Wednesday, September 16, 2020

और बन गई हमारी बंदूक

बचपन में गुलेल बहुत से लोगों ने चलाई होगी। कई लोग पछियों का शिकार करने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। पर हमारे मिस्त्री जी ने गुलेल से आगे बढ़कर हमारे लिए एक बंदूक बना दी थी।

गुलेल के लिए अंगरेजी के अक्षर वाई के आकार के एक लकड़ी की जरूरत होती है। इसमें रबर बांधते हैं। रबर के बीच में चमड़े का एक टुकड़ा लगा होता जिसमें गोली रखकर गुलेल को फायर कर दिया जाता है। अगर निशाना ठीक बैठा तो पक्षी मर भी जाते हैं।

पर हमारे घर आते महाराज मिस्त्री। वे वैसे तो हमारे हल, हेंगा और दूसरे कृषि उपकरण को ठीक करने के लिए आते थे। पर वे आर्डर पर कुरसी, चौकी आदि भी बनाते थे। लकड़ी  के दूसरे उपकरणों की मरम्मत भी करते थे। पर महाराज मिस्त्री छोटे मोटे इंजीनियर ही नहीं अन्वेषक भी थे। उन्होंने गुलेल का विकास कर हमारे लिए बंदूक बना डाली। वैसे बंदूक बनाने का आडिया दादाजी ने दिया था। उसपर महाराज मिस्त्री ने शोध किया। 

फिर तीन फीट की लकड़ी को खूब चिकना किया। उसके साथ ढाई फीट की एक लकड़ी लगाई। इसमें चार लकड़ी के ज्वाएंट लगाए। अब एक लकड़ी की लंबी कांटी में गुलेल का फीता चढ़ा दिया जाता। इसमें मिट्टी की गोली रखी जाती। निशाना लगाकर बंदूक का घोडा दबाने पर गोली फायर हो जाती थी। निशाना सही लगने पर काम तमाम। अब वह बंदूक हमारे पास नहीं है। उसकी कोई तस्वीर भी हमारे पास नहीं है। अगर होती तो आज मैं उसका लाइसेंस पेटेंट करा लेता। यह लोकल पर वोकल होता। यह स्वदेशी नवोन्मेष में गिना जाता। पर अब उसके निर्माता महाराज मिस्त्री भी इस दुनिया में नहीं है। इसलिए अब वैसी बंदूक नहीं बन सकती।

खैर उस बंदूक को पाकर हम इतरा रहे थे। मैं और मेरे गांव में कुछ महीने साथ रहे अरविंद भैया उस बंदूक को लेकर हम पक्के शिकार बन गए थे। खेत और बगीचे में बंदूक लेकर कुलांच भरते। गांव के दूसरे बच्चे हमसे डरने लगे थे। हम बंदूक से पक्षियों का शिकार करते। वैसे बंदूक का निर्माण एक खास उद्देश्य से हुआ था। यह सब्जी के खेतों और पेड़ों से पक्षियों को भगाने के गुरुतर उद्देश्य को लेकर निर्मित हुआ था। इस काठ के बने महान यंत्र से उद्देश्यों की पूर्ति भी हो रही थी। एक फायर करने के बाद सब्जी के खेतों से छोटे मोटे जानवर फरार हो जाते। पेड़ पर फायर करने के बाद तो कोहराम ही मच जाता था। सारे पक्षी एक साथ झुंड में उड़ जाया करते थे।

गांव होने वाले शादी समारोह में भी हम अपनी बंदूक साथ लेकर जाते थे। बड़े बुजुर्ग लोगों के पास असली बंदूक होती थी तो हमारे पास अपनी लकड़ी की बंदूक। पर यह किसी असली से कम थोड़े ही न थी। और हमारे पास स्वनिर्मित गोलियों का बड़ा जखीरा होता था। अगर में उस बंदूक के साथ लंबे समय तक गांव में रह जाता तो शायद पक्का शिकार बन जाता। बाद में लोहे की बंदूक की मांग करने लगता। सो एक तरह से यह अच्छा ही हुआ। वरना पत्रकार बनने की जगह कहीं पुलिस या फौज में चला गया होता।
-         = विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-         ( SOHWALIA DAYS 32, WOOD MADE GUN, GULEL, MAHARAJ MISTRY, CARPAINTER  )

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