Tuesday, September 8, 2020

सातु पिसान के गठरी चलेके लइका ददरी

मैं जो सुनाने जा रहा हूं ये कहानी है या फिर संस्मरण ये पाठक खुद तय करें। बलिया जिले के में ददरी में एक पशु मेला लगा करता है। हर साल। हमारे गांव से लोग इस मेले में जाते थे। बैल और गाय खरीदने। आजकल हमारे गांव में भी हल बैलों से खेती खत्म हो गई है। पर सत्तर अस्सी के दशक में जब में गांव मे रहता था बैल हमारे परिवार के अभिन्न सदस्य होते थे। हर घर में एक जोड़ी बैल का होना तो जरूरी होता था।

तो हमारे पास भी दो बैल थे। एक पिपरैला और दूसरा ददरिया। पिपरैला को पिपरा गांव के एक व्यक्ति से खरीदकर लाया गया था। इसलिए उसका ये नाम पड़ा था। वह बड़ा मरखाह बैल था। अपनी मस्ती में माकल चलता था। राह चलते किसी को भी अपनी सिंग से निशाना बना देता था। आते जाते लोग उससे डरकर चलते थे।

एक बैल हमारे पास हुआ करता था गोला। गोला बैल घरवैया था। घरवैया मतलब कि घर की गाय ने बछड़ा दिया। उससे तैयार हुआ बैल। पर घरवैया बैल लाड प्यार में पलता था। इसलिए वह ज्यादा बिगडैल हो जाता था। यही हाल उस गोले बैल के साथ भी था। वह गाहे बगाहे परिवार के हमारे सदस्यो पर भी हमला कर देता था। घरवैया होने के कारण हमलोग उसकी पिटाई नहीं करते थे। तो एक बार जब उसने मेरे पिताजी को भी नहीं बख्सा तो तय हुआ कि इसे बेच दिया जाए। तो बकसड़ा के किसान आए और उसे खरीदकर ले गए। 

पर गोला के चले जाने के बाद हमें एक बैल की सख्त जरूरत थी। तो दादा जी गांव के एक दो लोगों के साथ चल पड़े ददरी मेला। गांव से कोचस फिर चौसा फिर यूपी में ददरी। इतनी लंबी यात्रा पैदल पैदल। तो हमारे दादा जी कहावत कहते थे - सातु पिसान के गठरी चलेके लइका ददरी। इस सातु (सत्तू ) पिसान (आटा) साथ लेकर चलने से रास्ते में कहीं भी रुक कर लिट्टी लगाकर खाया जा सकता था। रास्ते में कहीं आलू भंटा मिल गया तो चोखा भी बन जाएगा। दादा जी एक और कहावत सुनाते थे - सेर चाउर पांव दाल खिचड़ी  बनाव खाव । मतलब एक सेर चावल में 250 ग्राम दाल मिलाकर खिचड़ी बनाओ और शान से खाओ।

गांव के आसपास के काफी लोग ददरी मेला जाते थे गाय और बैल खरीदने। तो दादाजी ददरी मेले से जो बैल लेकर आए उसका नाम रख दिया गया ददरिया बैल। तो घर में जोड़ी बन गई पिपरैला और ददरिया बैल की।

हमारा पिपरैला जो थोड़ा बिगड़ैल था किसी भी दंवनी में हमेशा सबसे दाहिने चलता था। अगर उसे बीच में दंवनी मे लगा दिया गया तो अपने दाहिने और बाएं के बैलों के मार मार कर घायल कर देता था। एक बार मेरे चाचा पिपरैला को मांग कर ले गए थे। उन्होंने यही गलती कर दी। पिपरैला ने न सिर्फ बाकी बैलोंको घायल किया बल्कि दंवनी की रस्सी को तोड़कर भाग निकला और आकर मेरे दरवाजे पर खड़ा हो गया। चाचा पीछे से दौड़ते हुए आए। हमने समझाया तब उन्हे अपनी गलती का अहसास हुआ।

दरअसल खलिहान में गेहूं की फसल से दाना निकालने के लिए आठ दस बैलों को एक साथ रस्सी से जोड़कर दंवनी की जाती थी। इससे बैलों के पांव लगातार दबाव पड़ने से फसल से दाने अलग हो जाते थे। इस दंवनी के दौरान बैल अनाज खा न जाएं इसलिए उनके चेहरे पर मास्क लगा दिया जाता था। इसे भोजपुरी में जाब कहते हैं। पर मेरा पिपरैला तो जाब लगाने पर भी विद्रोह कर देता था।

ददरिया बैल के आने से पहले हमारे पास एक और बैल हुआ करता था। वह थोड़ा बीमार और आलसी थी। तो वह किसी भी दवंनी में मेही चलता था। मतलब उसे दंवनी में सबसे बायीं तरफ लगाया जाता था। इस बैल को सबसे कम चलना पड़ता था। एक दिन वह इस दुनिया से रुखसत हो गया। पर हमारा ददरिया बैल हर मामले में परफेक्ट था। पिपरैला कौ ददरिया की जोड़ी लंबे समय तक कायम रही। उनके गले बंधी घंटी की आवाजें वातावरण में संगीत घोलती थीं। चाहे वे हल में नाधे जाएं फिर बैल गाड़ी में, वे दोनों अपनी सेवा में कोई कोताही नहीं करते थे। गांव के लोग इस जोड़ी को देखकर रस्क करते थे।

पर सन 1980 में वह दौर आया जब दादा जी ने बढ़ती उम्र के बाद खेतीबाड़ी बंद करके सासाराम की सरजमीं को छोड़कर जाकर पिताजी के साथ वैशाली जिले में रहना तय किया। तब भरे मन से पिपरैला और ददरिया बैल का सौदा कानडिहरा गांव के एक सज्जन से कर दिया गया। गांव के बाबू साहब आए और नकद पैसा देकर दोनों बैलों के ले गए। पर अगले दिन हमने क्या देखा। 

प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा की पुनरावृति। झूरी के दो बैल हीरा और मोती की तरह ही हमारे पिपरैला और ददरिया कानडिहरा गांव के खूंटे रस्सी तुड़वाकर भागकर आ गए थे। बिना किसी रस्सी के बड़े मौज से हमारे दरवाजे पर सानी खा रहे थे। दादा जी यह सब देखकर गुम थे । थोड़ी देर मे कानडिहरा गांव के बाबू साहब पहुंचे। बोले महतो जी, बैल त भाग आइल बाड़न सन। खैर एक बार फिर कोशिश हुई और बैलों को उनके नए मालिक के दरवाजे पर पहुंचाया गया।

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
 ( BIHAR, SOHWALIA 28, DADARI MELA ) 

4 comments:

  1. बढ़िया वृत्तान्त, ग्रामीण परिवेश का उम्दा वर्णन।
    शायद दवनी में सबसे बायीं तरफ लगने वाले बैल को ज्यादा लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी।

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  2. कश्मीर वाले को पूरा कीजिए। उसका इंतज़ार है ।

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