Wednesday, October 28, 2020

बनारस के दशाश्वमेध घाट पर लगी ये छतरियां


बनारस के दशाश्वमेध घाट पर लगी छतरियां दशकों से बनारस की पहचान बन चुकी हैं। कहीं भी तस्वीर में अगर ये छतरियां नजर आएं तो यह बनारस की याद दिला देती हैं। ठीक उसी तरह जैसे समंदर के किनारे दिखाई देती चाइनीज फिशिंग नेट कोचीन की पहचान बन चुकी है। बनारस पर बनी तमाम पेंटिंग में भी ये छतरियां दिखाई देती हैं।

मैं भी बचपन से इन छतरियों को देखता आ रहा हूं। इन छतरियों के नीचे बैठे होते हैं पंडे। इसके आसपास होते हैं मुंडन करने वाले हज्जाम। सुबह सुबह जब सूरज की पहली सुनहली किरणे गंगाजी के घाट को प्रकाशमान करती हैं तो ये छतरियां भी मुस्कुरा उठती हैं। निश्चित तौर पर ये छतरियां धूप और बारिश से बचने के लिए लगाई गई होंगी। पर अब ये घाट का रौनक भी बन चुकी हैं।

बांस से बनती हैं छतरियां - ये विशाल आकार की छतरियां जिसके नीचे कई लोग बैठ सकते हैं, बांस से बनाई जाती हैं। बांस की पतली खपच्चियों से बनी यह छतरियां धूप-बरसात से तो बचाती ही हैं, घाट का आकर्षण भी बढ़ाती हैं।  इन्हीं छतरियों के नीचे चौकी लगाकर बैठते हैं पंडे और पुरोहित। ये लोग धार्मिक कर्मकांड संपादित करते हैं।

कम होती छतरियां - पर साल 2010 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार काशी के घाटों पर 250 से ज्यादा छतरियों में से केवल 130-140 छतरियां ही बची हैं। इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि पूरे काशी में केवल अब एक ही परिवार बचा है, जो इन बांस की छतरियों को बनाता है। इसी साल कई टीवी चैनलों पर भी कम होती छतरियों पर रिपोर्ट प्रसारित हुई थी।

तब शोधकर्ताओं का कहना था कि एक छतरी की कीमत करीब 2,000 रुपये के आसपास पड़ती है। पहले इन छतरियों के लिए तीर्थ पर आने वाले श्रद्धालु दान दिया करते थे। तीर्थयात्रियों की उदासीनता के कारण कोई पंडा अब इतनी राशि खर्च करने के लिए तैयार नहीं है। मांग न होने के कारण छतरी बनाने वाले कारीगर कोई अन्य धंधा तलाश रहे हैं।

पर साल 2015 में इन छतरियों के रौनक को फिर से वापस लाने की कवायद शुरू की गई। इन्हें सजोने के लिए 2014 के आरंभ में उत्तर प्रदेश जनजातीय लोक कला संस्थान ने कवायद शुरू की। इसके तहत चालीस छतरियां बनवाई गई थी। इन्हें दशाश्वमेध, शीतला घाट समेत कुछ अन्य घाटों पर लगवाया भी गया।

सिर्फ दो शिल्पी बचे - खास यह है कि बनारस की ये छतरियां विदेशों में भी धूम मचा चुकी हैं। ये छतरियां अमेरिकालंदनपेरिसजापान,नेपाल समेत कई देशों में जा चुकी हैं। पर झुमरी तलैया डॉट काम की साल 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बनारस में इन छतरियों को बनाने वाले सिर्फ दो कारीगर ही बचे हैं। ये दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजा हैं और घौसाबाद में रहते हैं। छतरी बनाने वाले सबसे बुजुर्गवार कारीगर हैं 85 साल के गोपाल और दूसरे हैं 52 साल के गुलाब। ये दोनों ही अब पुरानी संस्कृति को ढो रहे हैं।
मुझे लगता है कि बनारस की इस खूबसूरत पहचान को बचाए रखने के लिए काशी की सांस्कृतिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए।  तभी आने वाले दिनों में  काशी की इस पहचान को बचाए रखा जा सकेगा। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( COLORS OF BANARAS, BAMBOO UMBRELA ON GHATS ) 

3 comments:

  1. विलुप्त होती कलाओं को बचाए जाने की आवश्यकता है। जानकारी परक आलेख।

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