Friday, January 8, 2021

सिख पंथ के पंज तख्त या पांच तख्त के दर्शन करें

सिख पंथ में पंज तख्त (या पञ्च तख्त) उन पांच गुरुद्वारों को कहते हैं जिनका सिख धर्म में विशेष महत्व है। पांच तख्य ये हैं- अकाल   तख्त  (अमृतसर में)पटना साहिब (बिहार), केशगढ़ साहिब ( आनंदपुर), हुजूर  साहिब (नान्देड, महाराष्ट्र) और श्री दमदमा साहिब ( तलवंडी साबो ) । तो आइए चलते हैं इन पांचों तख्त की यात्रा पर।


1.श्री दरबार साहिब, अमृतसर - सिक्खों के चौथे गुरु गुरु रामदास ने 1574   में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। यहां एक विशाल सरवोर के बीच में गुरुद्वारा बना हुआ है। इसे श्री हरिमंदिर साहिब या दरबार साहिब कहते हैं। अमृतसर के   स्वर्ण मंदिर के बारे में कहा जाता है कि देश में जितने धार्मिक स्थल हैं उनमें ज्यादातर में सीढ़ियां चढ़ना पड़ता है पर दरबार साहिब अमृतसर में हमें सीढ़िया उतरना पड़ता है। स्वर्ण मंदिर परिसर में अकाल तख्त का भी दफ्तर है जो सिखों के पांच तख्तों में सबसे बड़ा है। 1574 में दीपावली के दिन अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। श्री दरबार साहिब में 24 घंटे लंगर चलता रहता है। अमृतसर रेलवे स्टेशन से गुरुद्वारा के लिए शटल बस सेवा चलती है। 



2. श्री हरिमंदिर साहिब पटना - पटना में दसवें गुरु की याद में बना है हरि मंदिर साहिब गुरुद्वारा।  सिख इतिहास में पटना साहिब का खास महत्व है। सिखों के दसवें और अंतिम गुरूगुरू गोबिंद सिंह जी का जन्म यहीं 22 दिसंबर 1666 में हुआ। यहां बना गुरुद्वारा सिखों के पांच तख्तों में से एक है। पांच तख्तों में दरबार साहिब अमृतसर के बाद इसका दूसरा स्थान है। बाकि के तीन तख्त आनंदपुर साहिबतलवंडी साबो और नांदेड़ साहिब (महाराष्ट्र) में हैं। सिक्खों के आखिरी गुरुगुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पटना में हुआ और यहीं उनका बचपन गुजरा । पटना का हरमंदिर साहिब उन्हीं की याद में बनाया गया है जहां उनके स्मृति चिन्ह हैं। यहां पहुंचने के लिए निकटम रेलवे स्टेशन पटना साहिब है। 




3 . यहां हुई खालसा पंथ की स्थापना - सिखों के पांच तख्त में  आनंदपुर साहिब का खास महत्व है। पंजाब के रुपनगर जिले में स्थित आनंदपुर साहिब  सिखों में अत्यंत पवित्र शहर माना जाता है। आनंदपुर साहिब पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित है।

इस शहर की स्थापना 1665 में नौंवे गुरु गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने की थी। यह सिख धर्म में अत्यंत पवित्र शहर इसलिए है क्योंकि यहीं पर खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। साल 1699 में बैशाखी के दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने की। इस दिन उन्होंने पांच प्यारों को सबसे पहले अमृत छकवा कर सिख बनाया। आमतौर पर तलवार और केश तो सिख पहले से ही रखते थे।अब उनके लिए कड़ा, कंघा और कच्छा भी जरूरी कर दिया गया। जब गुरु जी ने जब कहा कि मुझे एक शीश चाहिए तो कई लोग चौंके, पर सबसे पहले आगे आए भाई दया सिंह जी। इसके बाद जो पांच लोग सामने आए। उन्हें गुरु जी ने अमृत छकवा कर अमृतधारी सिख बनाया। तन, मन धन सब कुछ परमेश्वर को सौंप कर सिर्फ सच के प्रचार का संकल्प लिया पंज प्यारों ने। 





4. श्री हुजुर साहिब, नांदेड़ - महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर में स्थित हुजुर साहिब का ऐतिहासिक गुरुद्वारा गोदावरी नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित है। खालसा पंथ के पांच तख्तों में से एक सचखंड साहिब। इसे तख्त सचखंड श्री हुजुर अबिचल नगर साहिब के नाम से भी जाना जाता है। अबिचल यानी जो अमर है ऐसा नगर है नांदेड़। नांदेड़ महाराष्ट्र का एक अनाम सा शहर था जो गुरु जी के साथ जुड़ने के बाद सचमुच अमर हो गया।  सिख पंथ के दशम और आखिरी गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपने अन्तिम कुछ महीने इस स्थान पर गुजारे थे। इसी स्थान पर सरहंद के नवाब वजीर खान के भेजे हुए दो पठान भाईयों ने गुरुजी पर कातिलाना हमला किया था। सचखंड साहिब गुरुद्वारा का निर्माण महाराजा रंजीत सिंह जी ने करवाया। इसका निर्माण 1832 में आरंभ हुआ और 1839 में पूरा हुआ। 



5 श्री दमदमा साहिब - आखिरी तख्त आता है पंजाब के बठिंडा जिले में श्री दमदमा साहिब। श्री दमदमा साहिब को 18 नवंबर 1966 में पांचवे तख्त के तौर पर मान्यता दी गई। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर ने तलवंडी साबो के महत्व को देखते हुए इसे पांचवे तख्त के तौर पर मान्यता दी। इस तरह यह पांचों तख्त में सबसे नया है। तलवंडी साबो को गुरु की काशी भी कहा जाता है। दमदमा साहिब गुरुद्वारा का परिसर अत्यंत विशाल है। परिसर में आप मुख्य गुरुद्वारा के अलावा शहीद बाबा दीप सिंह का कुआं और गुरुद्वारा लिखनसर साहिब के दर्शन कर सकते हैं। सिख श्रद्धालुओं के लिए यहां ठहरने के लिए गुरुद्वारा परिसर में ही सराय की सुविधा उपलब्ध है। श्रद्धालुओं के लिए यहां अखंड लंगर भी चलता रहता है।
- vidyutp@gmail.com 
( SIKH TEMPLE, PUNJAB, BIHAR, MAHARASTRA) 

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