Sunday, September 6, 2020

मेरे दलान पर कदम का वह पेड़


गांव में हमारे दो घर थे। एक गलियों में घर जहां मां रहती थी, हम भी रहते थे। वहां खाना भी बनता था। दूसरा था दलान। गांव के दक्षिण कुआं के पास। इस दलान पर दादा जी रहते थे। वे खाना और नास्ता के समय गली वाले घर में आते थे। इस दलान से लगा हुआ विशाल कदम का पेड़ था। उसकी ऊंचाई तीन मंजिले मकान के बराबर थी। ऊंचाई पर जाने के बाद उसकी शाखाएं चारों तरफ फैली थीं। तो पेड़ छाया भी देता था और काफी दूर से नजर आता था। वह कदम का पेड़ हमारे छोटे से गांव की पहचान बना हुआ था।

इस विशाल कदम के पेड़ मे हर साल फल भी लगते थे। फल लगने से पहले उसमें फूल आते थे। ये फूल बड़े प्यारे दिखाई देते थे। मां कच्चे कदम की सब्जी भी बनाती थी। मुझे आज भी उस सब्जी का स्वाद याद आता है। हल्का सा खट्टापन लिए हुए होता था उसका स्वाद। उस कदम के पेड़ के साथ हमारी कितनी यादें जुड़ी हुई हैं।

भरी दुपहरिया में कदम की छांव तले बैठकर मैं देर तक अपना पाठ याद किया करता था। पर उस कदम के पेड़ की डालियों पर पंक्षियों का बसेरा हुआ करता था। कभी सुग्गों का बड़ा झुंड आता था। वे देर तक कदम की डालियों पर बैठकर सभा किया करते थे। तब मैं सुग्गों की भाषा समझता था। ये सुग्गे अपने समाज का आपसी विवाद सुलझाया करते थे। सभी विसर्जित होने पर अलग अलग मंजिलों के लिए उड़ जाते थे। ये सुग्गे तो शाकाहारी थे। 
पर कभी-कभी कदम के पेड़ पर बगुले भी आते थे। बगुलों की बैठक में लड़ाई होती थी खूब। ये बगुले कई बार नहर से मछलियां पकड़कर लाते थे। कदम की डालियों पर बैठकर मछलियों निवाला बनाते। कई बार मछलियों के टुकड़े नीचे गिरा देते थे।

हरि (विष्णु) को प्रिय है कदम : कदम को संस्कृत में कदम्ब या हरिप्रिय कहते हैं। यह वृक्ष कृष्ण यानी हरि को प्रिय था। वृंदावन में बालपन में कृष्ण इसी वृक्ष के नीचे बैठकर बांसुरी बजाया करते थे। इसका वानस्पतिक नाम है- रूबियेसी कदम्बा। पहले इसका नाम रखा गया था नॉक्लिया कदम्बा। इसे रूबियेसी परिवार से संबंधित माना जाता है। 

वैसे इसके पेड़ मुख्य रूप से अंडमान निकोबार, बंगाल और आसाम में पाया जाते हैं। आयुर्वेद के मुताबिक कदम का फल कई तरह की बीमारियों में कारगर है। इसके फल पुराने घाव को भरने में लाभकारी है। यह दाद खाज खुजली में भी लाभकारी है।

ऐसा होता है शहतूत का पेड़। 

हमारे दलान पर उस कदम के पेड़ से पहले पास में एक शहतूत (MULBERRY) का नन्हा सा पेड़ भी हुआ करता था। जब उसमें काले रंग के शहतूत पक कर तैयार हो जाते थे, तो उन्हें खाने में खूब आनंद आता था। दलान पर दादा जी ने छोटा सा बाग ही तैयार कर लिया था। छह कदम के पेड़। एक शहतूत  दो अमरूद के पेड़। एक नीम का पेड़। तीन आम के पेड़। इन आम के पेड़ों पर तो मैं फुर्ती से चढ़ जाया करता था। कई साल बाद महाराष्ट्र के महाबलेश्वर में शहतूत देखने मिला तो खाने को मन मचल गया। 

दोपहर में थके मांदे राहगीर आते तो कुआं से पानी निकालकर पीने के बाद कदम के पेड़ के नीचे आराम फरमाने के बाद आगे का सफर तय करते थे। दादा जी का निर्देश साफ था मैं रहूं या न रहूं अनजान राहगीरों का गुड़ और पानी से स्वागत जरूर होना चाहिए। दादा जी दालान पर मौजूद होते तो हर राहगीर को रोकर कहते – बइठीं, तनी सुस्ता लिहीं तब जाइब। दोपहर का समय हो तो भोजन के लिए भी पूछा जाता था। तब लोग एक गांव से दूसरे गांव और रिश्तेदारी नातेदारी में पैदल ही जाया करते थे।

अब कई नए पेड़ भी लग गए हैं पर अब वे सब पुराने पेड़ अब नहीं दिखाई देते। पर नींबू का वह पुराना पेड़ आज भी सलामत है। इसमें खूब रसीले नींबू फलते हैं। कभी गांव में रहने पर मां इस नींबू के पेड़ से नीबू तोड़कर निमकी बनाया करती थी, जिसे हम सालों भर खाते थे। पड़ोस के दूबे जी के गांव के बच्चे रात के अंधेरे में चोरी चोरी नींबू तोड़ने पहुंच जाते थे। तब दादा जी उन्हें ललकार कर भगाते थे।
उसी नींबू के पेड़ के साथ , साल 2014 में 
सात साल की उम्र गांव छोड़कर पिताजी के साथ चला गया तो कदम का ये पेड़ भी स्मृतियों में मेरे साथ गया। छुट्टियों में जब घर लौटता गांव की सीमा से काफी पहले कदम का वह पेड़ मुझे बुलाने लगता था। पर कई साल बाद जब एक बार गांव लौटा तो वहां कदम का पेड़ नहीं था। दलान के नए भवन के निर्माण के लिए कदम के उस पेड़ को काट डाला गया था। यूं लगा जैसे मेरा पूरा गांव ही ठूंठ हो गया हो।
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(   ( SOHWALIA DAYS 27, KADAMB TREE , LEMON, SHAHTUT, MULBERRY ) 

2 comments:

  1. कदंब का पेड़ 2006 में पहली बार किसी ने महाराष्ट्र से लाकर लगाया था। तेज बढ़ा। जब पहली बार कदंब के फल आये तो कई दिन तक कौतूहल का विषय रहा।
    शहतूत तो उत्तर प्रदेश में बचपन से देखा। सफ़ेद शहतूत कोई मेवा कह कर बुलाते हैं गांव में।
    आपने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही कि राहगीरों को भी पानी भोजन पूछने का रिवाज़ था।
    अब यह सब विलुप्त होता जा रहा है।
    शुभकामनाएं आपको।

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