Wednesday, September 2, 2020

गणतंत्र दिवस और बसहीं का मेला


गांव के बच्चों को मेले का खूब इंतजार रहता है। मेला मतलब किसिम किसिम की दुकानें। खाने की पीने की चीजें और कुछ खिलौने लेकर लौटना। हमारे गांव सोहवलिया के पास बसहीं में मेला लगता है। ये मेला हर साल 26 जनवरी को शुरू होता है। मेला छह दिनों तक चलता है। यानी 31 जनवरी को खत्म होता है। 26 जनवरी को ही क्यों। यह मेला जरूर आजादी के तुरंत बाद लगना शुरू हुआ था। देश को 1950 में गणतंत्र घोषित किए जाने के बाद इस मेले की शुरुआत हुई थी। यानी छह दशक से ये मेला लग रहा है।

कुदरा से परसथुआ मार्ग पर कुदरा नदी और सोन नहर के बीच में स्थित मैदान में बसही का मेला लगता है। वैसे बसहीं गांव का असली नाम बसावन है। पर इसे आसपास के लोग बसहीं क्यों कहते हैं मुझे नहीं पता। सिर्फ मेरे गांव से ही नहीं बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों से बच्चे, बूढ़े जवान और महिलाएं बसहीं के मेले में जाते थे। वसंत के मौसम में महिलाएं पीली पीली साड़ी में अपने बच्चों संग झूमते हुए मेले के लिए प्रस्थान करती थीं। रास्ते में लोग पूछतते- कहां जा ताड़ बसही, का लेके अइब... असहीं।

पर मेले से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। बच्चे मिट्टी के खिलौने, दौड़ने पर घूमने वाली कागज की चरखी या गुब्बारे लेकर मेले से लौटते थे। मेरे पिताजी बताते हैं कि वे एक बार अपने बचपन में बसहीं के मेले में गए। साथ में उनकी दो छोटी बहनें थीं। उन्होंने जिद करके गुब्बारे खरीदे। पर घर आते समय रास्ते में रेगनी के कांटों में फंसकर सारे गुब्बारे फूट गए।
ऐसा बाइस्कोप भी आता था मेले में 

मेरे गांव सोहवलिया से बसहीं कोई तीन से चार किलोमीटर होगा। हमलोग खेतों से होकर तिरछा रास्ता अपनाते हुए लगभग एक घंटे में बसहीं पहुंच जाते थे। मेले में पहुंचने पर मेरा पहला लक्ष्य होता था घोड़े वाले झूले पर सवारी करना।
छुटपन में मैं हर साल दादा जी के साथ बसही के मेले में जाता था। बसही के मेले के सबसे प्रसिद्ध मिठाई हुआ करती है लकठो। लकठो गुड़ से बनी मिठाई है। कुछ कुछ गुड़ पाड़ा जैसी। यह मिठाई मुगलकाल से बन रही है। हमारे भोजपुरी इलाके की सबसे पुरानी मिठाई। वैसे दूसरी लोकप्रिय मिठाई होती थी बिलग्रामी।
बसही में सोन नहर का पुल। 

गांव छोड़ने के बाद कई साल बाद बनारस में पढाई करते हुए गांव जाना हुआ तो एक बार फिर बसही मेले का समय था। तो मैं पहुंच गया मेले में। पर इस बार मेला काफी बदला हुआ था। अब नई उम्र के बच्चों में फिल्में देखने का क्रेज था। तो मेले में वीडियो सिनेमा चलाए जा रहे थे। दो रुपये के टिकट में लोग रंगीन टीवी और वीसीपी के सहारे नई नई फिल्में देख रहे थे।

धान की फसल कट जाने के बाद आसपास के गांव के किसानों के पास कुछ दिन फुरसत के होते हैं। इसी दौरान लगता है ये मेला। बसही के मेले से आसपास के गांव के लोग सिलवट और लोढ़ा खरीदकर ले जाते थे। कई तरह के सामानों के लिए हमारे घर के लोग बसही के मेले का इंतजार किया करते थे।खास तौर पर लकड़ी के सामान। 

बसही का मेला आज भी लगता है। इस मेले की कुछ और रिवायते हैं। मेेले के दौरान कुदरा नदी के किनारे बिरहा मुकाबला भी होता है। मेले में हाथियों और घोड़ों का प्रदर्शन होता है। मेले में घुड़दौड़ और हाथियों की दौड़ का भी आयोजन होता है। मेले का का प्रमुख आकर्षण होते हैं कानडिहरा गांव के बाबू साहब के हाथी। महावत उन्हे मेले के लिए खास तौर पर तैयार करके ले जाते हैं। स्थानीय अखबारो में बसही के मेले की खबरें प्रकाशित होती हैं। कई दशक गुजर गए। बसही का मेला नहीं देखा। पर स्मृतियों में मेले में बिक रहे तिलकुट और रेवड़ियों की दुकानें आज भी बसी हुई हैं।
-   ---  विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com  
(  ( SOHWALIA DAYS 25, BASAHI KA MELA, KAIMUR, KUDRA, ROHTAS, BIHAR ) 



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