Saturday, August 29, 2020

जेठ की दुपहरी में - आम का घुमउवा

गरमी की चिलचिलाती दोपहरी में चुपके से घर से भाग कर बागीचे मे जाकर आम तोड़ना और उससे घुमउवा बनाकर खाना। क्या गजब का शौक था। पांच छह साल की उम्र में जब मेरी मां मुझे आंगन के बरामदे में बिठाकर पढ़ाया करती थीं। वह जेठ की दुपहरी हुआ करती थी। पर मेरा मन पढ़ाई में कम आम के बागीचे में ज्यादा लगता था। हमारा पड़ोसी था लाल बहादुर। चाचा जी का बेटा। उससे मेरी इशारों में सुबह ही सेटिंग हो जाती थी। मां मुझे सबक देकर कमरे में आराम करने चली जातीं। मैं मौका देखकर दबे पांव बाहर की ओर बढ़ता। हौले से दरवाजा खोलकर गली में दौड़ लगाकर फरार। कई बार मां आवाज लगाती थीं। पर मैं इतनी दूर निकल चुका होता था कि मां पकड़ नहीं सकती थीं। मैं ये जानता था कि मां मुझे ढूंढते हुए बागीचे तक नहीं आएंगी। वे गांव की बहू थीं, इसलिए घर से ज्यादा दूर नहीं निकलती थीं। लौटने पर पिटाई होती थी, पर बगीचे में मौज के बीच ये पिटाई स्वीकार्य थी।

जेठ की दुपहरी में तापमान 45 डिग्री के पार रहता होगा। हमलोग ढेला लेकर पेड़ पर लटक रहे कच्चे आमों पर निशाना लगाते। क्या निशाना था हमारा। पर आगे हम निशानेबाज या तीरंदाज नहीं बने। हमारी प्रतिभा को सही मार्ग पर नहीं मोड़ा जा सका। एक ही निशाने में कच्चे आम टूट कर नीचे गिर आते।

इन आमों को छिलके हटाने के लिए नहर में आने वाले घोंघे के खोल यानी सितुआ को पत्थर पर घिरकर हम छिलने वाला (पीलर) बना लेते थे। ये जुगाड़ था हमारे छुटपन का। आम को छिलने के बाद उसे टुकड़े टुकड़े काट कर उसमें थोड़ा नमक मिलाते थे। ये नमक हम पाकेट में रखकर घर से पहले से ही ले जाते थे। अब इस बारीक कटे हुए  आम को एक साफ कपड़े में बांध कर देर तक हवा मे गोल-गोल घुमाते थे। इस घुमाने के क्रम में आम और नमक आपस में अच्छी तरह मिल जाते थे। इस तरह तैयार हो गया आम का घुमउवा। ये किसी घर में बनने वाली डिश नहीं है। इसे हमने बगीचे में ही बनाना सीखा था। अपने से बड़े बच्चों से। अब इसे बगीचे में ही बैठकर धीरे धीरे देर तक हमलोग स्वाद लेकर खाते थे। कसम से उसमें जो स्वाद आता था न आजकल मिक्सी में पीसी हुई आम की चटनी में कहां आता है।

हरे चने का साग तो शहर में रहकर आपने खाया होगा। हम गांव में चने का साग खूब खाते थे। पर इससे भी ज्यादा आनंद आता था कि अपने साथ नमक लेकर खेत में चले जाएं। चने के पौधों से साग को तोड़ें और वहीं खेत में नमक के साथ धीरे धीरे साग को खातें रहें। चने के पत्तों में वैसे भी थोड़ा नमकीन स्वाद रहता है। पंजाब पहुंचने पर हमने सरसों का साग खाने का चलन देखा। पर हमलोग सरसों उगाते थे पर उसका साग नहीं खाते थे। पर चने का साग बड़े चाव से खाते थे। कच्चा भी और पकाकर भी। 

चने में जब हरे हरे दाने आ जाते थे, तब हमलोग उसे आग में भूनकर खाते थे। इस हो रहा कहा जाता है। चने को आग में भूनना फिर उस आग के ठंडा होने पर एक-एक दाना ढूंढ कर निकालना। उसके छिलके हटाकर नमक के साथ एक एक कर खाना। ये बड़ा टाइम पास था। खाते खाते मुंह राख से काला हो जाता था। पर होरहा का वह स्वाद निराला होता था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
 (SOHWALIA DAYS 23, MANGO, GRAM, CHANA) 
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