Saturday, September 26, 2020

मिजराब...तुम किस देस में हो...

उसका नाम मिजराब था। बहुत बाद में मैंने जाना का मिजराब का मतलब सितार बजाने वाला छल्ला होता है। तो उसकी आवाज सितार की तरह ही मीठी थी। बिलकुल खनकती हुई। क्या कहा, उससे मेरी मुलाकात कहां हुई थी। अस्पताल में। जी हां अस्पताल में।

मुजफ्फरपुर आई हॉस्पीटल। वहां मेरे दादा जी भर्ती थे। सन 81 का साल था। तब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ता था। दादा जी की आंखों में मोतियाबिंद हो गया था। तो तय हुआ कि उनकी आंखों का आपरेशन करवा दिया जाए। तो उत्तर बिहार के सबसे नामचीन आंखों के अस्पताल में उनका आपरेशन हुआ। उन्हें अस्पताल में दस दिन रहना था। जिस दिन आपरेशन हुआ। हमारे चाचा रामनारायण सिंह दोपहर बाद अस्पताल से घर लौटे।

मैं दोपहर में थोड़ी देर के लिए सो गया था। सपने में देखा कि दादाजी के आंखों का ऑपरेशन सफल हो गया। पर अभी अस्पताल में लंबा वक्त गुजारना है तो मुझे उनकी सेवा सुश्रुषा के लिए बुलाया गया है। अस्पताल से रामनारायण चाचा लौटे तो उन्होंने कहा, पिता जी ने विकास को बुलाया है कल सुबह चलना है अस्पताल में। वहां दादा जी की देखभाल के लिए जरूरत है। तो मेरा दिन का सपना सच हो गया।

अगले दिन सुबह सुबह मैं चाचा के साथ मुजफ्फरपुर आई हास्पीटल के विशाल प्रांगण में पहुंचा। दादा जी पेइंग वार्ड में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। अभी अगले आठ दिन उन्हें यहीं रहना था। उनके आंखो पर पट्टी बंधी थी। दादा जी देख नहीं पाए पर वे मेरी आवाज सुनकर खुश हुए। दादाजी के कमरे में एक सहायक के लिए बिस्तर था जहां मैं रात को सो जाता था।

अगले दिन दादा जी के कमरे के बगल वाले कमरे में बुजुर्ग महिला मरीज का आगमन हुआ। उनका भी एक दिन बाद मोतियाबिंद का आपरेशन होना था। उनके साथ तीन चार महिलाएं थीं और एक मेरी हम उम्र लड़की। शाम ढल रही थी कि वह लड़की हमारे कमरे में आई और पूछा- यहां कहीं कछुआ छाप अगरबत्ती मिलेगी। यहां मच्छर बहुत हैं। मैंने कहा, शायद अस्पताल के स्वागत कक्ष वाले स्टोर पर मिल जाए। वह तपाक से बोली तुम चलो मेरे साथ लेकर आएंगे। नाम क्या है तुम्हारा – विकास और तुम्हारा – मिजराब

कौन सी क्लास में पढते हो – पांचवी में और तुम - मैं छठी में। मैंने पूछा, स्कूल कहां है तुम्हारा – चैपमैन गर्ल्स स्कूल। फिर मिजराब खुद बताने लगी – मुजफ्फरपुर में नीम चौक के पास सातपुरा में घर है हमारा। हम अपनी दादी अम्मा के आंखों का आपरेशन कराने आए हैं। साथ में मेरी अम्मी जान और खाला हैं।

अगली सुबह। हमारे पेईंग वार्ड के विशाल बरामदे के पार्श्व में जूरन छपरा का विशाल तालाब है। इस तलाब में मछुआरे ढेर सारी नावें लेकर मछली मारने निकल पड़े हैं। ऐसा लग रहा है मानो होड़ सी लगी है इन मछुआरों में मछलियां पकड़ने की। उगते सूरज के साथ मछलियां  पकड़ने के इस कारोबार को मैं और मिजराब अस्पताल की बॉलकोनी से देखकर खुश हो रहे हैं। वह बोल पड़ती है- नाव पर घूमना कितना अच्छा लगता है ना। दोपहर बाद मेरे मौसा आएंगे तो हम उनसे बात कर एक नाव किराये पर लेंगे और इस तालाब में तमाम घूमेंगे। तुम भी चलना मेरे साथ खूब मजा आएगा।

उसके बाद अगले कुछ दिन अस्पताल में अल सुबह से लेकर देर रात तक मेरा और मिजराब का साथ रहता। मैं दादाजी की सेवा फारिग होता। मिजराब मुझे बुलाकर अपने साथ ले जाती। कभी अस्पताल के विशाल आंगन में। कभी ऑपरेशन थियेटर की ओर। तो कभी रिसेप्शन की ओर। कभी हम जनरल वार्ड में भी जाकर ताकझांक कर आते। कभी अस्पताल में राउंड लगाने आए डॉक्टर और नर्स के पीछे पीछे देर तक घूमते रहते। हम दोनों अस्पताल के हर हिस्से की खोजबीन में लगे रहते। इस बीच थोड़ी-थोड़ी देर में वापस आकर अपने दादाजी को देख भी जाता था। अस्पताल के कई स्टाफ हमें पहचानने लगे थे। उन्हें पता था कि हम पेईंग वार्ड के दो मरीजों के तिमारदार हैं।

नन्हीं मिजराब पांचों वक्त नमाज पढ़ती थी। वह मुझसे पूछती, तुम भी कुछ पूजा पाठ करते हो....हां, स्नान के बाद हनुमान चालीसा पढ़ता हूं ना। अस्पताल में हमारा सबसे अच्छा वक्त गुजरता था रोज सुबह मल्लाहों को मछलियां पकड़ने की होड़ लगाते देखना। ये सिलसिला घंटों चलता रहता। हम इस नजारे को देखते हुए उबते नहीं थे।

और एक दिन वह समय आ गया जब मिजराब की मुराद पूरी होने वाली थी। उसके मौसा जी ने एक नाव वाले से बात की और हमने उस विशाल तलैया में नाव पर देर तक सैर की। मिजराब की खुशियों का ठिकाना नहीं था। मानों बरसों पुरानी मुराद पूरी हो गई हो। जलराशि को काटते हुए हौले हौले आगे बढ़ती नाव पर उसकी चहक देखने लायक थी। 

दस दिन पूरे हो गए मेरे दादा जी के वह घड़ी आ गई, जब हमें घर वापस जाना था। हम सामान समेट रहे थे कि मिजराब आई। तुम जा रहे हो क्या... सच में मैं जाना तो नहीं चाह रहा था। हमें ये अस्पताल उसका आंगन पीछे का तलैया से लगाव हो गया था। पर अस्पताल में भला कोई कितने दिन रहे। मिजराब बोली – मेरी दादी को तो अभी दो दिन और रहना पड़ेगा। पर तुम चले जाओगे तो मेरा दिल कैसे लगेगा। मिजराब रुआंसी हो गई। मैं चल पड़ा दादा जी के साथ। एक बार पीछे मुड़कर देखा तो मिजराब वहीं खड़ी थी।

अगली सुबह हुई होगी। फिर तलैया में मछुआरे अपनी नाव लेकर आए होंगे। मछलियां पकड़ने की होड़ भी लगी होगी पर उन्हें निहारने वाले दो नन्हें मुन्ने दिल वहां नहीं रहे होंगे। मिजराब...मिजराब...मिजराब तुम किस देस में हो... ( इस कहानी   के पात्र, घटनाएं और घटना स्थल सभी सच्चे हैं, कल्पना से कोई संबंध नहीं ) 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUZAFFARPUR EYE HOSPITAL, MIJRAB KHATUN ) 

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