Wednesday, September 30, 2020

बाहुबली की अनुकृति देखिए बड़ागांव में


बड़ागांव के त्रिलोकतीर्थ धाम में कुल 3770 जैन मूर्तियां स्थापित की गई है। मंदिर अपनी भव्यता में श्रद्धालुओं को चकाचौंध कर देता है। पर बड़ागांव में त्रिलोकतीर्थ के अलावा कई और जैन मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। बड़ागांव का दूसरा प्रमुख मंदिर है श्री 1008 भगवान आदिनाथ भगवान मनोज्ञ्य चैत्यालय। यह मंदिर त्रिलोकतीर्थ के पास ही स्थित है।

हरे भरे खेतों का पास बने इस मंदिर में दक्षिण भारत के श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की प्रतिमा की अनुकृति भी निर्मित की गई है। मंदिर के छत पर बनी बाहुबली की यह प्रतिमा दूर से ही नजर आती है। यह बाहुबली की मूल प्रतिमा से काफी मिलती जुलती है। जो श्रद्धालु कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नहीं जा सकते हैं। वे यहां पर आकर इस प्रतिमा की अनुकृति देख सकते हैं।

साधुओं के निवास के बाद अंदर जाने पर हरित परिसर में छोटा सा मंदिर स्थित है। इस मंदिर में आदिनाथ भगवान की प्रतिमा है। दिगंबर जैन श्रद्धालुओं के बीच ये मंदिर भी काफी लोकप्रिय है। मंदिर में साधुओं के लिए भोजनालय संचालित होता है। यहां रहने वालों के लिए जैन आचार व्यवहार का पालन करना आवश्यक है। मंदिर के परिसर में दीवारों पर अच्छी अच्छी प्रेरक सूक्तियां लिखी गई हैं।

इस मंदिर के साथ ही जैन साधुवृति आश्रम भी बना हुआ है। इस आश्रम में जैन साधु और साध्वियां निवास करती हैं। त्रिलोकतीर्थ के परिसर में गुरु समाधि मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। इस मंदिर के लिए देश भर के जैन श्रद्धालु दान दे रहे हैं। इन जैन मंदिरों के कारण दिल्ली के पास का एक प्राचीन गांव आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है।

स्यादवाद जैन एकेडमी – त्रिलोक तीर्थ के सामने ही बच्चों का स्कूल है। जैन ट्रस्ट द्वारा संचालित स्कूल में स्थानीय बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां पर कुछ दुकाने हैं जहां पर आप खाने पीने की कुछ चीजें और हैंडलूम के कपड़े आदि खरीद सकते हैं। यहां कई दुकानों में पापड़ बड़ियां आदि मिलती हैं।

कैसे पहुंचे -  दिल्ली से बड़ागांव जाने के लिए आपको वजीराबाद रोड पर आना होगा। भोपुरा चौक से लोनी जाने वाली सड़क पर चलें। वहां से कोई पांच किलोमीटर चलने के बाद बंथला से दाहिने मुड़ना है। फ्लाईओवर के नीचे से रास्ता जा रहा है जिसे बंथला ढिकोली मार्ग कहते हैं। सड़क काफी अच्छे हाल में है। इस मार्ग पर चिरोडी के बाद गाजियाबाद जिले की सीमा समाप्त हो जाती है। 


बागपत जिले का पहला गांव आता है भगौट इसके बाद धौली प्याउ चौकी आती है। इसके बाद रटौल गांव को पार करने के बाद ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे को सड़क नीचे से पार करती है। यहीं पर एक बायीं तरफ का मोड़ आता है। इस मोड से बड़ागांव जैन मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। बड़ागांव की लोकेशन  ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे से पूर्वी तरफ है। यह बागपत जिले के खेकड़ा शहर के भी काफी करीब है। बड़ागांव से खेकड़ा की दूरी पांच किलोमीटर है। यहां पहुंचने के लिए खेकड़ा निकटतम रेलवे स्टेशन हो सकता है जिसकी दूरी कुल छह किलोमीटर है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( BADAGAON, RAVAN, BAHUBALI SATUE , ADINATH JAIN TEMPLE )

Monday, September 28, 2020

17 मंजिलों का विशाल जैन मंदिर - त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव


देश के प्रमुख जैन तीर्थ स्थलों में शुमार है उत्तर प्रदेश के बागपत जिले का बड़ागांव। यहां पर तीन जैन मंदिर हैं। बड़ागांव की दूरी दिल्ली के महज 35 किलोमीटर है। पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डन से तो बड़ागांव की दूरी सिर्फ 25 किलोमीटर है।

बड़ागांव का सबसे प्रमुख आकर्षण है त्रिलोकतीर्थ धाम। ये अद्भुत कलात्मक मंदिर है। अपनी विशालता और कलात्मकता के कारण यह देश के अनूठे मंदिरों में शुमार हो गया है। इसकी वास्तुकला अद्भुत है।

यह दिगंबर जैन मुनि श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज की प्रेरणा से निर्मित हुआ है। फरवरी 2015 में इस विशाल मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की गई। 17 से 25 फरवरी के मध्य पंच कल्याणक उत्सव के बाद इस मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। इस मंदिर का इंतजाम श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन स्याद्वाद ट्रस्ट देखता है। इसका प्रबंधन त्रिलोकचंद जैन देखते हैं।

317 फीट ऊंचा विशाल मंदिर – त्रिलोक तीर्थ 17 मंजिलों वाला विशाल मंदिर है। यह बड़ा गांव से कई किलोमीटर पहले से आपकी नजरों में होता है। मंदिर की ऊंचाई 314 फीट है। इसमें 100 फीट जमीन के नीचे है तो 217 फीट जमीन के ऊपर है। मंदिर कुल 80 स्तंभों पर खड़ा है। इसकी 17वीं मंजिल तक जाने के लिए दो लिफ्ट लगाई गई है। मंदिर का परिसर 56  हजार वर्ग गज में फैला हुआ है।

मंदिर के आधारतल पर मूल नायक श्री 1008 पार्श्वनाथ भगवान जी का मंदिर है। इसी तल पर मुनिसव्रतनाथ जी का मंदिर, नेमिनाथ भगवान जी का मंदिर और सहसत्रकूट जिनालय बना हुआ है। पर मंदिर आधार तल के काफी ऊपर तक भी है। देश में इतना विशाल 17 मंजिलों वाला मंदिर शायद ही कोई हो। 

पहली मंजिल पर विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज की मोम से बनी प्रतिमा विराजमान है। यहां नंदीश्वर द्वीप मंदिर है जिसमें कुल 52 चैत्यालय हैं। इसी मंजिल पर पंचमेरू मंदिर और 32 शाश्वत जिनालय बने हैं।

दूसरी मंजिल पर ढाईद्वीप के 170 जिनालय निर्मित किए गए हैं। तीसरी मंजिल पर समोशरण और वर्तमान चौबीसी विराजमान है। यहां चार गुंबदों में त्रिकाल चौबीसी की 72 प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं।

चौथी मंजिल से 14वीं मंजिल तक शाश्वत जिनालय का निर्माण किया गया है। यहां पर रोबोटिक विधि से मध्य लोक स्वर्ग लोक और नरकलोक का निर्माण किया जा रहा है। इसलिए इस मंदिर का नाम त्रिलोक तीर्थ दिया गया है। मंदिर के निर्माण में देश भर से निपुण कारीगरों की सेवाएं ली गई हैं।

सबसे ऊपर आदिनाथ की प्रतिमा - त्रिलोक तीर्थ के सबसे ऊपर वाली मंजिल पर पद्मासन में आदिनाथ की 31 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा अष्टधातु से निर्मित है।  

लाइट एंड साउंड शो – साल 2019 में त्रिलोकतीर्थ का एक और आकर्षण बढ़ गया। यहां पर नवंबर 2019 में लाइट एंड साउंड शो की शुरुआत की गई है। इसके लिए 50 रुपये का टिकट निर्धारित किया गया है। यह लाइट एंड साउंड शो हर शनिवार और रविवार को होता है। बच्चों के मनोरंजन के लिए यहां कई किस्म के झूले भी लगाए गए हैं।

मंदिर की गौशाला – त्रिलोकतीर्थ धाम द्वारा गौशाला का भी संचालन किया जाता है। मंदिर परिसर में अतिथि गृह भी बना हुआ है। खास तौर पर शनिवार और रविवार को दिन मंदिर में काफी रौनक रहती है। इस दिन दिल्ली और आसपास से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
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       विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
 ( JAIN TEMPLE, TRILOK TIRTH, BADAGAON, BAGPAT ) 
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Saturday, September 26, 2020

मिजराब...तुम किस देस में हो...

उसका नाम मिजराब था। बहुत बाद में मैंने जाना का मिजराब का मतलब सितार बजाने वाला छल्ला होता है। तो उसकी आवाज सितार की तरह ही मीठी थी। बिलकुल खनकती हुई। क्या कहा, उससे मेरी मुलाकात कहां हुई थी। अस्पताल में। जी हां अस्पताल में।

मुजफ्फरपुर आई हॉस्पीटल। वहां मेरे दादा जी भर्ती थे। सन 81 का साल था। तब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ता था। दादा जी की आंखों में मोतियाबिंद हो गया था। तो तय हुआ कि उनकी आंखों का आपरेशन करवा दिया जाए। तो उत्तर बिहार के सबसे नामचीन आंखों के अस्पताल में उनका आपरेशन हुआ। उन्हें अस्पताल में दस दिन रहना था। जिस दिन आपरेशन हुआ। हमारे चाचा रामनारायण सिंह दोपहर बाद अस्पताल से घर लौटे।

मैं दोपहर में थोड़ी देर के लिए सो गया था। सपने में देखा कि दादाजी के आंखों का ऑपरेशन सफल हो गया। पर अभी अस्पताल में लंबा वक्त गुजारना है तो मुझे उनकी सेवा सुश्रुषा के लिए बुलाया गया है। अस्पताल से रामनारायण चाचा लौटे तो उन्होंने कहा, पिता जी ने विकास को बुलाया है कल सुबह चलना है अस्पताल में। वहां दादा जी की देखभाल के लिए जरूरत है। तो मेरा दिन का सपना सच हो गया।

अगले दिन सुबह सुबह मैं चाचा के साथ मुजफ्फरपुर आई हास्पीटल के विशाल प्रांगण में पहुंचा। दादा जी पेइंग वार्ड में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। अभी अगले आठ दिन उन्हें यहीं रहना था। उनके आंखो पर पट्टी बंधी थी। दादा जी देख नहीं पाए पर वे मेरी आवाज सुनकर खुश हुए। दादाजी के कमरे में एक सहायक के लिए बिस्तर था जहां मैं रात को सो जाता था।

अगले दिन दादा जी के कमरे के बगल वाले कमरे में बुजुर्ग महिला मरीज का आगमन हुआ। उनका भी एक दिन बाद मोतियाबिंद का आपरेशन होना था। उनके साथ तीन चार महिलाएं थीं और एक मेरी हम उम्र लड़की। शाम ढल रही थी कि वह लड़की हमारे कमरे में आई और पूछा- यहां कहीं कछुआ छाप अगरबत्ती मिलेगी। यहां मच्छर बहुत हैं। मैंने कहा, शायद अस्पताल के स्वागत कक्ष वाले स्टोर पर मिल जाए। वह तपाक से बोली तुम चलो मेरे साथ लेकर आएंगे। नाम क्या है तुम्हारा – विकास और तुम्हारा – मिजराब

कौन सी क्लास में पढते हो – पांचवी में और तुम - मैं छठी में। मैंने पूछा, स्कूल कहां है तुम्हारा – चैपमैन गर्ल्स स्कूल। फिर मिजराब खुद बताने लगी – मुजफ्फरपुर में नीम चौक के पास सातपुरा में घर है हमारा। हम अपनी दादी अम्मा के आंखों का आपरेशन कराने आए हैं। साथ में मेरी अम्मी जान और खाला हैं।

अगली सुबह। हमारे पेईंग वार्ड के विशाल बरामदे के पार्श्व में जूरन छपरा का विशाल तालाब है। इस तलाब में मछुआरे ढेर सारी नावें लेकर मछली मारने निकल पड़े हैं। ऐसा लग रहा है मानो होड़ सी लगी है इन मछुआरों में मछलियां पकड़ने की। उगते सूरज के साथ मछलियां  पकड़ने के इस कारोबार को मैं और मिजराब अस्पताल की बॉलकोनी से देखकर खुश हो रहे हैं। वह बोल पड़ती है- नाव पर घूमना कितना अच्छा लगता है ना। दोपहर बाद मेरे मौसा आएंगे तो हम उनसे बात कर एक नाव किराये पर लेंगे और इस तालाब में तमाम घूमेंगे। तुम भी चलना मेरे साथ खूब मजा आएगा।

उसके बाद अगले कुछ दिन अस्पताल में अल सुबह से लेकर देर रात तक मेरा और मिजराब का साथ रहता। मैं दादाजी की सेवा फारिग होता। मिजराब मुझे बुलाकर अपने साथ ले जाती। कभी अस्पताल के विशाल आंगन में। कभी ऑपरेशन थियेटर की ओर। तो कभी रिसेप्शन की ओर। कभी हम जनरल वार्ड में भी जाकर ताकझांक कर आते। कभी अस्पताल में राउंड लगाने आए डॉक्टर और नर्स के पीछे पीछे देर तक घूमते रहते। हम दोनों अस्पताल के हर हिस्से की खोजबीन में लगे रहते। इस बीच थोड़ी-थोड़ी देर में वापस आकर अपने दादाजी को देख भी जाता था। अस्पताल के कई स्टाफ हमें पहचानने लगे थे। उन्हें पता था कि हम पेईंग वार्ड के दो मरीजों के तिमारदार हैं।

नन्हीं मिजराब पांचों वक्त नमाज पढ़ती थी। वह मुझसे पूछती, तुम भी कुछ पूजा पाठ करते हो....हां, स्नान के बाद हनुमान चालीसा पढ़ता हूं ना। अस्पताल में हमारा सबसे अच्छा वक्त गुजरता था रोज सुबह मल्लाहों को मछलियां पकड़ने की होड़ लगाते देखना। ये सिलसिला घंटों चलता रहता। हम इस नजारे को देखते हुए उबते नहीं थे।

और एक दिन वह समय आ गया जब मिजराब की मुराद पूरी होने वाली थी। उसके मौसा जी ने एक नाव वाले से बात की और हमने उस विशाल तलैया में नाव पर देर तक सैर की। मिजराब की खुशियों का ठिकाना नहीं था। मानों बरसों पुरानी मुराद पूरी हो गई हो। जलराशि को काटते हुए हौले हौले आगे बढ़ती नाव पर उसकी चहक देखने लायक थी। 

दस दिन पूरे हो गए मेरे दादा जी के वह घड़ी आ गई, जब हमें घर वापस जाना था। हम सामान समेट रहे थे कि मिजराब आई। तुम जा रहे हो क्या... सच में मैं जाना तो नहीं चाह रहा था। हमें ये अस्पताल उसका आंगन पीछे का तलैया से लगाव हो गया था। पर अस्पताल में भला कोई कितने दिन रहे। मिजराब बोली – मेरी दादी को तो अभी दो दिन और रहना पड़ेगा। पर तुम चले जाओगे तो मेरा दिल कैसे लगेगा। मिजराब रुआंसी हो गई। मैं चल पड़ा दादा जी के साथ। एक बार पीछे मुड़कर देखा तो मिजराब वहीं खड़ी थी।

अगली सुबह हुई होगी। फिर तलैया में मछुआरे अपनी नाव लेकर आए होंगे। मछलियां पकड़ने की होड़ भी लगी होगी पर उन्हें निहारने वाले दो नन्हें मुन्ने दिल वहां नहीं रहे होंगे। मिजराब...मिजराब...मिजराब तुम किस देस में हो... ( इस कहानी   के पात्र, घटनाएं और घटना स्थल सभी सच्चे हैं, कल्पना से कोई संबंध नहीं ) 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUZAFFARPUR EYE HOSPITAL, MIJRAB KHATUN ) 

Thursday, September 24, 2020

देश के सुंदर प्रदेश लक्षद्वीप पर एक जरूरी किताब

हम हिंदुस्तान की तस्वीर को भारत माता के रूप में देखें तो इसमें अंदमान निकोबार और लक्षद्वीप जैसे देश भारत माता के श्रंगार में पहने जाने वाले गहने हैं जो मां के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते हैं। अंदमान आप कोलकाता, विशाखापत्तनम या चेन्नई से पहुंच सकते हैं तो लक्षद्वीप जाने के लिए केरल के कोच्चि शहर से या फिर कर्नाटक से मंगलुरू से जहाज चलते हैं।

देश के सारे प्रदेशों में कदम रख चुका हूं। सिर्फ लक्षद्वीप बचा है। नेशनल बुक ट्रस्ट के स्टॉल पर किताबें देखते हुए मेरी नजर लक्षद्वीप पर लिखी एक अंग्रेजी पुस्तक पर पड़ी। कुल 60 रुपये की ये किताब मुझे बुक क्लब का मेंबर होने के कारण 20 फीसदी छूट के बाद 48 रुपये की पड़ी। पुस्तक कई कई सालों तक मेरे अलमारी में पड़ी रही। लॉकडाउन के दौरान इसे पढ़ने का मौका मिला। पहले बात इस पुस्तक के लेखक के बारे में। इसे लिखा है अवकाश प्राप्त आईएएस उमेश सहगल ने।

उमेश सहगल, पुस्तक के लेखक, लक्षद्वीप के पू्र्व प्रशासक। 
उमेश सहगल का नाम देखकर चौंका। मुझे 1998-99 के अपने कुबेर टाइम्स के रिपोर्टिंग के दिन याद आ गए। उमेश सहगल आईएएस होने के साथ टीवी प्रोडक्शन में हाथ आजमाते रहे हैं। उन्होंने दूरदर्शन पर एक धारावाहिक बनाया था ग्राहक दोस्त। उसकी प्रेस कान्फ्रेंस में होटल कनॉट में उनसे लंबी बात हुई थी। तब हमारे संपादक ओम गुप्ता भी उनके साथ थे।

उमेश सहगल की कंपनी हुआ करती थी कामिनी प्रोडक्शन्स जो उनकी पत्नी कामिनी सहगल के नाम थी। उनके बेटे योगेश सहगल इस कंपनी का कामकाज देखते थे। उमेश सहगल बाद में दिल्ली के मुख्य सचिव होकर रिटायर हुए। पर इस लक्षद्वीप पर लिखी उनकी 220 पृष्ठों की किताब देखकर मालूम हुआ कि वे 1982 से 1985 तक तीन साल तक केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप के प्रशासक रहे। अगर आप किसी राज्य में घूमने की आकंक्षा रखते हैं तो बेहतर है कि उस राज्य के बारे में पहले से थोड़ा जान लें। तो इस लिहाज से यह काफी अच्छी किताब है।

किताब की शुरुआत संस्मरण की शैली में होती है। उमेश सहगल जुलाई 1982 में कोचीन में लक्षद्वीप हाउस में पहुंचने से शुरुआत करते हैं। पर पुस्तक आगे लक्षद्वीप के बारे में हर पहलू पर प्रकाश डालती है। यहां पहली बार ग्यारहवीं सदी में इंसान के कदम पड़ना। इसके बाद अलग अलग चरणों में वहां सभ्यता संस्कृति का विकास।

लक्षद्वीप की राजधानी कवरत्ति है। यह प्रदेश 36 छोटे बड़े द्वीपों का समूह है। अपने तीन साल के प्रवास में उमेश सहगल ने लक्षद्वीप को खूब जानने समझने की कोशिश की। उन्होंने वहां कई डाक्यूमेंटरी भी बनाई। पूरा लक्षद्वीप मुस्लिम बहुल है। पीएम सईद कांग्रेस पार्टी से यहां से 11 बार सांसद रहे। बाद में लोकसभा के उपाध्यक्ष भी बने। उमेश सहगल पीएम सईद के परिवार से अपने आत्मीय रिश्तों का भी जिक्र करते हैं।
(लक्षद्वीप का कालपेनि द्वीप - सौ - लक्षद्वीप टूरिज्म ) 

पुस्तक राज्य के इतिहास, भूगोल, द्वीप की प्राकृतिक संपदा, लोगों के रहन सहन, सामाजिक ताना बाना आदि पर बड़ी सूक्ष्मता से प्रकाश डालती है। इसका पहला संस्करण 1990 में आया था। दूसरा संशोधित संस्करण सन 2000 में आया। इंडिया द लैंड एंड द पीपुल श्रंखला के तहत नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित एक राज्य से परिचित कराती ये पुस्तक एक रेफरेंस बुक की तरह है। आपको पता है मलयालम और संस्कृत में लक्षद्वीप का मतलब क्या है। मतलब है एक लाख द्वीप। लक्षद्वीप के बारे में और जानने के लिए प्रदेश की सरकारी वेबसाइट पर जाएं। अगर आप इस प्यारे से प्रदेश में घूमने फिरने के बारे में जाना चाहते हैं तो इसके लिए लक्षद्वीप पर्यटन की वेबसाइट पर जाएं। 

-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         ( LAKSHADWEEP, INDIA THE LAND AND THE PEOPLE, OMESH SAIGAL )  
(लक्षद्वीप का कालपेनि द्वीप - सौ - लक्षद्वीप टूरिज्म ) 

Tuesday, September 22, 2020

पलाश के फूलों संग ऊर्जांचल में रेल से गुजरते हुए


अपनी मामी के गांव महुआवं में रहते हुए अगले दिन हमने तय किया कि हमलोग रेलगाड़ी से शक्तिनगर जाएंगे। अशोक भाई ने बताया कि हमलोग रॉबर्ट्सगंज रेलवे स्टेशन से ट्रेन लेंगे। रॉबर्ट्सगंज शहर का नाम अंग्रेज अफसर फ्रेड्रिक रॉबर्ट के नाम पर पड़ा है। इसी नाम से रेलवे स्टेशन का भी नाम राबर्ट्सगंज पड़ गया। कभी यह मिर्जापुर जिले का हिस्सा हुआ करता था। पर अब स्वतंत्र जिला है। यह प्रदेश का एक मात्र ऐसा जिला है जिसकी सीमाएं चार राज्यों को स्पर्श करती हैं। जी हां, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश। पर सन 2020 में राबर्ट्सगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर सोनभद्र कर दिया गया है। इसका स्टेशन कोड हो गया है एसबीडीआर।

वाराणसी से चुनार होकर ट्रेन राबर्ट्सगंज पहुंचती है। यहां हमलोग शक्तिनगर की ओर जाने वाली ट्रेन मे सवार हुए। ये पैसेंजर ट्रेन है जो सभी स्टेशनों पर रुकती हुई जाएगी।  अगला स्टेशन आया चुर्क। चुर्क में सीमेंट फैक्टरी है। सोनभद्र जिला जंगल और पर्वतों से आच्छादित है। भौगोलिक क्षेत्र की बात करें तो यह लखीमपुर खीरी के बाद यूपी का सबसे बड़ा जिला है।  इसके बाद का स्टेशन है अगोरी खास । हमारी ट्रेन अब चोपन पर पहुंच गई है। चोपन सोनभद्र जिले का बड़ा शहर है। पर चोपन के बाद छह किलोमीटर ही चलने पर एक और स्टेशन आया बिल्ली जंक्शन।


जी हां स्टेशन का नाम है बिल्ली। नाम सुनकर हंसी आती है। पर भारतीय रेलवे में कई ऐसे स्टेशनों के नाम बड़े रोचक हैं।  बिल्ली जंक्शन है, क्योंकि यहां से एक लाइन रेनुकूट होते  हुए झारखंड के डाल्टेनगंज की तरफ चली जाती है। बिल्ली जंक्शन का स्टेशन कोड है बीएक्सएलएल। सन 1994 में एक बार फिर मैं बनारस से बिल्ली जंक्शन होता हुआ रेनुकूट पहुंचा था सदभावना रेल यात्रा के संग। बिल्ली जंक्शन नाम सुनकर मुझे हंसी आई तो अशोक भाई ने कहा, आगे और कुछ स्टेशनों के नाम बड़े रोचक मिलने वाले हैं। पर उन्होंने नामों का खुलासा नहीं किया, ताकि मेरा कौतूहल बना रहे।

ओबरा थर्मल पावर स्टेशन - पर अभी हम शक्तिनगर की ओर जा रहे हैं तो अगला स्टेशन है ओबरा डैम। यहां पर ओबरा थर्मल पावर स्टेशन है। यहां रेणुका नदी पर बांध बनाकर ओबरा थर्मल पावर स्टेशन का निर्माण किया गया है। यह उत्तर प्रदेश सरकार का अधीन आता है। ओबरा एक औद्योगिक शहर है। यहां पावर प्लांट के अलावा सीमेंट फैक्टरी भी है। इसके बाद हमारी ट्रेन फाफराकुंड, मगरदहा, खुलदिल रोड से आगे बढ़ती हुई एक और स्टेशन पर रुकी। इस स्टेशन का नाम है मिर्चा धूरी। जी हां बिल्ली के बाद मिर्चा नामक स्टेशन। 

मिर्चा और करैला रेलवे स्टेशन - ये पूरा सफर बड़ा ही मनोरम है। रेल की खिड़की से बाहर देखते हुए बड़ा आनंद आ रहा है। रेल पटरियों के दोनों तरफ हरे भरे जंगल दिखाई दे रहे हैं, जिनमें पलाश के पेड़ों पर लाल फूल खिले हुए हैं। ये पलाश बड़े ही आकर्षक लग रहे हैं। तो लिजिए मिर्चा के बाद आठ किलोमीटर चलने पर आ गई एक और सब्जी करैला। जी हां स्टेशन का नाम है करैला रोड।  



करैला रोड जंक्शन से अब एक लाइन सिंगरौली होकर कटनी चली जाती है। जब हम सफर कर रहे थे तब यह लाइन नहीं बनी थी। पर अब करैला जंक्शन बन चुका है। करैला से 11 किलोमीटर के सफर के बाद हमलोग पहुंच चुके हैं अनपरा। अनपरा में भी विशाल थर्मल पावर स्टेशन है। यह रिहंद नदी पर जलाशय का निर्माण करके बनाया गया है। ओबरा, अनपरा, शक्तिनगर के कारण ही इस क्षेत्र को ऊर्जांचल कहते हैं। इस क्षेत्र में कोयले का भी प्रचूर मात्रा में उत्पादन होता है। यहां से बनने वाली बिजली काफी दूर तक जाती है। अकेले अनपरा की क्षमता 2630 मेगावाट बिजली उत्पादन की है।

अगला स्टेशन है कृष्णशिला। इसके बाद हमलोग पहुंच गए हैं शक्तिनगर टर्मिनल। यह आखिरी रेलवे स्टेशन है। यहां उतर कर ऐसा लगा मानो किसी सपनों की नगरी में आ गए हों। शक्तिनगर में एनटीपीसी का थर्मल पावर स्टेशन है। यह देश में एनटीपीसी द्वारा स्थापित पहला पावर प्लांट है। शक्तिनगर में एनटीपीसी की विशाल स्टाफ कालोनी बनी हुई है। यह किसी बड़े सुंदर व्यवस्थित नगर सा नजर आता है। हरे-भरे पार्क, केंद्रीय विद्यालय आदि सब कुछ यहां पर है। शाम हो गई तो तो शक्तिनगर में ही हमलोग अशोक भाई के एक मामाजी के घर जाकर रुके। उनके बेटे का नाम योगेंद्र है। उन लोगों ने हमारा बड़ा आत्मीय स्वागत किया। 

अगले दिन शक्तिनगर से हमलोग अमलोरी के लिए चले। शक्तिनगर उत्तर प्रदेश में है पर अमलोरी कोल फील्ड मध्य प्रदेश में। यह एनसीएल की खुली हुई कोयले की खान है। कोयले की कुछ खाने बंद यानी भूमिगत होती हैं।
इसके आसपास जयंत, बीना, निगाही जैसी और कई कोयले की खान हैं। अमलोरी में काशीनाथ भैया के से मुलाकात तो हुई ही यहां पर हमें खुली हुई कोयले की खान देखने का भी मौका मिला। तो ये यात्रा बड़ी सार्थक रही। हमारी वापसी भी इसी रेल मार्ग से हुई। वापसी में ट्रेन से सीधा बनारस चला आया जबकि अशोक सोनभद्र में ही उतर गए।
-     --    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(( SONBHADRA, CHOPAN, BILLI JN, MIRCHA DHURA, OBRA, ANPRA, SHAKTINAGAR, AMLORI ) 

Sunday, September 20, 2020

सोनभद्र जिले मे मामी जी के गांव में


कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं जो सालों नहीं भूलतीं। ये यात्रा मेरे बनारस में पढ़ाई के दिनों की है। वैसे तो मेरा घर रोहतास जिले में और ननिहाल भोजपुर जिले में हैं। पर मेरे एक तिहाई ननिहाल उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में है। दरअसल मेरे स्वर्गीय मामा लक्ष्मण सिंह जी का परिवार सोनभद्र जिले में राबर्ट्सगंज के पास ग्राम महुआवं में रहता है। इस मामाजी के परिवार से नानी के यहां शादी विवाह समारोहों में ही मिलना होता था। 

बनारस में सन 1990 से 1995 तक पांच साल की पढ़ाई के दौरान मेरी बार बार इच्छा होती लक्ष्मण मामा के परिवार के लोगों से मिलने की। मुझे लक्ष्मण मामा की धुंधली सी याद है। सन 1977 के आसपास की बात होगी। मेरे नाना जी रामगहन सिंह का निधन हो गया था। मैं मां के साथ कुसुम्ही अपने ननिहाल गया था। ननिहाल के दलान पर रहंट चल रहा था। लक्ष्मण मामा के बच्चे अशोक, मनोज, सुमिता दीदी रहंट के पानी में झूम झूम कर नहा रहे थे। मुझे नहाने से डर लगता था बचपन में । तो मैं रहट के पास मचान पर चढ़कर बैठ गया था नहाने से बचने के लिए। तभी लक्ष्मण मामा आए – बोले आओ तुम्हें भी साबुन लगाकर नहला दूं। मैं ना-ना करता रहा पर मेरी एक नहीं चली। इसके कुछ साल बाद लक्ष्मण मामा नहीं रहे। वे बरौनी थर्मल पावर स्टेशन में कार्यरत थे। पक्की सरकारी नौकरी थी। पर एक दिन घर में कपड़े टांगते हुए बिजली का करंट आ जाने से वे चल बसे। परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। कुछ साल बाद मामी ने अपने बच्चों के साथ कुसुम्ही छोड़कर अपने भाई के पास महुआवं जिला सोनभद्र में रहना तय किया। बाद में यहीं पर उन्होंने खेतीबाड़ी की जमीन खरीदकर स्थायी निवास बना लिया।  


एक बार इच्छा हुई राबर्ट्सगंज जाने की। एक सुबह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से निकला। रामनगर में पीपा के पुल से गंगाजी को पार किया। वही रामनगर जहां काशी नरेश का किला है। बचपन में हम एक कविता गाते थे –
रामनगर से राजा आवे,
 श्यामनगर से रानी।
रानी रोटी सेंक रही 
राजा भरते पानी ।
बनारस से चलकर राबर्ट्सगंज की तरफ जाने वाली सारी बसें रामनगर होकर ही जाती हैं। तो मैं रामनगर चौराहे पर था। नानी ने बता रखा था कि महुआवं जाने के लिए राबर्ट्सगंज बाजार से कुछ किलोमीटर पहले तेंदु पुल पर उतर जाना है। मैंने बस कंडक्टर को बता दिया तेंदु पुल तक का टिकट दे दो। नारायणपुर, अहरौरा, मधुपुर के बाद तेंदु पुल पर मैं दोपहर से पहले उतर गया। तेंदु पुल बभनौली गांव के पास है। जैसा कि नानी ने बताया था कि नहर पकड़कर पैदल ही पूरब की तरफ चलना है। तो मैं चलने लगा। लोगों से शांगो गांव के बारे में पूछा। जवाब के बदले सवाल आया – किसके घर जाना है। मैंने बोला विद्यासागर सिंह। तो गांव में हर किसी को आसपास के गांव के लोग भी जानते हैं। और विद्यासागर सिंह तो शांगो गांव ( पोस्ट – तेंदु ) के बड़े किसान हैं। उन्होंने रास्ता बता दिया। मैं दोपहर से पहले विद्यासागर सिंह के घर पहुंच गया। न उनसे मैं पहले कभी मिला था न वे मुझे पहचानते थे। मैंने अपना परिचय दिया कि मैं अशोक के फूफा का बेटा हूं। बनारस में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ता हूं। दरअसल अशोक का गांव महुआवं शांगो से भी थोड़ा आगे है। तो मां ने कहा था कि अगर जाना हो तो पहले शांगो विद्यासागर सिंह के यहां चले जाना वे लोग तुम्हें मामी के पास पहुंचा देंगे। तो श्री विद्यासागर सिंह मेरे मामा के साले हैं तो मेरे भी मामा हुए। मेरा परिचय जानकर वे प्रसन्न हुए। घर में मेरा स्वागत सत्कार हुआ।



दोपहर का खाना जिसमें चावल, दाल सब्जी के साथ घर की बनी शानदार दही थी, खाकर मैं तृप्त हो गया। मामा ने बताया कि थोड़ी देर में अशोक यहीं आने वाले हैं। तो आप आराम किजिए। मामा जी का घर दो मंजिला है। मैं छत पर एक कमरे में सो गया। शाम को नींद खुली तो अशोक आ चुके थे। उनके साथ हमलोग चल पड़े महुआवं। वहां मामी से मुलाकात हुई कोई दो दशक बाद। उन्होंने मुझे छुटपन में देखा था, अब मैं स्नातक कक्षा में पढ़ रहा था। मामी पर भी उम्र का असर दिखने लगा था। पर वे मिलकर बड़ी भावुक हो गईं। रात को हम वहीं रुके। महुआंव गांव में ही। महुआवं एक छोटा सा गांव है जो कैथी पोस्ट ऑफिस के तहत आता है।


वैसे अगर सीधे महुआवं गांव आना हो तो राबर्टसगंज से पहले हिंदुआरी में उतरकर आने का रास्ता सुगम है। अगले दिन अशोक भाई के साथ तय हुआ कि समय है तो हमलोग शक्तिनगर से आगे अमलोरी कोल फील्ड्स में चलेंगे जहां सबसे बड़े भैया काशीनाथ यानी सतीश कुमार सिंह कार्यरत हैं। तो हमलोग अगली दोपहर चल पड़े हैं शक्तिनगर के लिए। महुआवं से पैदल चलकर हिंदुआरी पहुंचे। वहां से बस से राबर्ट्सगंज बाजार में। वहां जाकर हमें अशोक के दूसरे नंबर के मामा रामलायक सिंह के घर रुके। इन मामा का पुकार का नाम जज है। वे जज तो नहीं बने पर वे आढ़ती का काम करते हैं। राबर्टसगंज में रेलवे क्रॉसिंग के पास जोगिया बाबा के पास उनका घर है। अगले दिन हमारा कार्यक्रम शक्तिनगर जाने का है। पर अब बस। उस यात्रा का बातें आगे करेंगे।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         ( RAMNAGAR, AHRAURA, MADHUPUR, TENDU PUL, SHANGO, MAHUAON, KAITHI, HINDUWARI, ROBERTSGANJ, COLORS OF BANARAS )

Friday, September 18, 2020

हीरामन और कमली आए हमारे गांव

भाई का नाम था हीरामन और बहन का कमली। उनके माता-पिता हमारे खेतों में धान और गेहूं काटने और बोझा ढोने का काम करते। इस दौरान हीरामन और कमली खेतों में गिरी हुई बालियां चुनते। दिन भर में बालियां चुनकर अपने खाने के लिए कुछ अनाज जुटा लेते।

हीरामन और कमली अपने माता पिता के साथ हमारे घर आए थे। कहां से आए थे। पलामू जिले के किसी गांव से। हमारे गांव के सीवान से वे लोग काम की तलाश में चलते जा रहे थे। दादा जी से बात हुई और उन्हें रोक लिया गया। इसके बाद वे कई महीने हमारे साथ ही रहे।

कुछ यूं होता था कि हर साल धान और गेहूं काटने के समय कटनिहार हमारे यहां पलामू जिले से ही आते थे। ये लोग पैदल पैदल एक गांव से दूसरे गांव घूमते जिस गांव में काम मिल जाता वहीं उस सीजन में रुक जाते। हमारे दलान में उनके रहने का इंतजाम कर दिया जाता। वे अपना खाना खुद बनाते थे। दिन चढ़ने के साथ हमारे खेतों में काम में जुट जाते।

पूरे सीजन हीरामन और कमली का परिवार हमारे परिवार के सदस्य की तरह था। हीरामन के पिता भले मजदूर थे पर रामकथा के बड़े जानकार थे। शाम होने पर वे अपने बेटे को रामकथा सुनाते। कथा सुनाने के बात सवाल करते। बताओ किस गलती से सीता का हरण हुआ। बेटा हीरामन इसका तार्किक जवाब देता। जवाब सही नहीं होने पर पिता उसे दुरुस्त भी करते।

मौका मिलता तो हीरामन और कमली हम भाई बहनों के साथ खेलते भी थे। हमारे लिए खुशी की बात थी कि हमारे घर में दो बच्चे और आ गए थे। हमारे खेलने वाली मंडली बड़ी हो गई थी। पर हीरामन और कमली हमारी तरह नहीं थे। उनका संघर्ष अलग था। वे पलामू जिले के भूमिहीन परिवार से आते थे। उनका साल भर का दाना पानी हमारे यहां के दो मौसम की कटनी और दंवनी पर ही निर्भर करता था।

हीरामन और कमली हमारी तरह किसी स्कूल में नहीं जाते थे। जहां उनके पिता मजूरी करने जाते वे उनके साथ हो लेते। कमली सुबह सुबह अपनी मां की रसोई में उनका हाथ बंटाती। हीरामन अपने पिता को बोझा ढोने में मदद भी करता। बोझा उठाने के समय खास तौर पर मदद की जरूरत पड़ती है।

भले वे स्कूल नहीं जाते थे पर जिम्मेवारियों के मामले में वे हमारी उम्र में हमसे ज्यादा परिपक्व हो गए थे। वक्त के थपेड़ों ने उन्हें अन्य एक एक दाने की कीमत समझा दी थी। तभी तो वे खेतों में बिखरी हुई बालियों को भी चुन लेते थे।
हीरामन कमली के परिवार से पहले वाले साल में हमारे घर धान काटने के लिए दो मजदूर आए थे जो साधु थे। ये दो भाई या दो मित्र थे। लंबी जटाएं और लंबी दाढ़ी पर वे साधु हो गए थे। पर ऐसे साधु थे जो मांग कर नहीं खाते थे। पेट के लिए रोजी रोजगार करते थे। दोनों कबीरपंथी साधु हमारे घर दो महीने से ज्यादा रहे। हमारा पुराना दलान जिसके आगे एक शहतूत का पेड था, उसी में उनका डेरा था।

एक रात मैं जल्दी सो गया था। अचानक नींद खुली तो देखा दलान में संगीत की महफिल जमी है। दोनों साधु पांव में घूंघरू बांध कर नाच रहे थे और गा भी रहे थे। काफी देर तक उनकी संगीत की महफिल चलती रही। वे दोनों साधु लकड़ी का काम भी जानते थे। हमारे घर में रहकर खाली समय में उन्होने काठ की पांच प्यालियां बनाईं। इसे वे कठुली कहते थे। वे साधु तो चले गए पर वह कठुलियां कई सालों तक हमारे साथ रहीं और उन साधुओं की याद दिलाती रहीं। पर वे दोनों साधु दुबारा हमारे खेतों में काम करने नहीं आए।

फिर बात हीरामन और कमली की। हीरामन कमली अपने साथ एक लाल रंग का कुत्ता भी लाए थे। जब तक वे हमारे घर रहे कुत्ते को हमारे घर से खाना मिलता था। तो कुत्ते की हमसे भी जान पहचान हो गई। जब हीरामन और कमली अपने माता पिता के साथ जाने लगे तो मेरे दादा जी ने आग्रह किया इस कुत्ते को हमें दे दो। हालांकि को वह कुत्ता हीरामन कमली का साथ नहीं छोड़ना चाहता था पर थोड़े मान-मनुहार के बाद वह हमारे घर रुक गया।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(SOHWALIA DAYS 33 , HIRAMAN AND KAMLI )
( सोहवलिया की बातों को फिलहाल अल्पविराम पर फिर कभी मौका मिला तो यादों की पोटली से और भी कहानियां निकलेंगी। ) 

Wednesday, September 16, 2020

और बन गई हमारी बंदूक

बचपन में गुलेल बहुत से लोगों ने चलाई होगी। कई लोग पछियों का शिकार करने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। पर हमारे मिस्त्री जी ने गुलेल से आगे बढ़कर हमारे लिए एक बंदूक बना दी थी।

गुलेल के लिए अंगरेजी के अक्षर वाई के आकार के एक लकड़ी की जरूरत होती है। इसमें रबर बांधते हैं। रबर के बीच में चमड़े का एक टुकड़ा लगा होता जिसमें गोली रखकर गुलेल को फायर कर दिया जाता है। अगर निशाना ठीक बैठा तो पक्षी मर भी जाते हैं।

पर हमारे घर आते महाराज मिस्त्री। वे वैसे तो हमारे हल, हेंगा और दूसरे कृषि उपकरण को ठीक करने के लिए आते थे। पर वे आर्डर पर कुरसी, चौकी आदि भी बनाते थे। लकड़ी  के दूसरे उपकरणों की मरम्मत भी करते थे। पर महाराज मिस्त्री छोटे मोटे इंजीनियर ही नहीं अन्वेषक भी थे। उन्होंने गुलेल का विकास कर हमारे लिए बंदूक बना डाली। वैसे बंदूक बनाने का आडिया दादाजी ने दिया था। उसपर महाराज मिस्त्री ने शोध किया। 

फिर तीन फीट की लकड़ी को खूब चिकना किया। उसके साथ ढाई फीट की एक लकड़ी लगाई। इसमें चार लकड़ी के ज्वाएंट लगाए। अब एक लकड़ी की लंबी कांटी में गुलेल का फीता चढ़ा दिया जाता। इसमें मिट्टी की गोली रखी जाती। निशाना लगाकर बंदूक का घोडा दबाने पर गोली फायर हो जाती थी। निशाना सही लगने पर काम तमाम। अब वह बंदूक हमारे पास नहीं है। उसकी कोई तस्वीर भी हमारे पास नहीं है। अगर होती तो आज मैं उसका लाइसेंस पेटेंट करा लेता। यह लोकल पर वोकल होता। यह स्वदेशी नवोन्मेष में गिना जाता। पर अब उसके निर्माता महाराज मिस्त्री भी इस दुनिया में नहीं है। इसलिए अब वैसी बंदूक नहीं बन सकती।

खैर उस बंदूक को पाकर हम इतरा रहे थे। मैं और मेरे गांव में कुछ महीने साथ रहे अरविंद भैया उस बंदूक को लेकर हम पक्के शिकार बन गए थे। खेत और बगीचे में बंदूक लेकर कुलांच भरते। गांव के दूसरे बच्चे हमसे डरने लगे थे। हम बंदूक से पक्षियों का शिकार करते। वैसे बंदूक का निर्माण एक खास उद्देश्य से हुआ था। यह सब्जी के खेतों और पेड़ों से पक्षियों को भगाने के गुरुतर उद्देश्य को लेकर निर्मित हुआ था। इस काठ के बने महान यंत्र से उद्देश्यों की पूर्ति भी हो रही थी। एक फायर करने के बाद सब्जी के खेतों से छोटे मोटे जानवर फरार हो जाते। पेड़ पर फायर करने के बाद तो कोहराम ही मच जाता था। सारे पक्षी एक साथ झुंड में उड़ जाया करते थे।

गांव होने वाले शादी समारोह में भी हम अपनी बंदूक साथ लेकर जाते थे। बड़े बुजुर्ग लोगों के पास असली बंदूक होती थी तो हमारे पास अपनी लकड़ी की बंदूक। पर यह किसी असली से कम थोड़े ही न थी। और हमारे पास स्वनिर्मित गोलियों का बड़ा जखीरा होता था। अगर में उस बंदूक के साथ लंबे समय तक गांव में रह जाता तो शायद पक्का शिकार बन जाता। बाद में लोहे की बंदूक की मांग करने लगता। सो एक तरह से यह अच्छा ही हुआ। वरना पत्रकार बनने की जगह कहीं पुलिस या फौज में चला गया होता।
-         = विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-         ( SOHWALIA DAYS 32, WOOD MADE GUN, GULEL, MAHARAJ MISTRY, CARPAINTER  )

Monday, September 14, 2020

मिलवा सोहवलिया गांव की आटा चक्की और मुनीम जी

हमारे गांव सोहवलिया में एक मिल हुआ कराता था। मिल मतलब आटा चक्की, सरसों तेल निकालने वाला स्पेलर और धान कूट कर चावल निकालने वाली मशीन। सब कुछ एक परिसर में था। तो गांव का वह विशाल मिल था। इस लिए आसपास के लोग तो उस गांव मिलवा सोहवलिया ही कहने लगे थे। 

इस मिल के स्वामी संभवतः विक्रमा राय हुआ करते थे। पर मिल की गद्दी पर एक मुनीम जी बैठते थे। उनका असली नाम क्या था मालूम नहीं पर आसपास के गांव के सारे लोग उन्हें मुनीम जी ही कहते थे। वे आटा, धान, तेल पिसवाने वालों का बही में हिसाब रखते। लोग उन्हें बड़े हाकिमों जैसा सम्मान देते थे। कई बार लोग उनसे आग्रह करते कि थोड़ा जरती कम काटें। वे अपने को किसी अफसर से कम नहीं समझते थे।

हमारे खेतों में जो गेहूं होता था उसे पिसवा कर आटा बनवाने के लिए मैं दादा जी के साथ इस मिल में जाता था। ज्यादा मात्रा में गेहूं और धान होता तो हमलोग बैलगाड़ी से लेकर मिल तक जाते थे। इस विशाल मिल को चलते हुए देखना मुझे आश्चर्य चकित करता था। 




एक डीजल का विशाल इंजन था। उससे फीता (पाटा) लगाकर सामने के के तीन बड़े बड़े लोहे के पहियों को चलाया जाता था। फिर इन पहियों से फीता लगाकर क्रमशः धान कूटने वाली मशीन, आटा पिसने वाली चक्की और तेल निकालने वाले स्पेलर को चलाया जाता था। बड़े से चौकोर लोहे के ड्रम में गेहूं उलट दिया जाता था, फिर थोड़ी देर में नीचे झोली आटा गिरने लगता था। पर आटा उतना ही नहीं मिलता था जितना हम गेहूं देते थे। मुनीम जी उसमें से प्रति किलो की दर से जरती काट लेते थे। हालांकि आटे की पिसाई अलग से दी जाती थी। फिर भी जरती क्यों काटी जाती थी यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया।

हमारे खेतों में हर साल इतनी सरसों और तीसी बोई जाती थी जिससे कि साल भर खाने भर तेल निकल जाता था। सरसों के तेल को पेरवाने पर उसके साथ खली निकलता था। हम उस खली को ले आते थे। वह खली जानवरों का खाने के लिए दिया जाता था।
मिलवा सोहवलिया के उस मिल के उपर एक विशाल भोंपू लगा हुआ था। जब मिल चलना शुरू होता उस भोंपू से आवाज आती थी। यह आवाज आसपास के कई गांवों तक सुनाई देती थी। कई बार सीजन में मिल दिन रात भी चलता रहता था।

एक बार की बात है मिल खराब हो गई। उसी समय हमारे लिए आटा पिसवाना जरूरी था। तो तय हुआ कि हमारे गांव से दो किलोमीटर दूर गांव बसतलवा में मिल चल रही है। तो दादा जी ने वहां जाकर आटा पिसवाने की तैयारी की। मेरी मां ने मेरे लिए पांच किलो की गठरी बना दी। हम दोनों चल पड़े आटा पिसवाने। बसतलवा गांव वाली मिल बिजली से चलती थी। इसलिए वहां आवाज बिल्कुल नहीं आती थी। हमारे आसपास ये एक ऐसा गांव था जहां बिजली आ चुकी थी।
हमलोग आटा पिसवाकर लौट तो आए। पर सिर पर पांच किलो वजन लाद कर दो किलोमीटर जाना और फिर आना इतना श्रम करने के कारण मुझे अगले दिन बुखार हो गया। ये बुखार कुछ दिनों तक रहा। नन्ही सी जान और इतना काम।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         ( SOHWALIA DAYS 31, ATTA CHAKKI, SOHWALIA, MILL, BASTALWA )