Thursday, October 22, 2020

पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे का वह सफर


वह 1995 का साल था। तब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए इतिहास का  छात्र था। बिहार में कॉलेज शिक्षक पात्रता के लिए यूजीसी नेट की तर्ज पर बेट ( बिहार इलेजब्लिटी टेस्ट) परीक्षा का ऐलान हुआ। मैंने इसके लिए आवेदन कर दिया। परीक्षा केंद्र आया जमशेदपुर मतलब टाटानगर। वाराणसी से शाम को नीलांचल एक्सप्रेस में सवार हुआ। कोई आरक्षण नहीं था। कुछ और साथी जा रहे थे। बैठने की जगह मिल गई। सफर आसानी से कट गया। टाटानगर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद बाकी साथी अपने लिए आशियाना के इंतजाम करने लगे। पर मेरी ठहरने की जगह नियत थी।

मुझे पहुंचना था आदित्यपुर में आशियाना रेसिडेशियल कांप्लेक्स। वहां रहते हैं श्री बीसी सिंह। वे इंडियन आयल में अधिकारी हैं। मेरे दूर के रिश्तेदार। हमने सासाराम के प्रोफेसर अवधेश कुमार सिंह का पत्र उनके नाम ले रखा है। पते की तलाश करता हुआ मैं आदित्यपुर में उनके फ्लैट  में पहुंच गया। वहां मेरा बीसी सिंह के परिवार ने स्वागत किया। नास्ते खाने-पीने का पूरा ख्याल रखा। अगले दिन मेरे परीक्षा केंद्र तक बीसी सिंह जी खुद अपनी कार से छोड़ने आए। तो मेरा परीक्षा केंद्र था जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज में। बिष्टुपुर में स्थित इस कॉलेज की स्थापना 1953 में हुई थी। सन 1962 में जेआरडी टाटा के सौजन्य से इस कॉलेज को अपना सुंदर परिसर मिला। कॉलेज के आसपास की सड़के सुंदर हैं। बिष्टुपुर एक योजनाबद्ध नगर सा दिखाई देता है।

जब परीक्षा गुजर गई तो बीसी सिंह फिर मुझे लेने आए और अपने घर ले गए। इस दौरान दो दिन जमशेदपुर शहर में रहना हुआ पर मैं जमशेदपुर घूमने के लिए समय नहीं निकाल पाया।  
अगले दिन मेरी वापसी का होनी थी पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से। बीसी सिंह जी बडे बेटे मुझे छोड़ने के लिए स्टेशन आए। ट्रेन लेट थी। ट्रेन आने तक हमलोग स्टेशन की कैंटीन में बैठकर गप्पे लड़ाते रहे। ट्रेन आई। मैं इसके जनरल डिब्बे में सवार हुआ। जगह आसानी से मिल गई। उम्मीद थी की मुगलसराय तक का सफर आसानी से कट जाएगा, पर ऐसा होना नहीं था। 

टाटा नगर से चलने के बाद चांडिल जंक्शन आया। चांडिल अब सरायकेला खरसावा जिले में पड़ता है। इसके बाद ट्रेन बंगाल में घुस गई। पुरुलिया जंक्शन रेलवे स्टेशन आने के बाद फिर से झारखंड ( तब बिहार राज्य ही था) में प्रवेश कर गई। इस बीच अच्छी बारिश हुई। भीषण गर्मी में बारिश ने बड़ा सुकून प्रदान किया। बोकारो स्टील सिटी, चंदनपुरा से लेकर गोमो जंक्शन तक सब कुछ ठीक रहा। इसके बाद ट्रेन के जनरल डिब्बे में सारी सीटे भरने लगीं। बढ़ती भीड के साथ घुटन होने लगी। 

गया जंक्शन में तो भीड़ का बड़ा रेला आया कोच में। इतनी भीड़ की डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं। आदमी के ऊपर आदमी। उसके ऊपर भी आदमी। आप टायलेट जाने की भी नहीं सोच सकते। भीषण गर्मी में भीड़ के कारण मुझे घुटन होने लगी। मेरा टिकट मुगलसराय तक का था। डेहरी ओन सोन के बाद रात के आठ से नौ बजे के बीच ट्रेन सासाराम पहुंचने वाली थी। जनरल डिब्बे की भीड़ में दबा हुआ मैं। तो मैंने तय किया कि यहीं उतर जाना है। प उतरना भी इतना कोई आसान काम नहीं था। जिन लोगों ने जनरल डिब्बे की भीड़ में सफर किया हो उन्हें ये इल्म होगा कि ट्रेन स्टेशन पर एक या दो मिनट रुकने वाली हो तो उससे उतरने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। तो अब मेरे भी संघर्ष की शुरुआत हो रही थी। 

मैंने अपने साथ सफर करने वाले से कहा,मैं गेट पर जाकर प्लेटफार्म  के उल्टी तरफ उतरने की कोशिश करता हूं। जब मैं उतर जाउं तो खिड़की से आवाज दूंगा आप मेरा सूटकेस खिड़की से बाहर फेंक देना। खैर काफी संघर्ष करके मै उतर गया। हमारे सहयात्री ने मदद की और मेरा सूटकेस बाहर फेंक दिया। बाहर की खुली हवा में आकर जान में जान आई। मुझे उन लोगों की शारीरिक क्षमता पर रस्क होता है जो इस भीड़ में दिल्ली तक का सफर करने के लिए तैयार हैं।


रात नौ बजे मैं प्रोफेसर अवधेश बाबू के घर पहुंचा। वे सासाराम रेलवे स्टेशन के पास ही गौरक्षिणी मुहल्ले में रहते थे। मेरा पूरा अनुभव सुनकर उन्होंने कहा, अच्छा ही किया ट्रेन से उतर गए। अगले दिन सुबह का अखबार पढ़ा – मुगलसराय ( अब दीनदयाल नगर) में रात को पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे से चार शव निकाले गए। वे सभी गर्मी और घुटन से मर गए थे। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वरना इन चार में एक मैं भी हो सकता था।  ( यात्रा काल - 1995 ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BHU, VARANASI, TATANAGAR, ADITYAPUR, BISTUPUR, JAMSHEDPUR, JWC, PURULIA, SASARAM, COLORS OF BANARAS

Tuesday, October 20, 2020

यहां हुआ रावण का जन्म – इस गांव में दशहरे में रावण नहीं जलता


उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर  जिले के ग्रेटर नोएडा  क्षेत्र में एक गांव है बिसरख। इसे रावण
   के गांव   के तौर पर भी जाना जाता है।  मान्यता के अनुसार गांव में कई दशकों से   रावण   के पुतले का दहन नहीं किया जाता। दशहरे में जहां पूरा देश रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाता है, वहीं बिसरख गांव की तस्वीर थोड़ी अलग होती है। यहां पौराणिक असुर राज के जीवन और शिक्षाओं का जश्न मनाया जाता है। यहां के लोगों के लिए आज भी रावण बाबा हैं। पूजनीय हैं। 



बिसरख गांव के एक कोने में स्थित है प्राचीन शिव मंदिर। कहा जाता है कि लंकापति रावण इस गांव में पैदा हुए थे। इस मंदिर को रावण मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है। गांव के विजय भाटी बताते हैं कि रावण के पिता का आश्रम हुआ करता था बिसरख में। इसी आश्रम में रावण का जन्म हुआ। रावण के भाई कुबेर, कुम्भकर्ण और विभीषण भी यहीं पर जन्मे थे। यह भी माना जाता है कि बाल्यकाल से ही शिव भक्त रावण ने शिव की कठिन उपासना की। उन्होंने यहीं पर शिव मंत्रावली की रचना भी की थी। जिस मंदिर में यह शिवलिंग स्थापित है, वहां पौराणिक काल की मूर्तियां बनी हुई हैं। बिसरख गांव में विभिन्न स्थानों पर खुदाई में अब तक 25 से ज्यादा शिवलिंग निकल चुके हैं।


वैसे तो गांव में कोई रावण का मंदिर नहीं है। पर गांव के प्राचीन शिव मंदिर को लोग रावण मंदिर के तौर पर जानते हैं। इस मंदिर में प्राचीन शिवलिंग है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना ऋषि विश्रवा ने स्वयं की थी। यह अष्टभुजी शिवलिंग है। कहा जाता है इस तरह का शिवलिंगम कहीं दूसरा नहीं है। इस प्राचीन मंदिर का अब जीर्णोद्धार किया जा रहा है। इसका प्रवेश द्वार और परिसर को भव्य बनाया जा रहा है। मंदिर में एक विशाल गैलरी बनाई गई है। इस गैलरी में ऋषि विश्रवा की प्रतिमा स्थापित की गई है। इसके साथ कई और देवी देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।



रावण के पिता थे ऋषि विश्रवा। वे पौलत्स्य मुनि के पुत्र थे। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त थे। तो रावण का जन्म हुआ यहां पर ऋषि के आश्रम में। उनका बचपन बिसरख में ही बीता। तो गांव के लोगों के लिए वह बेटा है गांव का। तो भला उसका पुतला कैसे जला सकते हैं। गांव के लोग तो रावण पर गर्व करते हैं। अब गांव के लोग एक अलग से रावण का मंदिर बनाने पर भी विचार कर रहे हैं।

दरअसल विश्रवा ऋषि के नाम पर ही इस गांव का नाम बिसरख पड़ा। सरकारी दस्तावेजों में इस गांव का नाम बिसरख जलालपुर है। संभवतः जलालपुर मुगलकाल में जुडा होगा। गांव में गूजर और दलित बिरादरी के लोगों की अच्छी संख्या है। बिसरख गांव कभी नोएडा से दूर हुआ करता था। पर अब शहर के विस्तार ने गांव के शहरी सीमा में ले लिया है। गांव के आसपास ग्रेटर नोएडा वेस्ट के विशाल अपार्टमेंट बन चुके हैं।



कैसे पहुंचे - बिसरख गांव पहुंचने के लिए आप ग्रेटर नोएडा वेस्ट के गौड़ चौक (चार मूर्ति चौक) से सूरजपुर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़े। सुपरटेक इकोविलेज वन के पास बिसरख गांव आ जाता है। चौराहे से दाहिनी तरफ मुड़कर गांव में  पहुंच जाएंगे। बिसरख गांव में कोतवाली है। कोतवाली से मंदिर की दूरी आधा किलोमीटर है।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 

( ( RAVAN , BISRAKH, GREATER NOIDA, SHIVA TEMPLE) 

 


 

 

Sunday, October 18, 2020

जीटी रोड पर शेरशाह कालीन सराय

शेरशाह सूरी मध्यकालीन भारत का ऐसा सम्राट हुआ जिसने देश के चहुंमुखी के लिए अनेक कार्य किए वह भी अपने बहुत छोटे से शासन काल में। तो शेरशाह की एक स्मृति दिल्ली से गाजियाबाद जाते समय साहिबाबाद के जीटी रोड पर भी देखी जा सकती है।

दरअसल शेरशाह ने कोलकाता से पेशावर तक जीटी रोड बनवाने के बाद इसके किनारे जगह-जगह राहगीरों के लिए पक्के सराय का निर्माण कराया था। इन सरायों कई तो विलुप्त हो गए लेकिन कुछ का अस्तित्व अभी बचा हुआ है। ऐसी ही एक शेरशाह कालीन सराय साहिबाबाद के पास जीटी रोड पर देखने को मिलती है। पर इस ऐतिहासिक इमारत के महत्व से आसपास के लोग अनजान हैं। संरक्षण के अभाव में इस सराय का क्षरण हो रहा है।

श्याम पार्क स्थित जीटी रोड के एक किनारे पर बनी यह छोटी सी इमारत फिलहाल जर्जर हालत में दिखाई देती है। श्याम पार्क मेट्रो स्टेशन के पास दक्षिणी हिस्से में इस इमारत को देखा जा सकता है। जीटी रोड की ऊंचाई बढ़ने के कारण यह इमारत थोड़ी नीची हो गई है।

इतिहासकार बताते हैं कि यह इमारत मध्यकाल की है। इसके निर्माण में छोटे आकार के लाखोरी ईंटों का प्रयोग किया गया है। यह इमारत शेरशाहकालीन है। शेरशाह सूरी ने करीब 400 साल पूर्व जीटी रोड का पुनर्निर्माण कराया था। इसी दौरान इस सराय का भी निर्माण कराया गया था।

शेरशाह ने सोलहवीं सदी में जीटी रोड के दोनों ओर लगभग 1700 सरायों का निर्माण कराया था। यह मुसाफिरों के ठहरने का स्थान हुआ करता था। शेरशाह कालीन ये सराय कई जगह तिजारत का भी केंद्र हुआ करते थे। मतलब इसके आसपास बाजार भी लगता था।

वैसे तो मुगलकाल में जीटी रोड को बादशाही सड़क कहा जाता था। हालांकि शेरशाह से पूर्व भी यह सड़क मौजूद थी। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के दौरान पाटलिपुत्र से अफगानिस्तान के काबुल तक इस सड़क को बनाया गया था। शेरशाह सूरी ने इसका पुनर्निर्माण कराया। ब्रिटिश राज के दौरान इस सड़क का नाम बादशाही सड़क से बदलकर ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) रख दिया गया। पर आजाद भारत में इसे एक  बार फिर नाम मिला शेरशाह सूरी पथ।

वर्तमान में जो जीटी रोड है उसे ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाया था। तब इस मार्ग को उत्तर पथ भी कहा जाता था। शेरशाह ने अपने शासन काल में फिर से पूरे पथ का नए सिरे से निर्माण कराया। तब इस मार्ग का नाम बादशाही सड़क रख दिया गया। यह देश की प्रमुख सड़क थी। जो बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली पंजाब आदि राज्यों को जोड़ती थी। इस मार्ग पर शेरशाह की डाक व्यवस्था का भी संचालन होता था।


साहिबाबाद में जो शेरशाहकालीन सराय दिखाई देती है इसका संरक्षण किए जाने की जरूरत है। इसके आसपास की दीवार तक दुकानदारो ने कब्जा कर रखा है। इसे तार के बाड़ लगाकर ऐतिहास महत्व की इमारत घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही यहां इसका महत्व बताता हुआ एक बोर्ड भी लगाया जाना चाहिए। अगर संरक्षित नहीं किया गया तो इस तरह की कई छोटी छोटी ऐतिहासिक इमारतें विलुप्त हो सकती हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( SAHIBABAD, GAZIABAD, SHERSHAH, SARAI, GT ROAD, BADSHAHI SADAK  )

Friday, October 16, 2020

जैन शिकंजी - मोदी नगर का अलबेला स्वाद


दिल्ली से मेरठ जाने के रास्ते में कई बार आपको जैन शिंकजी का बोर्ड लगा हुआ दिखाई दिया होगा। मुझे भी तीन दशक से ये बोर्ड दिखाई देता है। जैन शिंकजी इतना प्रसिद्ध है कि इसके नाम से कई नकली जैन शिंकजी वालों ने भी अपना कारोबार शुरू कर दिया है।

तो जैन शिकंजी की मूल शाखा है दिल्ली मेरठ रोड पर मुरादनगर और मोदी नगर के बीच में गंग नगर के पास। दिल्ली से जाते समय में दाहिनी तरफ जैन शिंकजी का रेस्टोरेंट दिखाई देता है। अक्सर लंबी यात्रा करने वाले लोग जैन शिंकजी के पास जरूर रूकते हैं। गर्मी के दिनों में तो शिंकजी का कारोबार खूब चलता है। वैसे शिकंजी तो हर जगह मिलती है पर इस शिंकजी में क्या खास है। शिंकजी में क्या होता है। पानी, नींबू, बर्फ और मसाला। पर यही मसाला जैन शिंकजी को खास बनाता है। इस मसाले के कारण ही दूर-दूर से आने वाले लोग जैन शिकंजी के स्वाद के दीवाने हैं।

अब जैन शिंकजी वाले ने अपना ब्रांड बना लिया है। वे शिंकजी का मसाला और दूसरे कई तरह के पाचक चूर्ण और मसाले बनाने लगे हैं। तो आते जाते लोग इन मसालों को भी खरीद कर ले जाते हैं। कारोबार बढ़ा है तो जैन शिंकजी अब कंपनी बन चुकी है। शिकंजी के स्टाल ने विशाल रेस्टोरेंट का रूप ले लिया है। इनके यहां एक ग्लास शिकंजी की दर 50 रुपये है। बाकी जगह के शिकंजी से थोडी महंगी जरूर है। पर अब यह एक ब्रांड बन चुका है।

शाकाहारी भोजन भी - जैन शिंकजी के रेस्टोरेंट में सिर्फ शिकंजी ही नहीं बल्कि शाकाहारी खाने में काफी कुछ मिलता है। ज्यातर लोग स्नैक्स में यहां पर शिकंजी के साथ पकौड़े खाना पसंद करते हैं। कई तरह के पकौड़े के साथ आप यहां पर छोले भठूरे का भी आनंद ले सकते हैं। हालांकि 90 रुपये के छोल भठूरे के प्लेट के साथ वे प्याज भी परोसते हैं। मतलब खालिस जैन रेस्टोरेंट नहीं है। अगर जैन रेस्टोरेंट होता तो यहां लहसुन प्याज का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। पर कारोबार में सब जायज है।


जैन शिकंजी के रेस्टोरेंट में आपको खाना पीना सब कुछ मिलता है। यहां पर आप शाकाहारी थाली का आनंद ले सकते हैं। अलग अलग तरह के व्यंजनों का कांबो भी बना सकते हैं। इस रेस्टोरेंट में सुबह से लेकर देर रात तक खाना हर समय तैयार मिलता है। दोपहर से शाम से बीच रेस्टोरेंट कभी बंद नहीं होता। आते जाते लोगों के लिए पार्किंग की भी जगह है। 


जैन शिकंजी का स्वाद अब दिल्ली में भी – साल 2019 में जैन शिकंजी की एक शाखा दिल्ली के विकास मार्ग पर भी खुल गई है। लक्ष्मीनगर मार्ग पर शकरपुर वाली साइड में जैन शिकंजी का विशाल रेस्टोरेंट खुल गया है। जो मोदीनगर का मीनू वह सब कुछ वहां भी उपलब्ध है। दिल्ली के जो लोग जैन शिकंजी के दीवाने थे उनको अब मोदीनगर तक जाने की जरूरत नहीं है। वे लक्ष्मीनगर में भी शिकंजी और पकौड़ों का स्वाद ले सकते हैं। लक्ष्मीनगर के रेस्टोरेंट में छोले भठूरे तथा दूसरे व्यंजन भी उपलब्ध हैं। विकास मार्ग पर शाकाहारी भोजन के लिए ये अच्छी जगह हो सकती है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         ( JAIN SHIKANJI, MODINAGAR, MURAD NAGAR, MODI NAGAR, VIKAS MARG )
  

Wednesday, October 14, 2020

चलिए गंगा स्नान करने छोटा हरिद्वार



अगर आप गंगा स्नान के लिए हरिद्वार नहीं जा सकते तो क्या छोटा हरिद्वार है ना। ये कहां है भाई। तो सभी गंगा प्रेमियों को मालूम है कि छोटा हरिद्वार गाजियाबाद में मुरादनगर और मोदीनगर के बीच में है। यहां तक की गूगल मैप्स पर भी इसे छोटा हरिद्वार कहा जाने लगा है।



दरअसल हरिद्वार से आने वाले गंग नहर मुरादनगर और मोदीनगर के बीच से होकर गुजरती है। जब आप गाजियाबाद में मोहननगर से आगे चलते हैं तो मोरटा, गुलधर के बाद दुहाई में पेरिफरल एक्सप्रेस वे को पार करते हैं। इसके बाद मुरादनगर कस्बा शुरू हो जाता है। कभी मुरादनगर गाजियाबाद से दूर हुआ करता था। पर अब शहर के विस्तार ने मुरादनगर को गाजियाबाद का हिस्सा बना लिया है। यह गाजियाबद मेरठ लाइन पर रेलवे स्टेशन भी है। पर मुरादनगर प्रसिद्ध है आयुध निर्माणी फैक्टरी के लिए। जी हां यहां पर रक्षा मंत्रालय का हथियार बनाने का कारखाना है। इसलिए मुरादनगर में कई दशक से देश भर के लोग आकर बसते रहे हैं।

तो मुरादनगर शहर को पार करने के बाद अपर गंग कैनाल दिल्ली मेरठ हाईवे को क्रॉस करती है। यहीं पर बना है छोटा हरिद्वार। इसे छोटा हरिद्वार नाम गंगा के श्रद्धालुओं ने दिया है। दरअसल हरिद्वार में हर की पैड़ी की तरह ही यहां पर भी गंग नगर में दोनों तरफ स्नान के लिए घाट का निर्माण कराया गया है। गंग नहर में पानी की गहराई 12 फीट है और पानी का बहाव काफी तेज है इसलिए स्नान घाट के पास लोहे की जंजीरें भी लगाई गई हैं जिससे स्नान करने वालों की सुरक्षा बनी रहे। यहां पर शिव जी की मूर्ति और एक शनि का मंदिर भी है। गाहे बगाहे यहां पर साधुओं लोगों का डेरा भी लगा रहता है।

अब भला इसे छोटा हरिद्वार क्यों मानें। तो आप यूं समझिए कि हरिद्वार में हर की पैड़ी में जिस गंगा जी के पानी में आप स्नान करते हैं वही गंगा जी का पानी यहां पर चल कर आता है। यहां से हरिद्वार की दूरी गंग नहर के रास्ते से 160 किलोमीटर है। अगर आप हर की पैड़ी की हकीकत को जाने तो वह भी गंगा जी की मूल धारा नहीं है। गंगा जी पर हरिद्वार में भीगोडा में बैराज बनाया गया है। उस बैराज से नहर निकाली गई है। इस नहर का ही पानी हर की पैड़ी में आता है। तो हरिद्वार की हर की पैड़ी में आप जिस गंगा में स्नान करते हैं वह भी गंग नहर ही है।

वही ब्रिटिशकालीन गंग नगर हरिद्वार से चलकर मुरादनगर होते हुए आगे की ओर बढ़ती जा रही है। इस गंग नगर में रास्ते में कहीं किसी और नदी नाले का पानी नहीं मिलता। इसलिए आपको मुरादनगर में भी विशुद्ध गंगा जल मिलता है, स्नान के लिए। इसलिए अगर आप दिल्ली एनसीआर में रहते हैं और आपको गंगा स्नान के लिए हरिद्वार तक जाने का समय नहीं है तो कोई बात नहीं। मुरादनगर से आगे गंग नहर पहुंचे और गंगा स्नान का सौभाग्य प्राप्त करें। स्नान के बाद कुछ खाना पीना हो तो वहीं कई रेस्टोरेंट भी मौजूद हैं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com    
 ( GANG NAHAR, GANGA BATH, CHOTA HARIDWAR, MURADNAGAR ) 


Monday, October 12, 2020

आलमगीरपुर से गाजियाबाद वापसी वाया गंग नहर

आलमगीर पुर से वापसी में मैं कल्याणपुर की तरफ न जाकर बहरामपुर खास की तरफ चला। बहरामपुर गांव में रुककर एक मिठाई की दुकान से एक कोल्ड ड्रिंक की छोटी बोतल खरीदकर पिया। दुकानदार से आगे का रास्ता पूछा। उसके अनुरूप आगे चला। एक नहर आया। यहां कुछ बच्चे पानी में नहाकर गर्मी दूर भगा रहे थे। दरअसल ये गंग नहर की ब्रांच कैनाल है। 

यहां पर वाटर फ्लो बनाकर पानी की धारा को मोड़ा गया है। बचा हुआ पानी नीेचे चला जाता है जो आगे जाकर हिंडन में मिल जाता है। यहां बच्चों को नहाते देख अपना बचपन याद आग गया जब हम अपने गांव के सोन नहर में नहाया करते थे। इसी नहर के किनारे किनारे बायीं तरफ बनी सड़क पर आगे चला। नेक गांव में इस नहर पर बने पुल को पार करके नहर के दाहिनी तरफ सड़क चल रही है।

थोड़ी देर बाद सड़क नहर से अलग होकर हरे भरे खेतों से होकर चलने लगी। हम मेरठ बागपत हाईवे पर पहुंच चुके हैं। यहां बायीं तरफ चलने के बाद गंग नहर का चौराहा आता है। सीधे चलने पर नौ किलोमीटर आगे मेरठ बाईपास है। पर उधर जाने की कोई जरूरत नहीं है।

गंग नहर के साथ चल रही सड़क पर चलते हुए सीधे मोदीनगर और मुरादनगर के बीच छोटा हरिद्वार पहुंचा जा सकता है। तो मैंने गंग नहर के साथ वाली सड़क पकड़ ली है। रास्ते में कुछ ढाबे खुले हुए हैं। सड़क के किनारे दसहरी और लंगड़ा आम की दुकानें सजी हैं।


वास्तव में ये गंग नहर का मार्ग दिल्ली से हरिद्वार जाने का का एक वैकल्पिक मार्ग भी है। आप मुरादनगर से गंग नहर पकड़कर सीधे खतौली बाईपास पहुंच सकते हैं। इसमें मेरठ जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर आपको शुकताल जाना है तो गंग नहर के साथ चलते हुए सीधे भोपा पहुंच सकते हैं। भोपा से शुकताल थोड़ी दूर ही रह जाता है।

गंग नहर के साथ चलते हुए देख रहा हूं कि रास्ते में जगह जगह निर्देश लिखे हैं कि नहर में पानी की गहराई 12 फीट है। नहर में नहाने के लिए नहीं उतरें। एक जगह चौराहा आया जहां से एक रास्ता मोदीनगर की तरफ जा रहा है पर सीधे चलते हैं मुरादनगर पहुंच जाएंगे। मैं सीधे चल रहा हूं। पर मुरादनगर से पहले एक जगह रूक जाता हूं। भूख लग रही है। सड़क के किनारे वेज बिरयानी वाली दुकान है। बिरयानी खाने के बाद दो ग्लास गन्ने का जूस पिया फिर आगे की ओर चल पड़ा।

तो गंग नहर हरिद्वार से आती है। भीमगोडा बैराज से जो नहर निकाली गई वह हर की पैड़ी होते हुए गाजिबाद के करीब मुरादनगर से होकर गुजरती है। इसमें गंगा का पानी आ रहा है। तो मुरादनगर में गंगनगर के पुल के पास लोगों ने छोटा हरिद्वार तीर्थ बना दिया है।

गंग नहर का निर्माण 1842 से 1854 के बीच किया गया था। तब ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था। यह हरिद्वार से निकलकर अलीगढ़ तक जाती है। इसका निर्माण सिंचाई के साथ नौवहन परियोजना के लिए किया गया था। नहर की लंबाई 272 मील है। यह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के 10 जिलों की 9000 वर्ग किलोमीटर में फैले खेतों को सींचित करती है। जगह जगह इस नगर से ब्रांच कैनाल और रजवाहे निकाले गए हैं। अलीगढ़ के नानू में गंग नहर इटावा और कानपुर दो शाखाओं में बंट जाती है।

यूं बनी गंग नहर की योजना - सन 1837-38 में इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एक करोड़ से ज्यादा की राजस्व हानि हुई। तब इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए एक नहर की आवश्यकता महसूस की गई। इस नहर के निर्माण का श्रेय कर्नल पोर्बी कॉटली को जाता है, जिन्होंने 500 किलोमीटर से ज्यादा लंबी इस नहर के निर्माण की रुपरेखा बनाई। अप्रैल 1842 में जब नहर का निर्माण शुरू हुआ तो हरिद्वार के पंडों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि गंगा के पानी को कैद करना ठीक नहीं होगा। पर कॉटली ने उन्हें मना लिया। नहर के शिलान्यास के समय गणपति वंदना भी की गई। सन 1854 में हरिद्वार से इस नहर में पानी छोड़ा गया। तब यह नहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए जीवनदायिनी साबित हुई।

नौका परिवहन की भी सुविधा - इस गंग नहर पर बने कई पुल 1850 और उसके आसपास के हैं। गंग नहर को नेविगेशन सिस्टम से लैस बनाया गया है। रास्त में आठ ऐसे पुल हैं जहां पर पानी ऊपर से नीचे गिरता है। पर यहां नाव को पार कराने के लिए नेविगेशन सिस्टम बनाया गया है। हालांकि आजकल गंग नहर में नौका परिवहन नहीं होता। पर एक बार फिर ऐसा किया जा सकता है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         (GANG NAHR, HARIDWAR, MERRUT, MURADNAGAR )

REF –

Saturday, October 10, 2020

सिंधु घाटी सभ्यता के समय आबाद था आलमगीरपुर


पूरा महादेव से कल्याणपुर मार्ग पर हरनंदी नदी का पुल पार करके थोड़ी दूर चलने पर दाहिनी तरफ एक डामर वाली सड़क मुड़ रही है। हम पहुंच रहे हैं आलमगीर पुर गांव में। मेरठ जिले का यह गांव कभी सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख केंद्र था। नदी पार करने के बाद दोनों तरफ हरे भरे खेत नजर आ रहे हैं। दाहिनी तरफ एक कच्ची सड़क आलमगीरपुर की तरफ जा रही है। सड़क पर मुड़ते ही खेत में गांव के पूर्व प्रधान की समाधि नजर आई। इससे पता चला कि हम सही गांव में जा रहे हैं। 

हालांकि दुखद है कि इस ऐतिहासिक गांव के बारे में बताने के लिए मुख्य सड़क पर गांव को लेकर कोई साईनबोर्ड या पथ संकेतक नहीं लगाया गया है। आसपास के गांव के लोगों को भी इसकी ऐतिहासिकता के बारे में ज्यादा नहीं पता।  

वैसे आलमगीर पुर आप मेरठ बागपत हाईवे से होकर भी पहुंच सकते हैं। हाईवे पर गंग नहर से आगे जानी खुर्द गांव से बहरामपुर खास गांव होकर आलमगीर पुर पहुंचा जा सकता है। इस गांव का प्राचीन नाम परसराम का खेड़ा हुआ करता था। बाद में मुस्लिम प्रभाव से इसका नाम आलमगीर पुर हो गया।

गांव में पहुंचने पर लगता है कि आलमगीर पुर एक संपन्न गांव हैं। लोगों को घर अच्छे बने हैं। सड़के ठीक हैं। गांव के बीच में बने एक मंदिर केपास जाकर मैं टीले का रास्ता पूछता हूं तो एक दुकानदार उत्तर की तरफ जाने को कहते हैं। गांव से बाहर निकलने पर एक मिट्टी का टीला नजर आता है। इस टीले पर लोगों ने भूसा रखने के स्टोर बना रखे हैं। 

मतलब टीले पर गांव का कब्जा है। पूरे टीले का एक चक्कर लगाने के बाद कोने पर एक खेत में पुरातत्व विभाग का एक साइनबोर्ड नजर आता है। वह लोगों को अतिक्रमण से सावधान करता है। पर आलमगीर पुर के इतिहास से परिचित कराने वाला कोई बोर्ड यहां पर नहीं है। मैं टीले के ऊपर चढ़ कर पहुंचता हूं तो यहां हाल के बने तीन देवस्थल नजर आते हैं। बाकी टीले का धीरे धीरे कटाव हो रहा है।

लंबे समय तक आलमगीरपुर के बारे में लोग अनजान थे। पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में यमुना की सहायक हिण्डन नदी के किनारे स्थित इस प्राचीन स्थल की खोज 1958 में इतिहासकार यज्ञदत्त शर्मा द्वारा की गई। आलमगीर पुर गंगा-यमुना में के रेंज वह पहला स्थल था जहां से हड़प्पा कालीन अवशेष प्रकाश में आए थे।

इसे यह नदी घाटी सभ्यता का का सबसे पूर्वी छोर में स्थित पुरातात्विक स्थल माना जाता है। इस स्थल का सैंधव सभ्यता की अन्तिम अवस्था से जोड़कर देखा जाता है।
आलमगीरपुर में खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तन, मनके एवं पिण्ड मिले थे। यहां एक मिट्टी के गर्त से रोटी बेलने की चौकी और कटोरे के टुकड़े भी प्राप्त हुए थे। हालांकि यहां से दूसरी नदी घाटी सभ्यता के शहरों की तरह मातृदेवी की मूर्ति और मुद्राएं आदि नहीं मिली है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा इसका उत्खनन 1958-59 में कराया गया। खुदाई के दौरान यहां प्राप्त ईंटों का आकार, लंबाई में 11.25 इंच से 11.75 इंच, चौड़ाई में 5.25 इंच से 6.25 इंच और मुटाई में 2.5 इंच से 2.75 इंच के मिले हैं।

वहीं खुदाई में यहां विशिष्ट हड़प्पा सभ्यता जैसी ही मिट्टी के बर्तन मिले थे।  जिस जगह इनकी प्राप्ति हुई उससे लगता था कि यहां पर मिट्टी के बर्तन बनाने की कार्यशाला संचालित होती थी। साथ ही सिरेमिक (CERAMIC) के  वस्तुओं में छत की टाइल, बर्तन, कप, फूलदान, घनाकार पासा, मोती, टेराकोटा केक, गाड़ियां और एक कूबड़ वाले बैल और सांप की मूर्तियां भी यहां से प्राप्त हुई थीं। 

धातु के सामान आलमगीरपुर से कम मिले हैं। परन्तु, इसमें एक तांबे से बना टूटा हुआ ब्लेड पाया गया था। प्रारंभिक व्यवसाय में मिट्टी की ईंट, लकड़ी आदि से बने घरों का निर्माण के बारे में भी जानकारी मिलती है। ये घर एक विशिष्ट हड़प्पा सामग्री संस्कृति से जुड़े थे, जिसमें सिंधु लिपि, जानवरों, स्टीटाइट मोतियों आदि के  बर्तन शामिल थे।

कटता जा रहा है ऐतिहासिक टीला – आलमगीर पुर गांव के लोग इसके ऐतिहासिक महत्व से अनजान हैं। वे धीरे धीरे अपनी खेती की जमीन को बढ़ाने के लिए टीले को काटकर समतल करते जा रहे हैं। पुराने लोग बताते हैं कि जब साठ के दशक में इस टीले की खुदाई हुई थी, तब यह बहुत बड़ा था। अब इसका क्षेत्रफल घटकर आधा रह गया है। 

इस महान ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसे सुरक्षित स्थल घोषित तो कर दिया है, लेकिन इसके संरक्षण के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है। इसकी वजह से गांव के लोग अपने खेतों के क्षेत्रफल को बढ़ाने के लिए टीले को काट कर तेजी से समतल जमीन में बदल रहे हैं। टीले पर लोगों ने गोबर के बिटौरे बनाना शुरू कर दिया है। लगातार अवैध निर्माण हो रहे हैं। वहीं एएसआई के अधिकारियों ने यहां पर सुरक्षा के लिए किसी स्थायी कर्मचारी की नियुक्ति या फिर इसकी बाउंड्री कराने का कोई प्रयास नहीं किया है।

टीला देखकर लौटने के बाद आलमगीरपुर गांव के बीच में मंदिर के सामने वाली दुकान पर रुककर मैं एक समोसा खाता हूं। छह रुपये का एक समोसा दो तरह की चटनी के साथ। इसके बाद बहरामपुर गांव की तरफ चल पड़ता हूं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( ALAMGIRPUR, MERRUT, MARK OF INDUS VALLY CIVILIZATION )


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