Friday, September 4, 2020

सिसवार - जहां मैंने पहली बार बिजली का बल्ब देखा

फुल्ली मोड़ , जहां से सिसवार के लिए एक रास्ता जाता है....


मैं कोई छह साल का रहा होऊंगा। अक्तूबर का महीना था दादा जी के साथ दलान पर बैठा था। तभी मेरे गरभे वाले फूफा जी आए उनके साथ चार लोग और थे। उन्होंने मेरे दादा जी के से कहा, अपने बेटे चंदेश्वर  सिंह का दोंगा का दिन रखवाने जा रहा हूं। आप भी चलिए हमारे साथ। दादा बोले मैं तो नहीं जा पाउंगा, कुछ काम है। विकास को लेते जाइए। तो मैं उनलोगों के साथ चल पड़ा। हम पैदल चलते हुए कान डिहरा गांव में पहुंचे। यहां डोमा साह की दुकान में फूफा कुछ खरीददारी के लिए रुके। डोमा साह मुझे देखकर पहचान गए। उन्होंने मुझे खाने केलिए लेमनचूस दिया। तो हमलोग जा रहे हैं सिसवार गांव। तब वहां तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी। फुल्ली से पश्चिम सिसवार गांव स्थित है। जब हमने फुल्ली पार किया तो सिसवार गांव से पहले एक नदी आई। इस नदी पर कोई पुल नहीं था। नदी में बेहया की झाड़ लगी हुई थी। हमलोगों ने नदी के पानी में उतर कर नदी को पार किया। सिसवार गांव में रुचि सिंह के घर में भैया की ससुराल थी।

हमलोगों का वहां अच्छा स्वागत हुआ। एक दलान में हमारे ठहरने का इंतजाम किया गया था। रात को भोजन के लिए घर में ले जाया गया। वहां हमलोग आंगन के चौबारे में खाने पर बैठे। बाद में पता चला कि महिलाओं ने बैठने की बिछाई गई आसनी में लासा (गोंद ) जैसी चीज लगा दी थी। ये महिलाओं के हंसी मजाक का तरीका था। इससे कई लोगों के पांव में वह लासा चिपक गया। हमारे साथ एक कहार भी गया था। जो बोल नहीं पाता था। पर इशारों में बात करता था।

खाने के बाद हमलोग दलान में लौट आए। सिसवार वह गांव था जहां सन 1977 से पहले बिजली  आ चुकी थी। मैंने पहली बार बिजली का बल्ब वहीं देखा था। इस बल्ब को जलाने बुझाने के लिए काले रंग का एक बड़ा स्विच लगा हुआ था। गांव के एक सज्जन आए, उन्होंने स्विच को ऑफ और ऑन करके दिखाया ताकि हमलोग सोने से पहले बिजली बंद कर सकें। मेरे फूफा जी ने भी इसे ऑफ-ऑन करके तस्दीक किया। तब हमलोग निश्चिंत होकर सो सके।

अगले दो दिन हमलोग सिसवार गांव में ही रहे। सिसवार गांव में मैंने बिजली से चलने वाली आटा चक्की देखी। इस मिल के चलने पर डीजल के मिल की तरह कोई आवाज नहीं होता था। यह मेरे लिए बड़े अचरज की  बात थी। मेरे गांव का मिल तो जब चलता था तो उसके पुक-पुक की आवाज आसपास के दो गांव तक सुनाई देती थी।



सिसवार गांव के बीचों बीच एक ऊंचा डीह था। नवरात्र चल रहा था। इसी दौरान गांव के डीह पर दुर्गाजी की मूर्ति की स्थापना हुई। मां दुर्गा की जो मूर्ति आई उसे हमने देखा। मां को चार और चार आठ हाथ थे। वहीं पर हमने पहली बार दुर्गा पूजा का मेला देखा। हम बच्चे यह देखकर बड़े अचरज में थे कि दुर्गा जी के आठ हाथ हैंं।

सिसवार गांव में एक हाई स्कूल भी था। इस हाईस्कूल में मेरे एक चाचा जी शिक्षक थे। तुर्की गांव के भृगुनाथ मास्टर चाचा। वे मुझे अचानक सिसवार में मिल गए। पूछ बैठे तुम यहां कैसे आ गए हो। मैंने बताया कि दोंगा के बारात में आया हूं। बोले, अच्छा अच्छा... 
तीन दिन बाद हमलोग सिसवार से लौट आए। अब कई दशक बाद हमारे गांव में भी बिजली आ गई है। पर मुझे याद आता है कि तब सिसवार हमारे इलाके का प्रगतिशील गांव था। बात एक बार फिर चंदेश्वर भैया की। तो अब वे 60 के हो गए हैं। आजकल वे मोह माया का त्यागकर बौद्ध भिक्षु बन गए हैं। 
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( SOHWALIA DAYS 26, SISWAR, GARBHE, KAIMUR, BIHAR ) 

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