Sunday, August 9, 2020

ठग लिया लड़का हमारा....जी समधी बेइमान...


उनका असली नाम वीरेंद्र था, पर हमलोग उन्हें बीलर चाचा कहते थे। आते जाते कई बार उन्हें चिढ़ाते भी थे। बीलरा बेराम बा, हमरा कौन काम बा। लेकिन यह सब सुनकर वे नाराज नहीं होते थे। उनका घर मेरे गांव से उत्तर था। गांव के सबसे किनारे। वे आते जाते गलियों में मिल जाते थे। हम उनके साथ खूब खेलते थे। मुझे याद आता है कि उनके बड़े भाई यानी राजेंद्र चाचा की शादी तय हो गई। शादी से पहले हमलोगों के गांव में तिलक आता है। तिलक क्या उसमें भी पूरी बारात ही होती है। क्षमता के अनुसार 20 से सौ लोग तक तिलक चढ़ाने आते हैं। इस तिलक में भी भोज होता है।

तो राजेंद्र चाचा के तिलक में भी लाउडस्पीकर लग गया था और उसमें गाने बज रहे थे। हमारे गांव और आसपास के गांव में शादी विवाह मे लाउडस्पीकर बजाने का काम कानडिहरा के डोमा साह के सबसे छोटे भाई संतु साह करते थे। मेरी उनसे अच्छी जान पहचान थी। वे बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं। शादियों में तब एलपी रिकार्ड बजते थे। इन रिकार्ड पर तब बालेश्वर के गीत बजा करते थे। हमका जानत रहन बाबा कि बीबी बीए पास बा....और ऐसे ही गीत।

तो चाचा के तिलक में लाउडस्पीकर में गांव की औरते गारी गा रही थीं। वह शादी ही क्या जहां गांव की औरतें समधी को गारी (गाली) न दें। ये हमारी भोजपुरी की मीठी परंपरा का हिस्सा है। कुछ ऐसी होती थी गालियां  - ठग लिया लड़का हमारा....जी समधी बेइमान...जी समधी बेइमान।

तिलक के बाद शादी की घड़ी निकट आ गई। हम सबको बारात जाना था। इस बार की बारात में ट्रेक्टर से जाने का मौका मिला। बारात मे पिताजी भी गए और मैं भी। तुर्की गांव में बारात जा रही है। ये गांव कुदरा से दक्षिण चेनारी से भी आगे कैमूर की पहाड़ी की तलहटी में है। ट्रैक्टर की चाल ज्यादा तेज नहीं होती, इसलिए बारात को पहुंचने में कई घंटे लग गए। चेनारी के बाद मलाहीपुर फिर उसके आगे हम बारात वाले गांव तुर्की पहुंचे तो शाम ढल रही थी। पर इस गांव में पहुंचकर बड़ा मजा आया। पहाड़ की तलहटी में गांव का नजारा बड़ा मनोरम था। यहां बिजली पहुंच चुकी है। मैंने पहली बार बिजली से चलने वाला पंपिंग सेट देखा जो आवाज ही नहीं करता। वरना मेरे गांव में डीजल इंजन पंपिंग सेट चलता था जो तेज आवाज करता था। उसे स्टार्ट करने के लिए भी पूरी ताकत लगानी पड़ती है।

तो तुर्की गांव से बारात से हमलोग अगले दिन लौटने लगे तो चेनारी के बाजार में थोड़ी देर रुके। यहां से पिताजी एक बोरी महुआ खरीदा। यह दुधारु पशुओं को खिलाने के लिए था। इससे पशुओं का दूध बढ़ जाता है।

राजेंद्र चाचा और वीरेंद्र चाचा अयोध्या दादा के बेटे हैं। वे हमारे सबसे छोटे परदादा का परिवार है। पर इस शादी के कुछ साल बाद एक ऐसा समय आया जब अयोध्या दादा ने पूरे परिवार के साथ हमारा गांव छोड़ दिया। वे शिवसागर के पास एक नए गांव में चले गए। गांव क्यों छोड़ा। जहां तक मुझे याद आता है कि उनके घर एक बार चोरी हो गई। इससे वे दुखी हो गए। सन 1984 में जब मेरे दादा जी का निधन हुआ तो अयोध्या दादा जानकारी मिलने पर मेरे दादाजी के श्राद्ध कर्म में शामिल होने पहुंचे थे। उसके बाद हमने उन्हें नहीं देखा। सुना है कि अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर हमारे प्यारे बिलर चाचा इन दिनों कहां हैं मुझे नहीं मालूम...
-         --विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( ( SOHWALIA DAYS 13 , TURKI, CHENARI, SHADI, BHOJPURI GEET ) 

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