Monday, September 14, 2020

मिलवा सोहवलिया गांव की आटा चक्की और मुनीम जी

हमारे गांव सोहवलिया में एक मिल हुआ कराता था। मिल मतलब आटा चक्की, सरसों तेल निकालने वाला स्पेलर और धान कूट कर चावल निकालने वाली मशीन। सब कुछ एक परिसर में था। तो गांव का वह विशाल मिल था। इस लिए आसपास के लोग तो उस गांव मिलवा सोहवलिया ही कहने लगे थे। 

इस मिल के स्वामी संभवतः विक्रमा राय हुआ करते थे। पर मिल की गद्दी पर एक मुनीम जी बैठते थे। उनका असली नाम क्या था मालूम नहीं पर आसपास के गांव के सारे लोग उन्हें मुनीम जी ही कहते थे। वे आटा, धान, तेल पिसवाने वालों का बही में हिसाब रखते। लोग उन्हें बड़े हाकिमों जैसा सम्मान देते थे। कई बार लोग उनसे आग्रह करते कि थोड़ा जरती कम काटें। वे अपने को किसी अफसर से कम नहीं समझते थे।

हमारे खेतों में जो गेहूं होता था उसे पिसवा कर आटा बनवाने के लिए मैं दादा जी के साथ इस मिल में जाता था। ज्यादा मात्रा में गेहूं और धान होता तो हमलोग बैलगाड़ी से लेकर मिल तक जाते थे। इस विशाल मिल को चलते हुए देखना मुझे आश्चर्य चकित करता था। 




एक डीजल का विशाल इंजन था। उससे फीता (पाटा) लगाकर सामने के के तीन बड़े बड़े लोहे के पहियों को चलाया जाता था। फिर इन पहियों से फीता लगाकर क्रमशः धान कूटने वाली मशीन, आटा पिसने वाली चक्की और तेल निकालने वाले स्पेलर को चलाया जाता था। बड़े से चौकोर लोहे के ड्रम में गेहूं उलट दिया जाता था, फिर थोड़ी देर में नीचे झोली आटा गिरने लगता था। पर आटा उतना ही नहीं मिलता था जितना हम गेहूं देते थे। मुनीम जी उसमें से प्रति किलो की दर से जरती काट लेते थे। हालांकि आटे की पिसाई अलग से दी जाती थी। फिर भी जरती क्यों काटी जाती थी यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया।

हमारे खेतों में हर साल इतनी सरसों और तीसी बोई जाती थी जिससे कि साल भर खाने भर तेल निकल जाता था। सरसों के तेल को पेरवाने पर उसके साथ खली निकलता था। हम उस खली को ले आते थे। वह खली जानवरों का खाने के लिए दिया जाता था।
मिलवा सोहवलिया के उस मिल के उपर एक विशाल भोंपू लगा हुआ था। जब मिल चलना शुरू होता उस भोंपू से आवाज आती थी। यह आवाज आसपास के कई गांवों तक सुनाई देती थी। कई बार सीजन में मिल दिन रात भी चलता रहता था।

एक बार की बात है मिल खराब हो गई। उसी समय हमारे लिए आटा पिसवाना जरूरी था। तो तय हुआ कि हमारे गांव से दो किलोमीटर दूर गांव बसतलवा में मिल चल रही है। तो दादा जी ने वहां जाकर आटा पिसवाने की तैयारी की। मेरी मां ने मेरे लिए पांच किलो की गठरी बना दी। हम दोनों चल पड़े आटा पिसवाने। बसतलवा गांव वाली मिल बिजली से चलती थी। इसलिए वहां आवाज बिल्कुल नहीं आती थी। हमारे आसपास ये एक ऐसा गांव था जहां बिजली आ चुकी थी।
हमलोग आटा पिसवाकर लौट तो आए। पर सिर पर पांच किलो वजन लाद कर दो किलोमीटर जाना और फिर आना इतना श्रम करने के कारण मुझे अगले दिन बुखार हो गया। ये बुखार कुछ दिनों तक रहा। नन्ही सी जान और इतना काम।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         ( SOHWALIA DAYS 31, ATTA CHAKKI, SOHWALIA, MILL, BASTALWA )

4 comments:

  1. एक आटा चक्की ही है जो घरेलू उपकरणों में ज़्यादा प्रचलित नहीं हुई।अब भी चक्कियां चल रहीं, जरती कट रही।

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  2. जी जरती वे छीजत के नाम पर काटते थे और सिट्टी ईंजन के साईंलेंसर पाईप के मुुंह पर एक लोटा तिरछा बांध कर बजाते थे। पिट पिट की आवाज दूर तक जाती थी, ऐसा हमारे यहां भी हुआ करता था। पुरानी यादें साझा करने के लिए आभार।

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