के चित्र भले ही नहीं हैं पर उनके लिखे शब्द चित्रों की कमी पूरी करते हैं। लेखक को पढ़ते हुए एक शब्द चित्र आपके जेहन में चलता रहता है। लेखक ने अपने लद्दाख प्रवास के दौरान सिर्फ लेह ही नहीं बल्कि इसके आसपास के कई गांवों के बौद्ध मठों की यात्राएं की थी। उन यात्राओं के वर्णन काफी रोचक हैं। 

हिमालय की खोज कृष्णनाथ जी की अपनी खोज भी है। इसी कारण यह यात्रा कथा अत्यंत करुण और मार्मिक बन गई है। कृष्णनाथ जी का जन्म 26 जून 1934 में वाराणसी में एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार में हुआ था। बौद्ध धर्म पर उनका काफी गहरा अध्ययन रहा।

अपने जीवन के आखिरी समय में वे हर साल कुछ महीने बेंगलूर के पास स्थित कृष्णमूर्ति स्टडी सेंटर में एकान्त प्रवास करते थे। जब वह दक्षिण भारत में नहीं रहते तब या तो हिमालय के किसी इलाके में भ्रमण करते या काशी के निकट सारनाथ में रहते थे।   पांच सितंबर 2015 को उनका निधन बेंगलुरू के कृष्णमूर्ति फाउंडेशन  परिसर में ही हुआ।   सात सितंबर 2015 को उनका अंतिम संस्कार किया गया।   वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर द्वारा  लदाख में राग -विराग पुस्तक का पहला पॉकेट बुक संस्करण सन 2000 में प्रकाशित किया गया था।


प्रोफेसर कृष्णनाथ ने कॅरियर की शुरुआत वर्ष 1961 में काशी विद्यापीठ के अर्थशास्त्र विभाग से की और वर्ष 1994 में विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए थे। आचार्य  नरेन्द्रदेव की प्रेरणा से वह 1950 में कृ्ष्णनाथ  समाजवादी आंदोलन में शामिल  हो गए थे। डॉक्टर राममनोहर लोहिया के सक्रिय सहयोगियों में प्रोफेसर कृष्णनाथ एक रहे। आंदोलनों व सत्याग्रह के दौरान लगभग 13 बार जेल की यात्राएं करनी पड़ी थी।  उत्तर प्रदेश सरकार ने 1992 में उन्हें डॉक्टर लोहिया पुरस्कार से सम्मानित किया था। बौद्ध दर्शन के योगदान को देखते हुए  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें 2015 में सम्मानित किया था। 
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( BOOK, LADDAKH ME RAG VIRAG, KRISHNANATH, VAGDEVI PUBLICATAION, BIKANER )

No comments:

Post a Comment