Friday, October 30, 2020

बनारस - हम इस शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह...




जिस शहर में मैंने जिंदगी के पांच साल गुजारे हों उसी शहर में एक बार फिर मुसाफिर की तरह भटकना। गुलाम अली की गजल याद आती है हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह। बस एक मुलाकात का मौका दे दो... मिलने वाले तो कई हैं पर फिलहाल किसी से नहीं मिलना। कचौड़ी गली से निकलकर मैं पैदल ही मैदागिन की तरफ बढ़ चलता हूं। चौक। बनारस का प्रसिद्ध चौराहा। गोदौलिया चौराहा से सीधी सड़क बांस फाटक होते हुए चौक तक आती है।   


चौक पर चौक थाना की ऐतिहासिक लाल रंग की इमारत नजर आती है। सड़क पार करके दूसरी तरफ जाएं तो दाल मंडी का इलाका है। इसी दाल मंडी में बनारस के प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद रहते थे। उनके पिता का नाम सुंघनी साहू था। बनारस में काशी हिंदू विश्व विद्यालय में पढ़ाई के दौरान जब मैं गोदौलिया की तरफ घूमने आता था तो बांस फाटक पर राम मंदिर के परिसर में साइकिल लगा देता था उसके बाद मैदागिन तक पैदल घूमता हुआ जाता था। दोनों तरफ के बाजारों को देखते हुए। आज फिर उसी वक्त को जीना चाहता हूं। उसी तरह पैदल-पैदल। 

चौक पर बनारस की प्रसिद्ध पान की दुकान मेरी नजरों के सामने है। रामेश्वर प्रसाद चौरसिया की पान की दुकान। बनारस तो पान के लिए प्रसिद्ध है। फिल्म डॉन में खाइके पान बनारस वाला गीत ने यहां के पान को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। तो बनारस के हर चौक चौराहे पर पान की प्रसिद्ध दुकाने हैं। चौक पर रामेश्वर प्रसाद चौरसिया  की दुकान कई पीढियों से चलती आ रही है। यहां आप कई तरह के पान का स्वाद ले सकते हैं। इनकी दुकान पर लगे बोर्ड पर लिखा है - छोटी सी दुकान बड़ी दास्तान... साइन बोर्ड पर कुछ प्रसिद्ध हस्तियों की पान खाती हुई तस्वीर भी लगी है। इंदिरा गांधी, कमलापति त्रिपाठी, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों ने भी इस दुकान के पान का स्वाद चखा है। 

इसी चौक पर विश्वविद्यालय प्रकाशन की पुस्तकों के विशाल दुकान है। वे बनारस के लोकप्रिय प्रकाशक भी हैं। अपने पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में मैंने एक फीचर लिखा था तब विश्वविद्यालय प्रकाशन के मालिक पुरुषोत्तम दास मोदी का साक्षात्कार करने के लिए उनसे मुलाकात की थी। अब प्रकाशन को उनकी अगली पीढ़ी देखती है। 
इसी चौक पर चौखंबा विद्या भवन भी है। वे संस्कृत भाषा  की पुस्तकों के जाने माने प्रकाशक हैं। उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकें दुनिया के 40 देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। देश दुनिया हर संस्कृत विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में उनकी पुस्तकें चलाई जाती हैं। 
चौक से आगे बढने पर आता है बुलानाला। बताते हैं कि यहां कभी नाला बहता था इसलिए नाम है बुलानाला। पर अब बुलानाला बनारस का बड़ा व्यापारिक केंद्र है। मैंने छात्र जीवन में अपनी हरे रंग की प्यारी सी साइकिल यहीं से खरीदी थी। 

बनारस के पुराने प्रसिद्ध सिनेमा घर चौक से मैदागिन के बीच में हुआ करते थे। दीपक, राधा और चित्रा। ये सिनेमा घर थियेटर के जमाने के थे। जब पृथ्वी राज कपूर अपना थियेटर लेकर यहां आते थे। अब वे पुराने सिनेमा घर बंद हो चुके हैं। पर इस सड़क पर पुरानी नक्काशीदार इमारतें आज भी मौजूद हैं जो बनारस के पुराने दिनों की याद दिलाती हैं। 

बुलानाला से आगे बढ़कर आप नीची बाग पहुंच जाते थे। हो सकता है किसी जमाने में यहां बाग रहा हो पर अब तो कई प्रसिद्ध साड़ियों की दुकाने हैं। इसी इलाके में बनारस के प्रसिद्ध सांध्यकालीन अखबार गांडीव का दफ्तर हुआ करता है। इस अखबार के फीचर प्रभारी अत्रि भारद्वाज के पास मैं अपने लेख और कविताएं प्रकाशन के लिए देने जाया करता था। कई बार वे मुझसे ऑन डिमांड लेख और कविताएं लिखवाया करते थे। हालांकि पैसे नहीं मिलते थे पर तब इस सांध्यकालीन अखबार गांडीव में अपना नाम प्रकाशित देखकर ही काफी खुशी हो जाती थी। इसी सड़क पर अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज और हरिश्चंद्र डिग्री कॉलेज स्थित हैं। 

बनारस में सड़कों पर रात दस बजे भी बाजार गुलजार है। मैं मैदागिन पहुंच गया हूं। मैदागिन चौराहे पर श्री बिहारी लाल दिगंबर जैन धर्मशाला की विशाल इमारत नजर आती है। यह भी अब बनारस के आईकोनिक इमारतों में शामिल हो चुकी है। इस धर्मशाला का निर्माण 1871 में हुआ था। कभी मैदागिन इलाके में पहले एक गुजराती भोजनालय भी हुआ करता था। वहां जमीन पर बैठकर जीमने की व्यवस्था हुआ करती थी। इसे एक गुजराती परिवार ही चलाता था। पता नहीं अब वह भोजनालय चल रहा है या नहीं। 

मैदागिन से कुछ ऑटो रिक्शा से सीधे मुगलसराय भी जाते हैं। पर वे ज्यादा किराया मांग रहे हैं। तो मैं मैदागिन से कैंट रेलवे स्टेशन का ऑटो रिक्शा ले लेता हूं। कबीर चौरा, लहुराबीर, मलदहिया, इंग्लिशिया लाइन होते हुए वाराणसी कैंट पहुंच गया हूं। कैंट से रात को 11 बजे के बाद एक ऑटो रिक्शा मिला। शेयरिंग में मुगलसराय का किराया 30 रुपये मांगे। मैं ऑटो में बैठ गया। इस आटो वाले ने एक कुत्ता पाला हुआ है। इस कुत्ते को अपने ऑटो की छत पर खड़ा कर रखा है। सारे रास्ते में आसपास लोग इस ऑटो रिक्शा को कौतूहल से देख रहे हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( COLORS OF BANARAS, GODAULIA, BANS PHATAK, CHAWK, BULANALA, NICHIBAG, MAIDAGIN, VISHWAVIDYALAYA PRAKASHAN) 

Wednesday, October 28, 2020

बनारस के दशाश्वमेध घाट पर लगी ये छतरियां


बनारस के दशाश्वमेध घाट पर लगी छतरियां दशकों से बनारस की पहचान बन चुकी हैं। कहीं भी तस्वीर में अगर ये छतरियां नजर आएं तो यह बनारस की याद दिला देती हैं। ठीक उसी तरह जैसे समंदर के किनारे दिखाई देती चाइनीज फिशिंग नेट कोचीन की पहचान बन चुकी है। बनारस पर बनी तमाम पेंटिंग में भी ये छतरियां दिखाई देती हैं।

मैं भी बचपन से इन छतरियों को देखता आ रहा हूं। इन छतरियों के नीचे बैठे होते हैं पंडे। इसके आसपास होते हैं मुंडन करने वाले हज्जाम। सुबह सुबह जब सूरज की पहली सुनहली किरणे गंगाजी के घाट को प्रकाशमान करती हैं तो ये छतरियां भी मुस्कुरा उठती हैं। निश्चित तौर पर ये छतरियां धूप और बारिश से बचने के लिए लगाई गई होंगी। पर अब ये घाट का रौनक भी बन चुकी हैं।

बांस से बनती हैं छतरियां - ये विशाल आकार की छतरियां जिसके नीचे कई लोग बैठ सकते हैं, बांस से बनाई जाती हैं। बांस की पतली खपच्चियों से बनी यह छतरियां धूप-बरसात से तो बचाती ही हैं, घाट का आकर्षण भी बढ़ाती हैं।  इन्हीं छतरियों के नीचे चौकी लगाकर बैठते हैं पंडे और पुरोहित। ये लोग धार्मिक कर्मकांड संपादित करते हैं।

कम होती छतरियां - पर साल 2010 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार काशी के घाटों पर 250 से ज्यादा छतरियों में से केवल 130-140 छतरियां ही बची हैं। इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि पूरे काशी में केवल अब एक ही परिवार बचा है, जो इन बांस की छतरियों को बनाता है। इसी साल कई टीवी चैनलों पर भी कम होती छतरियों पर रिपोर्ट प्रसारित हुई थी।

तब शोधकर्ताओं का कहना था कि एक छतरी की कीमत करीब 2,000 रुपये के आसपास पड़ती है। पहले इन छतरियों के लिए तीर्थ पर आने वाले श्रद्धालु दान दिया करते थे। तीर्थयात्रियों की उदासीनता के कारण कोई पंडा अब इतनी राशि खर्च करने के लिए तैयार नहीं है। मांग न होने के कारण छतरी बनाने वाले कारीगर कोई अन्य धंधा तलाश रहे हैं।

पर साल 2015 में इन छतरियों के रौनक को फिर से वापस लाने की कवायद शुरू की गई। इन्हें सजोने के लिए 2014 के आरंभ में उत्तर प्रदेश जनजातीय लोक कला संस्थान ने कवायद शुरू की। इसके तहत चालीस छतरियां बनवाई गई थी। इन्हें दशाश्वमेध, शीतला घाट समेत कुछ अन्य घाटों पर लगवाया भी गया।

सिर्फ दो शिल्पी बचे - खास यह है कि बनारस की ये छतरियां विदेशों में भी धूम मचा चुकी हैं। ये छतरियां अमेरिकालंदनपेरिसजापान,नेपाल समेत कई देशों में जा चुकी हैं। पर झुमरी तलैया डॉट काम की साल 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बनारस में इन छतरियों को बनाने वाले सिर्फ दो कारीगर ही बचे हैं। ये दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजा हैं और घौसाबाद में रहते हैं। छतरी बनाने वाले सबसे बुजुर्गवार कारीगर हैं 85 साल के गोपाल और दूसरे हैं 52 साल के गुलाब। ये दोनों ही अब पुरानी संस्कृति को ढो रहे हैं।
मुझे लगता है कि बनारस की इस खूबसूरत पहचान को बचाए रखने के लिए काशी की सांस्कृतिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए।  तभी आने वाले दिनों में  काशी की इस पहचान को बचाए रखा जा सकेगा। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( COLORS OF BANARAS, BAMBOO UMBRELA ON GHATS ) 

Monday, October 26, 2020

सयाजीराव गायकवाड लाइब्रेरी और वो हसीन शामें


काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के वक्त लंबा वक्त बीएचयू के सेंट्रल लाइब्रेरी में गुजरता था। इसका नाम सयाजीराव गायकवाड लाइब्रेरी है। कुल पुस्तक संग्रह में देश के बड़े पुस्तकालयों में शुमार है। तब गूगल नहीं था। किसी भी लेख लिखने के लिए शोध करने के लिए लाइब्रेरी मुफीद जगह थी। पत्रकारिता के शुरुआती दौर में इस लाइब्रेरी का मैगजीन सेक्शन मेरे काफी काम आया।  पुराने रेफरेंस तलाश करने के लिए मैं यहां घंटो बैठता था।


पुस्तकालय का दो मंजिला विशाल भवन है। यह भवन भी नागर शैली में बना है। पढ़ाई करते करते भूख लगे तो बाहर निकलकर बीएचयू विश्वनाथ मंदिर के पास की दुकानों पर थोड़ी सी पेट पूजा और फिर वापस लाइब्रेरी के टेबल पर। कई बार तो रात के 10 बज जाते थे पुस्तकालय में। तब पुस्तकालय सारी रात नहीं खुलता था। कई बार पढ़ाई के साथ कुछ अच्छे दोस्त मिल जाते। फिर शाम और यादगार हो जाती। मंदिर के बाहर आम के पेड़ के नीचे चाय की चुस्की फिर पढ़ाई। बीएचयू के ठीक मध्य में विश्वनाथ मंदिर और मल्टी परपस हॉल के बीच में पुस्तकालय की विशाल इमारत स्थित है।


तो आइए जानते हैं इस विशाल लाइब्रेरी के बारे में। सयाजीराव गायकवाड पुस्तकालय  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ( बीएचयू) का मुख्य पुस्तकालय है। इसको यहां पर केन्द्रीय पुस्तकालय भी कहते हैं। इसकी स्थापना बीएचयू की स्थापना के एक साल बाद यानी 1917 में हुई थी। पर इसके वर्तमान भवन का निर्माण 1941 में हुआ। यह ब्रिटिश संग्रहालय की तर्ज पर बनाया गया है। इसके निर्माण के लिए बड़ौदा (वडोदरा) के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से दान प्राप्त हुआ था। उस समय महाराजा ने दो लाख रुपये का बड़ा दान दिया था। सयाजी राव गायकवाड बीएचयू के कुलाधिपति भी रहे।


दरअसल सयाजीराव गायकवाड देश में पुस्तकालय आंदोलन के बड़े प्रणेता थे। सार्वजनिक पुस्तकालय व्यवस्था की व्यापक परिकल्पना बड़ौदा के इस शासक ने पेश की थी। अपने साम्राज्य के हर जिले में 1893 में सामुदायिक शिक्षा का अनिवार्य कार्यक्रम चलाने वाले गायकवाड ने 1907 में अपने पूरे साम्राज्य में सभी लड़कों और लड़कियों के लिए शुरुआती शिक्षा अनिवार्य कर दिया था। उन्होंने 1910 में सार्वजनिक पुस्तकालय की व्यवस्था पेश की, क्योंकि उन्हें यह महसूस हुआ कि सार्वभौम शिक्षा के लिए मुफ्त सार्वजनिक पुस्तकालय का होना बहुत जरूरी हैं। 

उन्होंने अपने राज्य में अलग से लाइब्रेरी विभाग बनाया और एक अंग्रेज विद्वान डब्ल्यू ए. बोर्डन को राज्य के पुस्तकालयों का पहला पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त किया। अपनी राजधानी बड़ौदा में उन्होंने एक सेंट्रल लाइब्रेरी बनाई। इसमें उनके निजी संग्रह की करीब 20 हजार पुस्तकों सहित लगभग 90 हजार पुस्तकें शुरुआत में रखी गईं। उन्होंने शिक्षा को कितना महत्व दिया इससे पता चलता है कि जब भारत परतंत्र था उस समय सयाजीराव गायकवाड के राज्य में 97 प्रतिशत से भी अधिक साक्षरता दर थी। वे स्वयं वर्ष में तीन महीने विदेशो में जाकर वहां की शिक्षा व्यवस्था देखते थे। बाद उसे अपने यहां अमल में लाते थे।
पब्लिक लाइब्रेरी मूवमेंट के संस्थापक वडोदरा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड का जन्म 11 मार्च, 1863 को हुआ था। उनका मूल नाम गोपालराव गायकवाड था। वे एक चरवाहे के बेटे थे। गायकवाड का मतलब होता है गाय चराने वाले। इस महान शासक की मृत्यु 6 फरवरी, 1939 को हुई।

बात फिर बीएचयू के सेंट्रल लाइब्रेरी की। लाइब्रेरी में प्रवेश करते ही आप विशाल गोलाकार अध्ययन कक्ष से रूबरू होते हैं। इसकी आंतरिक भव्यता देखते बनती है। पुस्तकाल में मौजूद ज्यादातर पुस्तकों की अपनी बाइंडिंग होती है। साल 2020 के अपडेट के मुताबिक यहां कुल 9 लाख 37 हजार 756 वाल्यूम का संग्रह है। परिसर मे स्थित अन्य सहायक और विभागीय लाइब्रेरी का संग्रह जोड़ लिया जाए तो कुल 13 लाख से ज्यादा पुस्तकों का संग्रह है। तो ऐसी अनूठी है बीएचयू की लाइब्रेरी।

डिजिटल लाइब्रेरी  - साल 2018 में बीएचयू के सेंट्रल लाइब्रेरी ने नई सुविधा शुरू की। अब बीएचयू के विद्यार्थी और शिक्षक विश्वविद्यालय द्वारा डिजिटल लाइब्रेरी के जरिये सब्सक्राईब किए गए ऑनलाइन जर्नल्स को अपने घर से भी पढ़ सकते है। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को दिए गए यूजर आईडी एवं पासवर्ड से इस सुविधा का लाभ लिया जा सकता है। वहीं साल 2019 में बीएचयू के लाइब्रेरियन प्रोफेसर एचएन प्रसाद को बेस्ट लाइब्रेरियन के अवार्ड से सम्मानित किया गया।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com  
-         ( BHU LIBRARY, SYAJI RAO GAYAKWAD, VARANASI, COLORS OF BANARAS)


Saturday, October 24, 2020

भारत कला भवन - यहां देखिए अकबर ने चलाया था राम सीता का सिक्का


पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्लाय परिसर में पढ़ाई के दौरान बीएचयू के हरी भरी सड़कों पर अक्सर घूमता रहता। कभी पैदल कभी अपनी हरी साइकिल पर। इस दौरान हमारे सामाजिक विज्ञान संकाय से लंका की तरफ बढने पर दाहिनी तरफ भारत कला भवन  का साइनबोर्ड दिखाई देता था। अक्सर कौतूहल होता की ये क्या है। तो एक दिन मैं भारत कला भवन के अंदर चला गया। वहां स्वागत कक्ष पर डॉक्टर रघुबीर कुशवाहा मिले। उनसे पता चला कि भारत कला भवन एक संग्रहालय है। तो मैं अंदर घूमने चला गया।

दरअसल भारत कला भवन दो मंजिला संग्रहालय भारतीय इतिहास और संस्कृति का अदभुत संग्रह है। मूर्तिकला, पांडुलिपियां, सिक्के, कठपुतली और तमाम तरह के संग्रह जो इतिहास संस्कृति में रूचि रखने वालों को लुभाते हैं। पांच साल के दौरान कई बार और भारत कला भवन जाना हुआ। कई बार दोस्तों के साथ कई बार बीएचयू आने वाले मित्रों को दिखाने के लिए।

अकबर ने चलाया था राम सीता का सिक्का - भारत कला भवन में अकबर द्वारा चलाया गया वह चांदी का सिक्का भी देखा जा सकता है, जिसमें राम और सीता की मूर्तियां बनी हुई हैं। इनमें एक तरफ भगवान राम हाथ में धनुष लिए और माता सीता हाथ में पुष्प लिए है। इसमें नागरी भाषा में राम-सीया लिखा है। यह सिक्का 1604 में जारी किया गया था। अकबर ने चांदी के अलावा सोने भी राम सीता का सिक्का जारी करवाया था। अकबर ने ये सिक्का जारी कर तू ही राम है तू ही रहीम है का सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया था।

एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय संग्रहालय -  विश्वविद्यालय परिसर में स्थित इस संग्रहालय को देखने के लिए तब कोई प्रवेश शुल्क नहीं था। तो यह भी जान लिजिए कि यह एशिया का सबसे बड़ा किसी विश्वविद्यालय में स्थित संग्रहालय है। यहां की चित्र वीथिकाओं में 12वीं से 20वीं शती तक के भारतीय लघु चित्र प्रदर्शित हैं। इनके चित्रण में ताड़ पत्र, कागज, कपड़ा, काठ, हाथी दांत आदि का उपयोग किया गया है।

चित्र वीथिका में प्रदर्शित चित्रों का क्रम गोविन्द पाल के शासन के चतुर्थ वर्ष (12वीं शती) में चित्रित बौद्ध ग्रंथ 'प्रज्ञा पारमिता' से प्रारंभ होता है। वहीं लघु चित्रों की विकास गाथा पूर्वी भारत में चित्रित पोथी चित्रों से आरंभ होती है, जिनमें अजंता-भित्ति चित्रों की उत्कृष्ट परंपरा के साथ ही मध्यकालीन कला विशिष्टताओं का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है। भारत कला भवन के ठीक बगल में बीएचयू का फाइन आर्ट्स संकाय स्थित है।

अक्सर फाइन आर्ट्स के छात्र संग्रहालय में आकर अपना ज्ञानवर्धन करते देखे जा सकते हैं। यहां का चित्र संग्रह, विशेषकर लघु चित्रों का विश्व में विशिष्ट स्थान है। भारत में प्रचलित लगभग समस्त शैलियों के चित्रों का विशाल संग्रह इस संग्रहालय में है।

पद्मभूषण रायकृष्ण दास ने की थी स्थापना - भारत कला भवन की स्थापना 1920 में भारत कला परिषद के तौर पर हुई थी। इसकी स्थापना विख्यात कला मर्मज्ञ राय कृष्णदास ने की थी। उन्हें भारत सरकार ने पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन 'भारत कला भवन' के लिए संग्रह हेतु समर्पित कर दिया। उनकी कला कृतियों के संयोजन में काफी अभिरुचि थी। रायकृष्ण दास का जन्म 7 नवंबर 1892 को वाराणसी में हुआ था। उनकी निधन 1980 में 21 जुलाई को हुआ। वे आजीवन भारत कला भवन को अपनी सेवाएं देते रहे। उनका संबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से था। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना भी की और कला पत्रिका का संपादन किया। 

भारत कला भवन को वर्तमान स्वरूप 1950 में मिला। राय कृष्णदास का नंदलाल बसु, काशी प्रसाद जायसवाल और अवनींद्र नाथ बसु जैसी महान हस्तियों से मित्रता थी। कला भवन संग्रह में इन सब लोगों की सलाह ली गई। इसके संग्रहालय में लगभग 12 हजार विभिन्न शैलियों के चित्र संकलित हैं। यहां मुगल चित्र कला, बसोही चित्रकला और बंगाल शैली के चित्र बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। तो कभी बनारस जाना हो तो आप भारत कला भवन जरूर जाएं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( BHARAT KALA BHAWAN, BHU, VARANASI, COLORS OF BANARAS )

Thursday, October 22, 2020

पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे का वह सफर


वह 1995 का साल था। तब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए इतिहास का  छात्र था। बिहार में कॉलेज शिक्षक पात्रता के लिए यूजीसी नेट की तर्ज पर बेट ( बिहार इलेजब्लिटी टेस्ट) परीक्षा का ऐलान हुआ। मैंने इसके लिए आवेदन कर दिया। परीक्षा केंद्र आया जमशेदपुर मतलब टाटानगर। वाराणसी से शाम को नीलांचल एक्सप्रेस में सवार हुआ। कोई आरक्षण नहीं था। कुछ और साथी जा रहे थे। बैठने की जगह मिल गई। सफर आसानी से कट गया। टाटानगर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद बाकी साथी अपने लिए आशियाना के इंतजाम करने लगे। पर मेरी ठहरने की जगह नियत थी।

मुझे पहुंचना था आदित्यपुर में आशियाना रेसिडेशियल कांप्लेक्स। वहां रहते हैं श्री बीसी सिंह। वे इंडियन आयल में अधिकारी हैं। मेरे दूर के रिश्तेदार। हमने सासाराम के प्रोफेसर अवधेश कुमार सिंह का पत्र उनके नाम ले रखा है। पते की तलाश करता हुआ मैं आदित्यपुर में उनके फ्लैट  में पहुंच गया। वहां मेरा बीसी सिंह के परिवार ने स्वागत किया। नास्ते खाने-पीने का पूरा ख्याल रखा। अगले दिन मेरे परीक्षा केंद्र तक बीसी सिंह जी खुद अपनी कार से छोड़ने आए। तो मेरा परीक्षा केंद्र था जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज में। बिष्टुपुर में स्थित इस कॉलेज की स्थापना 1953 में हुई थी। सन 1962 में जेआरडी टाटा के सौजन्य से इस कॉलेज को अपना सुंदर परिसर मिला। कॉलेज के आसपास की सड़के सुंदर हैं। बिष्टुपुर एक योजनाबद्ध नगर सा दिखाई देता है।

जब परीक्षा गुजर गई तो बीसी सिंह फिर मुझे लेने आए और अपने घर ले गए। इस दौरान दो दिन जमशेदपुर शहर में रहना हुआ पर मैं जमशेदपुर घूमने के लिए समय नहीं निकाल पाया।  

अगले दिन मेरी वापसी का होनी थी पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से। बीसी सिंह जी बडे बेटे मुझे छोड़ने के लिए स्टेशन आए। ट्रेन लेट थी। ट्रेन आने तक हमलोग स्टेशन की कैंटीन में बैठकर गप्पे लड़ाते रहे। ट्रेन आई। मैं इसके जनरल डिब्बे में सवार हुआ। जगह आसानी से मिल गई। उम्मीद थी की मुगलसराय तक का सफर आसानी से कट जाएगा, पर ऐसा होना नहीं था। 

टाटा नगर से चलने के बाद चांडिल जंक्शन आया। चांडिल अब सरायकेला खरसावा जिले में पड़ता है। इसके बाद ट्रेन बंगाल में घुस गई। पुरुलिया जंक्शन रेलवे स्टेशन आने के बाद फिर से झारखंड ( तब बिहार राज्य ही था) में प्रवेश कर गई। इस बीच अच्छी बारिश हुई। भीषण गर्मी में बारिश ने बड़ा सुकून प्रदान किया। बोकारो स्टील सिटी, चंदनपुरा से लेकर गोमो जंक्शन तक सब कुछ ठीक रहा। इसके बाद ट्रेन के जनरल डिब्बे में सारी सीटे भरने लगीं। बढ़ती भीड के साथ घुटन होने लगी। 


गया जंक्शन में तो भीड़ का बड़ा रेला आया कोच में। इतनी भीड़ की डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं। आदमी के ऊपर आदमी। उसके ऊपर भी आदमी। आप टायलेट जाने की भी नहीं सोच सकते। भीषण गर्मी में भीड़ के कारण मुझे घुटन होने लगी। मेरा टिकट मुगलसराय तक का था। डेहरी ओन सोन के बाद रात के आठ से नौ बजे के बीच ट्रेन सासाराम पहुंचने वाली थी। जनरल डिब्बे की भीड़ में दबा हुआ मैं। तो मैंने तय किया कि अब यहीं उतर जाना है। पर उतरना भी कोई इतना आसान काम नहीं था। जिन लोगों ने जनरल डिब्बे की भीड़ में सफर किया हो उन्हें ये इल्म होगा कि ट्रेन स्टेशन पर एक या दो मिनट रुकने वाली हो तो उससे उतरने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। तो अब मेरे भी संघर्ष की शुरुआत हो रही थी। 

मैंने अपने साथ सफर करने वाले से कहा, मैं गेट पर जाकर प्लेटफार्म  के उल्टी तरफ उतरने की कोशिश करता हूं। जब मैं उतर जाउं तो खिड़की से आवाज दूंगा आप मेरा सूटकेस खिड़की से बाहर फेंक देना। खैर काफी संघर्ष करके मै उतर गया। हमारे सहयात्री ने मदद की और मेरा सूटकेस बाहर फेंक दिया। बाहर की खुली हवा में आकर जान में जान आई। मुझे उन लोगों की शारीरिक क्षमता पर रस्क होता है जो इस भीड़ में दिल्ली तक का सफर करने के लिए तैयार हैं।


रात नौ बजे मैं प्रोफेसर अवधेश बाबू के घर पहुंचा। वे सासाराम रेलवे स्टेशन के पास ही गौरक्षिणी मुहल्ले में रहते थे। मेरा पूरा अनुभव सुनकर उन्होंने कहा, अच्छा ही किया ट्रेन से उतर गए। अगले दिन सुबह का अखबार पढ़ा – मुगलसराय ( अब दीनदयाल नगर) में रात को पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे से चार शव निकाले गए। वे सभी गर्मी और घुटन से मर गए थे। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वरना इन चार लोगों में एक मैं भी हो सकता था।  ( यात्रा काल - 1995 ) 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BHU, VARANASI, TATANAGAR, ADITYAPUR, BISTUPUR, JAMSHEDPUR, JWC, PURULIA, SASARAM, COLORS OF BANARAS

Tuesday, October 20, 2020

यहां हुआ रावण का जन्म – इस गांव में दशहरे में रावण नहीं जलता


उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर  जिले के ग्रेटर नोएडा  क्षेत्र में एक गांव है बिसरख। इसे रावण
   के गांव   के तौर पर भी जाना जाता है।  मान्यता के अनुसार गांव में कई दशकों से   रावण   के पुतले का दहन नहीं किया जाता। दशहरे में जहां पूरा देश रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाता है, वहीं बिसरख गांव की तस्वीर थोड़ी अलग होती है। यहां पौराणिक असुर राज के जीवन और शिक्षाओं का जश्न मनाया जाता है। यहां के लोगों के लिए आज भी रावण बाबा हैं। पूजनीय हैं। 



बिसरख गांव के एक कोने में स्थित है प्राचीन शिव मंदिर। कहा जाता है कि लंकापति रावण इस गांव में पैदा हुए थे। इस मंदिर को रावण मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है। गांव के विजय भाटी बताते हैं कि रावण के पिता का आश्रम हुआ करता था बिसरख में। इसी आश्रम में रावण का जन्म हुआ। रावण के भाई कुबेर, कुम्भकर्ण और विभीषण भी यहीं पर जन्मे थे। यह भी माना जाता है कि बाल्यकाल से ही शिव भक्त रावण ने शिव की कठिन उपासना की। उन्होंने यहीं पर शिव मंत्रावली की रचना भी की थी। जिस मंदिर में यह शिवलिंग स्थापित है, वहां पौराणिक काल की मूर्तियां बनी हुई हैं। बिसरख गांव में विभिन्न स्थानों पर खुदाई में अब तक 25 से ज्यादा शिवलिंग निकल चुके हैं।


वैसे तो गांव में कोई रावण का मंदिर नहीं है। पर गांव के प्राचीन शिव मंदिर को लोग रावण मंदिर के तौर पर जानते हैं। इस मंदिर में प्राचीन शिवलिंग है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना ऋषि विश्रवा ने स्वयं की थी। यह अष्टभुजी शिवलिंग है। कहा जाता है इस तरह का शिवलिंगम कहीं दूसरा नहीं है। इस प्राचीन मंदिर का अब जीर्णोद्धार किया जा रहा है। इसका प्रवेश द्वार और परिसर को भव्य बनाया जा रहा है। मंदिर में एक विशाल गैलरी बनाई गई है। इस गैलरी में ऋषि विश्रवा की प्रतिमा स्थापित की गई है। इसके साथ कई और देवी देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।



रावण के पिता थे ऋषि विश्रवा। वे पौलत्स्य मुनि के पुत्र थे। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त थे। तो रावण का जन्म हुआ यहां पर ऋषि के आश्रम में। उनका बचपन बिसरख में ही बीता। तो गांव के लोगों के लिए वह बेटा है गांव का। तो भला उसका पुतला कैसे जला सकते हैं। गांव के लोग तो रावण पर गर्व करते हैं। अब गांव के लोग एक अलग से रावण का मंदिर बनाने पर भी विचार कर रहे हैं।

दरअसल विश्रवा ऋषि के नाम पर ही इस गांव का नाम बिसरख पड़ा। सरकारी दस्तावेजों में इस गांव का नाम बिसरख जलालपुर है। संभवतः जलालपुर मुगलकाल में जुडा होगा। गांव में गूजर और दलित बिरादरी के लोगों की अच्छी संख्या है। बिसरख गांव कभी नोएडा से दूर हुआ करता था। पर अब शहर के विस्तार ने गांव के शहरी सीमा में ले लिया है। गांव के आसपास ग्रेटर नोएडा वेस्ट के विशाल अपार्टमेंट बन चुके हैं।



कैसे पहुंचे - बिसरख गांव पहुंचने के लिए आप ग्रेटर नोएडा वेस्ट के गौड़ चौक (चार मूर्ति चौक) से सूरजपुर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़े। सुपरटेक इकोविलेज वन के पास बिसरख गांव आ जाता है। चौराहे से दाहिनी तरफ मुड़कर गांव में  पहुंच जाएंगे। बिसरख गांव में कोतवाली है। कोतवाली से मंदिर की दूरी आधा किलोमीटर है।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 

( ( RAVAN , BISRAKH, GREATER NOIDA, SHIVA TEMPLE) 

 


 

 

Sunday, October 18, 2020

जीटी रोड पर शेरशाह कालीन सराय

शेरशाह सूरी मध्यकालीन भारत का ऐसा सम्राट हुआ जिसने देश के चहुंमुखी के लिए अनेक कार्य किए वह भी अपने बहुत छोटे से शासन काल में। तो शेरशाह की एक स्मृति दिल्ली से गाजियाबाद जाते समय साहिबाबाद के जीटी रोड पर भी देखी जा सकती है।

दरअसल शेरशाह ने कोलकाता से पेशावर तक जीटी रोड बनवाने के बाद इसके किनारे जगह-जगह राहगीरों के लिए पक्के सराय का निर्माण कराया था। इन सरायों कई तो विलुप्त हो गए लेकिन कुछ का अस्तित्व अभी बचा हुआ है। ऐसी ही एक शेरशाह कालीन सराय साहिबाबाद के पास जीटी रोड पर देखने को मिलती है। पर इस ऐतिहासिक इमारत के महत्व से आसपास के लोग अनजान हैं। संरक्षण के अभाव में इस सराय का क्षरण हो रहा है।

श्याम पार्क स्थित जीटी रोड के एक किनारे पर बनी यह छोटी सी इमारत फिलहाल जर्जर हालत में दिखाई देती है। श्याम पार्क मेट्रो स्टेशन के पास दक्षिणी हिस्से में इस इमारत को देखा जा सकता है। जीटी रोड की ऊंचाई बढ़ने के कारण यह इमारत थोड़ी नीची हो गई है।

इतिहासकार बताते हैं कि यह इमारत मध्यकाल की है। इसके निर्माण में छोटे आकार के लाखोरी ईंटों का प्रयोग किया गया है। यह इमारत शेरशाहकालीन है। शेरशाह सूरी ने करीब 400 साल पूर्व जीटी रोड का पुनर्निर्माण कराया था। इसी दौरान इस सराय का भी निर्माण कराया गया था।

शेरशाह ने सोलहवीं सदी में जीटी रोड के दोनों ओर लगभग 1700 सरायों का निर्माण कराया था। यह मुसाफिरों के ठहरने का स्थान हुआ करता था। शेरशाह कालीन ये सराय कई जगह तिजारत का भी केंद्र हुआ करते थे। मतलब इसके आसपास बाजार भी लगता था।

वैसे तो मुगलकाल में जीटी रोड को बादशाही सड़क कहा जाता था। हालांकि शेरशाह से पूर्व भी यह सड़क मौजूद थी। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के दौरान पाटलिपुत्र से अफगानिस्तान के काबुल तक इस सड़क को बनाया गया था। शेरशाह सूरी ने इसका पुनर्निर्माण कराया। ब्रिटिश राज के दौरान इस सड़क का नाम बादशाही सड़क से बदलकर ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) रख दिया गया। पर आजाद भारत में इसे एक  बार फिर नाम मिला शेरशाह सूरी पथ।

वर्तमान में जो जीटी रोड है उसे ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाया था। तब इस मार्ग को उत्तर पथ भी कहा जाता था। शेरशाह ने अपने शासन काल में फिर से पूरे पथ का नए सिरे से निर्माण कराया। तब इस मार्ग का नाम बादशाही सड़क रख दिया गया। यह देश की प्रमुख सड़क थी। जो बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली पंजाब आदि राज्यों को जोड़ती थी। इस मार्ग पर शेरशाह की डाक व्यवस्था का भी संचालन होता था।


साहिबाबाद में जो शेरशाहकालीन सराय दिखाई देती है इसका संरक्षण किए जाने की जरूरत है। इसके आसपास की दीवार तक दुकानदारो ने कब्जा कर रखा है। इसे तार के बाड़ लगाकर ऐतिहास महत्व की इमारत घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही यहां इसका महत्व बताता हुआ एक बोर्ड भी लगाया जाना चाहिए। अगर संरक्षित नहीं किया गया तो इस तरह की कई छोटी छोटी ऐतिहासिक इमारतें विलुप्त हो सकती हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( SAHIBABAD, GAZIABAD, SHERSHAH, SARAI, GT ROAD, BADSHAHI SADAK  )

Friday, October 16, 2020

जैन शिकंजी - मोदी नगर का अलबेला स्वाद


दिल्ली से मेरठ जाने के रास्ते में कई बार आपको जैन शिंकजी का बोर्ड लगा हुआ दिखाई दिया होगा। मुझे भी तीन दशक से ये बोर्ड दिखाई देता है। जैन शिंकजी इतना प्रसिद्ध है कि इसके नाम से कई नकली जैन शिंकजी वालों ने भी अपना कारोबार शुरू कर दिया है।

तो जैन शिकंजी की मूल शाखा है दिल्ली मेरठ रोड पर मुरादनगर और मोदी नगर के बीच में गंग नगर के पास। दिल्ली से जाते समय में दाहिनी तरफ जैन शिंकजी का रेस्टोरेंट दिखाई देता है। अक्सर लंबी यात्रा करने वाले लोग जैन शिंकजी के पास जरूर रूकते हैं। गर्मी के दिनों में तो शिंकजी का कारोबार खूब चलता है। वैसे शिकंजी तो हर जगह मिलती है पर इस शिंकजी में क्या खास है। शिंकजी में क्या होता है। पानी, नींबू, बर्फ और मसाला। पर यही मसाला जैन शिंकजी को खास बनाता है। इस मसाले के कारण ही दूर-दूर से आने वाले लोग जैन शिकंजी के स्वाद के दीवाने हैं।

अब जैन शिंकजी वाले ने अपना ब्रांड बना लिया है। वे शिंकजी का मसाला और दूसरे कई तरह के पाचक चूर्ण और मसाले बनाने लगे हैं। तो आते जाते लोग इन मसालों को भी खरीद कर ले जाते हैं। कारोबार बढ़ा है तो जैन शिंकजी अब कंपनी बन चुकी है। शिकंजी के स्टाल ने विशाल रेस्टोरेंट का रूप ले लिया है। इनके यहां एक ग्लास शिकंजी की दर 50 रुपये है। बाकी जगह के शिकंजी से थोडी महंगी जरूर है। पर अब यह एक ब्रांड बन चुका है।

शाकाहारी भोजन भी - जैन शिंकजी के रेस्टोरेंट में सिर्फ शिकंजी ही नहीं बल्कि शाकाहारी खाने में काफी कुछ मिलता है। ज्यातर लोग स्नैक्स में यहां पर शिकंजी के साथ पकौड़े खाना पसंद करते हैं। कई तरह के पकौड़े के साथ आप यहां पर छोले भठूरे का भी आनंद ले सकते हैं। हालांकि 90 रुपये के छोल भठूरे के प्लेट के साथ वे प्याज भी परोसते हैं। मतलब खालिस जैन रेस्टोरेंट नहीं है। अगर जैन रेस्टोरेंट होता तो यहां लहसुन प्याज का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। पर कारोबार में सब जायज है।


जैन शिकंजी के रेस्टोरेंट में आपको खाना पीना सब कुछ मिलता है। यहां पर आप शाकाहारी थाली का आनंद ले सकते हैं। अलग अलग तरह के व्यंजनों का कांबो भी बना सकते हैं। इस रेस्टोरेंट में सुबह से लेकर देर रात तक खाना हर समय तैयार मिलता है। दोपहर से शाम से बीच रेस्टोरेंट कभी बंद नहीं होता। आते जाते लोगों के लिए पार्किंग की भी जगह है। 


जैन शिकंजी का स्वाद अब दिल्ली में भी – साल 2019 में जैन शिकंजी की एक शाखा दिल्ली के विकास मार्ग पर भी खुल गई है। लक्ष्मीनगर मार्ग पर शकरपुर वाली साइड में जैन शिकंजी का विशाल रेस्टोरेंट खुल गया है। जो मोदीनगर का मीनू वह सब कुछ वहां भी उपलब्ध है। दिल्ली के जो लोग जैन शिकंजी के दीवाने थे उनको अब मोदीनगर तक जाने की जरूरत नहीं है। वे लक्ष्मीनगर में भी शिकंजी और पकौड़ों का स्वाद ले सकते हैं। लक्ष्मीनगर के रेस्टोरेंट में छोले भठूरे तथा दूसरे व्यंजन भी उपलब्ध हैं। विकास मार्ग पर शाकाहारी भोजन के लिए ये अच्छी जगह हो सकती है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         ( JAIN SHIKANJI, MODINAGAR, MURAD NAGAR, MODI NAGAR, VIKAS MARG )