Monday, October 12, 2020

आलमगीरपुर से गाजियाबाद वापसी वाया गंग नहर

आलमगीर पुर से वापसी में मैं कल्याणपुर की तरफ न जाकर बहरामपुर खास की तरफ चला। बहरामपुर गांव में रुककर एक मिठाई की दुकान से एक कोल्ड ड्रिंक की छोटी बोतल खरीदकर पिया। दुकानदार से आगे का रास्ता पूछा। उसके अनुरूप आगे चला। एक नहर आया। यहां कुछ बच्चे पानी में नहाकर गर्मी दूर भगा रहे थे। दरअसल ये गंग नहर की ब्रांच कैनाल है। 

यहां पर वाटर फ्लो बनाकर पानी की धारा को मोड़ा गया है। बचा हुआ पानी नीेचे चला जाता है जो आगे जाकर हिंडन में मिल जाता है। यहां बच्चों को नहाते देख अपना बचपन याद आग गया जब हम अपने गांव के सोन नहर में नहाया करते थे। इसी नहर के किनारे किनारे बायीं तरफ बनी सड़क पर आगे चला। नेक गांव में इस नहर पर बने पुल को पार करके नहर के दाहिनी तरफ सड़क चल रही है।

थोड़ी देर बाद सड़क नहर से अलग होकर हरे भरे खेतों से होकर चलने लगी। हम मेरठ बागपत हाईवे पर पहुंच चुके हैं। यहां बायीं तरफ चलने के बाद गंग नहर का चौराहा आता है। सीधे चलने पर नौ किलोमीटर आगे मेरठ बाईपास है। पर उधर जाने की कोई जरूरत नहीं है।

गंग नहर के साथ चल रही सड़क पर चलते हुए सीधे मोदीनगर और मुरादनगर के बीच छोटा हरिद्वार पहुंचा जा सकता है। तो मैंने गंग नहर के साथ वाली सड़क पकड़ ली है। रास्ते में कुछ ढाबे खुले हुए हैं। सड़क के किनारे दसहरी और लंगड़ा आम की दुकानें सजी हैं।


वास्तव में ये गंग नहर का मार्ग दिल्ली से हरिद्वार जाने का का एक वैकल्पिक मार्ग भी है। आप मुरादनगर से गंग नहर पकड़कर सीधे खतौली बाईपास पहुंच सकते हैं। इसमें मेरठ जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर आपको शुकताल जाना है तो गंग नहर के साथ चलते हुए सीधे भोपा पहुंच सकते हैं। भोपा से शुकताल थोड़ी दूर ही रह जाता है।

गंग नहर के साथ चलते हुए देख रहा हूं कि रास्ते में जगह जगह निर्देश लिखे हैं कि नहर में पानी की गहराई 12 फीट है। नहर में नहाने के लिए नहीं उतरें। एक जगह चौराहा आया जहां से एक रास्ता मोदीनगर की तरफ जा रहा है पर सीधे चलते हैं मुरादनगर पहुंच जाएंगे। मैं सीधे चल रहा हूं। पर मुरादनगर से पहले एक जगह रूक जाता हूं। भूख लग रही है। सड़क के किनारे वेज बिरयानी वाली दुकान है। बिरयानी खाने के बाद दो ग्लास गन्ने का जूस पिया फिर आगे की ओर चल पड़ा।

तो गंग नहर हरिद्वार से आती है। भीमगोडा बैराज से जो नहर निकाली गई वह हर की पैड़ी होते हुए गाजिबाद के करीब मुरादनगर से होकर गुजरती है। इसमें गंगा का पानी आ रहा है। तो मुरादनगर में गंगनगर के पुल के पास लोगों ने छोटा हरिद्वार तीर्थ बना दिया है।

गंग नहर का निर्माण 1842 से 1854 के बीच किया गया था। तब ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था। यह हरिद्वार से निकलकर अलीगढ़ तक जाती है। इसका निर्माण सिंचाई के साथ नौवहन परियोजना के लिए किया गया था। नहर की लंबाई 272 मील है। यह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के 10 जिलों की 9000 वर्ग किलोमीटर में फैले खेतों को सींचित करती है। जगह जगह इस नगर से ब्रांच कैनाल और रजवाहे निकाले गए हैं। अलीगढ़ के नानू में गंग नहर इटावा और कानपुर दो शाखाओं में बंट जाती है।

यूं बनी गंग नहर की योजना - सन 1837-38 में इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एक करोड़ से ज्यादा की राजस्व हानि हुई। तब इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए एक नहर की आवश्यकता महसूस की गई। इस नहर के निर्माण का श्रेय कर्नल पोर्बी कॉटली को जाता है, जिन्होंने 500 किलोमीटर से ज्यादा लंबी इस नहर के निर्माण की रुपरेखा बनाई। अप्रैल 1842 में जब नहर का निर्माण शुरू हुआ तो हरिद्वार के पंडों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि गंगा के पानी को कैद करना ठीक नहीं होगा। पर कॉटली ने उन्हें मना लिया। नहर के शिलान्यास के समय गणपति वंदना भी की गई। सन 1854 में हरिद्वार से इस नहर में पानी छोड़ा गया। तब यह नहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए जीवनदायिनी साबित हुई।

नौका परिवहन की भी सुविधा - इस गंग नहर पर बने कई पुल 1850 और उसके आसपास के हैं। गंग नहर को नेविगेशन सिस्टम से लैस बनाया गया है। रास्त में आठ ऐसे पुल हैं जहां पर पानी ऊपर से नीचे गिरता है। पर यहां नाव को पार कराने के लिए नेविगेशन सिस्टम बनाया गया है। हालांकि आजकल गंग नहर में नौका परिवहन नहीं होता। पर एक बार फिर ऐसा किया जा सकता है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         (GANG NAHR, HARIDWAR, MERRUT, MURADNAGAR )

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