Monday, August 31, 2020

ब्रह्मभोज और रामनाथ बाबा की याद


सासाराम से वाराणसी जाने के लिए दोपहर बाद पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया हूं। डिब्बे में थोड़ी भीड़ है। एक जगह थोड़ी सी जगह बनाकर खड़ा होकर सफर काटने लगा। कुछ स्टेशन गुजरने के बाद कुदरा में ट्रेन रूकी। मैं एक बार फिर हशरत भरी निगाह से आपने गांव के निकटम स्टेशन को देखता हूं। इस बीच सामने वाले सीट पर बैठे सज्जन से बातचीत शुरू हो जाती है। वे बताते हैं कि मैं भभुआ रोड उतर जाउंगा तब आप मेरी सीट पर बैठ जाना। बातों बातों में उन्होंने बताया कि वे डेहरी ओनसोन से आगे नासरीगंज की तरफ किसी गांव के रहने वाले हैं। मैंने बताया कि मेरा गांव सोहवलिया है तो बोल पड़े क्या रामनाथ सिंह वाला सोहवलिया। मैंने कहां, हां। मैंने पूछा आप रामनाथ सिंह को कैसे जानते हैं। वे बोल पड़े मेरे गांव में, मेरे घर में उनकी ननिहाल हुआ करती थी।

रामनाथ सिंह का नाम सुनते हैं मेरी स्मृतियों के आंगन में सैकड़ों दीप जल उठे। रामनाथ सिंह मेरे गांव के सबसे बड़े खेतिहर (जमींदार) थे। गोरा चिट्टा चेहरा, लंबी कद काठी। शानदार धोती कीमती कलफ वाला कुर्ता और सिर पर कई बार विशाल पगड़ी बांधे जब वे सड़क पर चलते तो सिर्फ वही नजर आते थे।
वैसे तो वे मेरे दादाजी से उम्र में छोटे थे पर मैं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करता था। उनका घर नहर के उसपार था और मेरा नहर के इस पार। कई बार वे सुबह टहलते हुए हमारे दलान पर आ जाते। मैं उन्हें अपने बबूल के पेड़ से तोड़ कर दातून पेश करता। वे खुश होकर चले जाते। मेरे प्रति उनका बड़ा स्नेहिल भाव रहता था। रामनाथ बाबा मेरे परिवार के लिए काफी मददगार भी थे। वैसे तो उनकी लंबी चौड़ी खेती थी। पर वे सूद पर पैसा लगाने का भी काम करते थे। पर कभी किसी से जबरदस्ती वसूली नहीं करते। वे बड़े रहमदिल इंसान थे। इसलिए आसपास के कई गांवों तक उनका सम्मान था। इसलिए तो सोहवलिया गांव को उनके नाम से जाना जाता था। हमारे गांव के राजपूत लोग राय उपाधि भी लिखते हैं। इसलिए उनका नाम रामनाथ राय भी कहा जाता था। एक उनके पड़ोसी हुआ करते थे शिवदेनी राय। रामनाथ बाबा के पास सन 1980 से पहले मेसी फार्गूसन ट्रैक्टर और राजदूत मोटरसाइकिल हुआ करती थी। उनकी गौशाला में इतनी गायें थी कि सालों भर उनके घर दूध  होता था।

दादी से मट्ठा लेकर आया -  मैं कोई पांच साल का रहा होउंगा। एक बार मेरी इच्छा दही बड़े खाने की हुई। मैंने मां से फरमाइस की। उन्होंने कहा, इसके लिए छाछ ( मट्ठा) चाहिए। हमारे पास उस समय कोई लगहर (दूध देने वाली) गाय नहीं थी। मां ने सलाह दी। मैं तुम्हें तीन डिब्बे वाला खाली टिफिन कैरियर देती हूं। तुम इसे लेकर रामनाथ बाबा के घर चले जाओ। सीधे घर के अंदर आंगन में जाना। वहां दादी से मिलना। अपने दादा जी का नाम बताना और दादी से मट्ठा मांगकर ले आना। मैंने ऐसा ही किया। सोहवलिया गांव के बीचों बीच रामनाथ बाबा का विशाल दो मंजिला घर था। मैं वहां पहुंचा तो रामनाथ बाबा अपनी मोटरसाइकिल की सर्विसिंग में व्यस्त थे। मैं उन्हे प्रणाम करके घर के अंदर घुस गया। दादी से पहली बार मिला था। अपना परिचय दिया – प्रयाग सिंह का नाती हूं। मां ने कहा, आप मेरे इस टिफिन के तीनो डिब्बों मे मट्ठा भरकर दे दिजिए। दादी ने अपने घर के लोगों को कहकर मुझे मट्ठा दिला दिया। मैं झूमता हुआ टिफिन कैरियर लेकर अपने घर पहुंचा। मां ने दही बड़े (फुलौरा) बनाया। मैंने खाया।
गांव छोड़कर जाने के बाद रामनाथ बाबा से मिलना बहुत कम हो गया। पर उनकी यादें हमेशा बनी रहीं। रामनाथ राय के एक बेटे हुए करते थे जीत नारायण सिंह। वे एमबीबीएस डाक्टर थे। पिता की तरह ही लंबी कद काठी वाले सुंदर व्यक्तित्व के स्वामी थे। कसरती शरीर वाले बड़े साहसी व्यक्ति थे। एक बार डेहरी ओनसोन के पास इंद्रपुरी जलाशय में वे स्नान करने उतरे। पानी के भंवर में फंस गए तो फिर निकल नहीं सके। उनका दुखद अंत हो गया। रामनाथ बाबा के जीवन का वह काफी दुखद समय रहा होगा। जब जवान डॉक्टर बेटा उन्हें छोड़कर चला गया।

सन 1994 की बात है। मैं बीएचयू में पढ़ता था। इसी दौरान एक बार अपने गांव पहुंचा। गांव में दुखद संदेश मिला कि कुछ दिन पहले रामनाथ बाबा का देहांत हो गया। मेरे सामने किसी फिल्म के दृश्य की तरह उनके अनेक चेहरे घूमने लगे। एक दिन बाद ही उनका श्राद्ध कर्म था। तो मैं रुक गया उसमें शामिल होने के लिए।

सुबह-सुबह का नजारा था। दूबे के सोहवलिया से ब्राह्मण परिवार के सदस्य श्राद्ध के ब्रह्म भोज में खाने के लिए रामनाथ बाबा के दलान की ओर प्रस्थान करने लगे थे। अस्सी नब्बे साल के बुजुर्ग, जवान और बच्चे सभी जा रहे थे। वे बच्चे भी चल पड़े थे भोज मे खाने के लिए जिन्होंने अभी अभी चलना सीखा था। तो कुछ ब्राह्मणों के बच्चे तो अपने पिता के गोद में भी चले जा रहे थे। मैंने चाचा से पूछा इतने सारे लोग। चाचा बोले रामनाथ बाबा गांव के सबसे अमीर किसान थे। उनके मृत्यु भोज में सारे ब्राह्मणों को भोज के बाद कुछ न कुछ उपहार भी मिलेगा। इस उम्मीद में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।

दोपहर में पहले ब्राह्मण भोज उसके बाद आम लोगों के लिए भोज होना था। मैं दोपहर तक रामनाथ बाबा के दरवाजे पर पहुंच गया। अभी ब्राह्मण भोज चल ही रहा था। इसके बाद हमलोगों की बारी आनी थी।

ब्राह्मणों की पहली पांत भोज खाकर उठ गई। सभी पंडितों को एक गमछा, एक थाली, एक किलो चावल और कुछ रुपये नकद दिए जा रहे थे। अब खाने के लिए ब्राह्मणों की दूसरी पांत बैठी। फिर तीसरी पांत। कोई पांच सौ ब्राह्मणों ने भोज खा लिया होगा। पर अंतिम पांत वाले लोगो के लिए थाली और गमछा घट गया। क्योंकि उम्मीद से ज्यादा पंडित लोग भोज में पहुंच गए थे।

घर के लोगों ने अंत खासकर ब्राह्मण परिवार के बच्चों को सिर्फ एक किलो चावल और नकद पैसे बांटना शुरू किया। जिन्हे थाली और गमछा नहीं मिला वे बच्चे थोड़े दुखी थे। ब्रह्म भोज खत्म हो चुका था। थोड़ी देर में वे बच्चे जिन्हे थाली और गमछा नहीं मिला था, अपनी ही उम्र के उन बच्चों से जिन्हें थाली और गमछा मिल गया था, लड़ने लगे। जो मजबूत पड़ा उसने मारपीट कर कमजोर बच्चों से थाली गमछा छीन लिया। यह सब कुछ देखकर मैं सोचने लगा, मृत्यु के बाद भला ब्रह्मभोज क्यों होता है। इसलिए न कि मृतआत्मा को तृप्ति मिले। तो क्या थाली और गमछे की लड़ाई का ये नजारा देखकर रामनाथ बाबा की आत्मा को तृप्ति मिल रही होगी। शायद नहीं।
-         ---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( (SOHWALIA DAYS 24, RAMNATH SINGH, BUTTER MILK, CHHACH ) 

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