Wednesday, August 5, 2020

जब झूमती गाती बैलगाड़ी से निकली बारात

बचपन में कई बारात जाने का मौका मिला। बड़े होने पर भी कई बारात में गया। पर एक बारात का अनुभव इन सबसे अलग रहा। आप बारात रेलगाड़ी से जाते हैं, बस से जाते हैं, कार से जाते होंगे। गांव में कई बार साधनों की उपलब्धता के मुताबिक ट्रैक्टर से तो कई बार पैदल भी बारात जाना पड़ता है।

हमारे गांव के सुदामा चाचा की शादी थी। बारात ज्यादा दूर नहीं जानी थी। बस एक मील दूर पीपरा गांव में। तो तमाम बाराती पैदल ही पहुंच सकते थे। तो हुआ कि बारात में कुछ बैलगाड़ियां जाएंगी। बैलगाड़ियां इसलिए कि इसमें झपोली में खाजा और दूसरी मिठाइयां लाद कर ले जाई जाएंगी। साथ ही वापसी में दुल्हन इन्ही बैलगाड़ी में से एक में आएगी।

तो सुबह से  तैयारी शुरू हो गई। बारात जाने और भोज खाने का उत्साह तो मन में था ही। बारात में मेरी बैलगाड़ी भी जाने वाली थी। तो पहले बैलगाड़ी की सफाई की गई। उसके पहिए और हाल की धुलाई की गई। आराम से बैठने के लिए बैलगाड़ी में पुआल बिछा दिया गया। हमने दोनों बैलों पीपरैला और ददरिया को भी नहला धुला कर तैयार किया। दोनो के गले में घंटियां बांध दी गई। बैलों के सींग में सरसों तेल लगा कर चमका दिया। क्यों नहीं करते भला, बैल कोई इधर उधर जा रहे थे, बारात में जा रहे थे भाई। वे भी तो अच्छे दिखाई देने चाहिए। 
शाम को सूरज ढलने से पहले बैलगाड़ी तैयार हो गई। उसे कौन से चाचा हांक रहे थे उनका नाम तो अब याद नहीं रहा। पर मुझे और कुछ बच्चों को बैलगाड़ी में बैठकर जाने का मौका मिला। जब बैलगाड़ी पीपरा की तरफ चल पड़ी तो हमारे उत्साह का कोई ठिकाना नहीं था। बैलों के गले की घंटी के संगीत के साथ हम पीपरा गांव की ओर बढ़ रहे थे। टन..टन..टन...टना...खड़ खड़...पड़ पड़....इहो...चल हट....

हमारे दोनों बैल बड़े समझदार थे उन्हें कुछ कहना नहीं पड़ता। और पीपरैला तो अपने पुराने गांव में ही जा रहा था। वहीं से तो दादा जी उसे खरीदकर लाए थे।तो उसका उत्साह दोगुना था।

तो शाम ढलने से पहले हमलोग बारात में पहुंच गए। बगीचे में बैलों को बांध दिया गया। हमारे सोने का इंतजाम भी इसी बागीचे में खाट पर था।आम का बाग था। आम अभी कच्चे थे, पर हमारी पहुंच के करीब। तो हमने कई आम तोड़कर खाए। वैसे पीपरा गांव से हमारा एक और रिश्ता है। मेरे आसपास के कई गांवों का पोस्ट ऑफिस पीपरा सकरवार गांव ही है। कभी उस गांव को सकरवार राजपूतों ने बसाया था। इसलिए गांव का नाम ऐसा है। 

इसी गांव से डाकिया जिनका नाम हरिहर सिंह था, डाक लेकर हमारे घर आते थे। कभी वे शादी कार्ड लेकर आते तो कभी नौकरी के इंटरव्यू लेटर। कभी टेलीग्राम लेकर आते। पिता जी कई साल तक डाक से अखबार भी मंगवाया करते थे। हरिहर डाकिया हमारे जिंदगी का अभिन्न हिस्सा थे। संयोग से पीपरा पोस्ट ऑफिस के पोस्टमास्टर भी हमारे रिश्तेदार थे।
गांव की औरतें बारात के स्वागत में गीत गा रही थीं...
पूरब पछिमवा से आवे सुनर दुल्हा
जुड़ावे लगली हो सासु नयनवा 
बारात में शाम का नास्ता और रात का खाना खाने के बाद हमलोग बगीचे में पेड़ के नीचे लगे खाट पर सो गए। तब शादियां देखने में मेरी कोई रुचि नहीं थी। बारात मतलब नए गांवों में सैर और भोज।

सुबह बारात वापस चली। दुल्हन को लेकर। तो हमारी बैलगाड़ी से नई नवेली चाची आने वाली थीं। बैलगाड़ी में रंगीन साड़ियों से ओहार लगा दिया गया। हमलोग बैलगाड़ी के पीछे पीछे पैदल पैदल अपने गांव की ओर चल पड़े। कुछ बच्चे गीत गुनगुना रहे थे – डोली में के कनेया ओहार लगावे ली... जब हमलोग गांव पहुंचे तो मां, चाची, दादी सब लोग दुल्हन के स्वागत के लिए तैयार थीं। गांव में दरवाजे से दुल्हन को बड़े-बड़े परात में पांव रखवाते हुए धीरे-धीरे आंगन से होकर कमरे तक ले जाते हैं। इस दौरान बाकी औरतें हौले हौले स्वर में गीत गाती रहती हैं। 

-         ----विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
-          ( SOHWALIA DAYS 11 , BARAT, PIPRA SAKARWAR, BAILGADI )

4 comments:

  1. अच्छा संस्मरण ।

    -रेखा

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  2. सुंदर संस्मरण 1974 में देशव्यापी वाहनों की हड़ताल थी तो मेरी बारात भी वैलगाडी से आई और मैं भी बैलगाड़ी में बैठकर ही शहर से गाँव विदा हुई

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    1. वाह, क्या बात है, आपकी यादें, मजेदार होंगी.

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