Thursday, October 22, 2020

पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे का वह सफर


वह 1995 का साल था। तब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए इतिहास का  छात्र था। बिहार में कॉलेज शिक्षक पात्रता के लिए यूजीसी नेट की तर्ज पर बेट ( बिहार इलेजब्लिटी टेस्ट) परीक्षा का ऐलान हुआ। मैंने इसके लिए आवेदन कर दिया। परीक्षा केंद्र आया जमशेदपुर मतलब टाटानगर। वाराणसी से शाम को नीलांचल एक्सप्रेस में सवार हुआ। कोई आरक्षण नहीं था। कुछ और साथी जा रहे थे। बैठने की जगह मिल गई। सफर आसानी से कट गया। टाटानगर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद बाकी साथी अपने लिए आशियाना के इंतजाम करने लगे। पर मेरी ठहरने की जगह नियत थी।

मुझे पहुंचना था आदित्यपुर में आशियाना रेसिडेशियल कांप्लेक्स। वहां रहते हैं श्री बीसी सिंह। वे इंडियन आयल में अधिकारी हैं। मेरे दूर के रिश्तेदार। हमने सासाराम के प्रोफेसर अवधेश कुमार सिंह का पत्र उनके नाम ले रखा है। पते की तलाश करता हुआ मैं आदित्यपुर में उनके फ्लैट  में पहुंच गया। वहां मेरा बीसी सिंह के परिवार ने स्वागत किया। नास्ते खाने-पीने का पूरा ख्याल रखा। अगले दिन मेरे परीक्षा केंद्र तक बीसी सिंह जी खुद अपनी कार से छोड़ने आए। तो मेरा परीक्षा केंद्र था जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज में। बिष्टुपुर में स्थित इस कॉलेज की स्थापना 1953 में हुई थी। सन 1962 में जेआरडी टाटा के सौजन्य से इस कॉलेज को अपना सुंदर परिसर मिला। कॉलेज के आसपास की सड़के सुंदर हैं। बिष्टुपुर एक योजनाबद्ध नगर सा दिखाई देता है।

जब परीक्षा गुजर गई तो बीसी सिंह फिर मुझे लेने आए और अपने घर ले गए। इस दौरान दो दिन जमशेदपुर शहर में रहना हुआ पर मैं जमशेदपुर घूमने के लिए समय नहीं निकाल पाया।  

अगले दिन मेरी वापसी का होनी थी पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से। बीसी सिंह जी बडे बेटे मुझे छोड़ने के लिए स्टेशन आए। ट्रेन लेट थी। ट्रेन आने तक हमलोग स्टेशन की कैंटीन में बैठकर गप्पे लड़ाते रहे। ट्रेन आई। मैं इसके जनरल डिब्बे में सवार हुआ। जगह आसानी से मिल गई। उम्मीद थी की मुगलसराय तक का सफर आसानी से कट जाएगा, पर ऐसा होना नहीं था। 

टाटा नगर से चलने के बाद चांडिल जंक्शन आया। चांडिल अब सरायकेला खरसावा जिले में पड़ता है। इसके बाद ट्रेन बंगाल में घुस गई। पुरुलिया जंक्शन रेलवे स्टेशन आने के बाद फिर से झारखंड ( तब बिहार राज्य ही था) में प्रवेश कर गई। इस बीच अच्छी बारिश हुई। भीषण गर्मी में बारिश ने बड़ा सुकून प्रदान किया। बोकारो स्टील सिटी, चंदनपुरा से लेकर गोमो जंक्शन तक सब कुछ ठीक रहा। इसके बाद ट्रेन के जनरल डिब्बे में सारी सीटे भरने लगीं। बढ़ती भीड के साथ घुटन होने लगी। 


गया जंक्शन में तो भीड़ का बड़ा रेला आया कोच में। इतनी भीड़ की डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं। आदमी के ऊपर आदमी। उसके ऊपर भी आदमी। आप टायलेट जाने की भी नहीं सोच सकते। भीषण गर्मी में भीड़ के कारण मुझे घुटन होने लगी। मेरा टिकट मुगलसराय तक का था। डेहरी ओन सोन के बाद रात के आठ से नौ बजे के बीच ट्रेन सासाराम पहुंचने वाली थी। जनरल डिब्बे की भीड़ में दबा हुआ मैं। तो मैंने तय किया कि अब यहीं उतर जाना है। पर उतरना भी कोई इतना आसान काम नहीं था। जिन लोगों ने जनरल डिब्बे की भीड़ में सफर किया हो उन्हें ये इल्म होगा कि ट्रेन स्टेशन पर एक या दो मिनट रुकने वाली हो तो उससे उतरने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। तो अब मेरे भी संघर्ष की शुरुआत हो रही थी। 

मैंने अपने साथ सफर करने वाले से कहा, मैं गेट पर जाकर प्लेटफार्म  के उल्टी तरफ उतरने की कोशिश करता हूं। जब मैं उतर जाउं तो खिड़की से आवाज दूंगा आप मेरा सूटकेस खिड़की से बाहर फेंक देना। खैर काफी संघर्ष करके मै उतर गया। हमारे सहयात्री ने मदद की और मेरा सूटकेस बाहर फेंक दिया। बाहर की खुली हवा में आकर जान में जान आई। मुझे उन लोगों की शारीरिक क्षमता पर रस्क होता है जो इस भीड़ में दिल्ली तक का सफर करने के लिए तैयार हैं।


रात नौ बजे मैं प्रोफेसर अवधेश बाबू के घर पहुंचा। वे सासाराम रेलवे स्टेशन के पास ही गौरक्षिणी मुहल्ले में रहते थे। मेरा पूरा अनुभव सुनकर उन्होंने कहा, अच्छा ही किया ट्रेन से उतर गए। अगले दिन सुबह का अखबार पढ़ा – मुगलसराय ( अब दीनदयाल नगर) में रात को पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे से चार शव निकाले गए। वे सभी गर्मी और घुटन से मर गए थे। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वरना इन चार लोगों में एक मैं भी हो सकता था।  ( यात्रा काल - 1995 ) 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BHU, VARANASI, TATANAGAR, ADITYAPUR, BISTUPUR, JAMSHEDPUR, JWC, PURULIA, SASARAM, COLORS OF BANARAS

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