Thursday, August 27, 2020

पुरइन का पत्ता और दशरथ मुसहर


उनका नाम था दशरथ मुसहर। बसपुरा गांव में नहर के पुल के ठीक बाद स्कूल से उल्टी तरफ मुसहरों की बस्ती है। दशरथ मुसहर इस बस्ती के मुखिया थे। वे मेरे दादाजी के हम उम्र रहे होंगे। जब वे आते थे तो दादा जी उन्हे सम्मान से बिठाते और उनके साथ चर्चा करते। जब मैं वहां पहुंचता तो वे मुझे दशरथ मुसहर को नमस्कार करने को कहते।
भले ही वे मुसहर थे लेकिन उनका नाम दशरथ था। मतलब उनके परिवार की राम जी और हिंदू संस्कृति में आस्था थी। दशरथ मुसहर चाल ढाल और देखने में किसी संभ्रांत ग्रामीण की तरह नजर आते थे और बातें किसी गुणीजन की तरह करते थे।

वैसे देखा जाए तो रोहतास जिले के मुसहर आदिवासी जैसे ही हैं। उनके पास खेती की कोई अपनी जमीन नहीं। मकान के नाम पर हर परिवार के पास एक एक फूस की झोपड़ी। कहा जाता है कि इनका नाम मुसहर इसलिए है कि वे चूहा ( भोजपुरी में मूस) पकड़ कर खा जाते हैं। हालांकि ये बात गले नहीं उतरती। हमारे यहां गरमी के बाद बारिश से पहले धान लगाने के लिए जब खेतो में पानी पहुंचाया जाता तो बड़ी संख्या में चूहे खेतों में बनाए अपने बिल से बाहर निकल आते थे। इस दौरान बहुत सी जातियों के लोग इन चूहों के पकड़ कर उन्हें आग में भूनकर उनका मांस खा जाते थे। जैसे अरुणाचल प्रदेश में लोग चूहे का मांस चाव से खाते हैं, उसी तरह हमारे जिले में सिर्फ मुसहर ही नहीं तमाम जातियां चूहे का मांस खा लेती हैं। बस प्रकट रूप से बोलने मे शरमाती हैं।

मुसहर हमारे यहां अछूत जाति बिलकुल नहीं है। जब भी किसी शादी विवाह और किसी अन्य प्रयोजन के मौके पर भोज का आयोजन होता तो इसमें पत्तल की सप्लाई का काम मुसहर परिवार के लोग किया करते है। वे लोग सालों भर घर में पत्तल बनाया करते थे। बड़े बड़े पत्तों को सिंक की सहायता से जोड़कर ये पत्तल तैयार किए जाते हैं। पर आजकल मशीन के बने हु रेडिमेड पत्तल आ जाने के कारण उनके परंपरागत कारोबार पर बुरा असर पड़ा है। खास मांग पर वे लोग पुरइन के पत्ता का पत्तल भी सप्लाई करते थे। ये ऐसा पत्ता है जो बिल्कुल गोल पत्तल के साइज का ही होता है। यह पानी में होता है। पर आजकल तो किसी भोज में दिखाई ही नहीं देता।

बसपुरा के मुसहर समाज के लोग सूअर पालन भी करते थे। उनके पास सूअरों का बड़ा झुंड हुआ करता था। बचपन में जब मुझे चिढ़ाना होता तो दादा जी कहते कि तुम्हारी शादी दशरथ मुसहर की पोती से करा दी जाएगी। दहेज में कई सारी सूअर मिलेंगी। यह सुनकर मैं झेंप जाता। हांलाकि मुझे लगता था कि मेरे साथ मजाक किया जा रहा है।

मुसहर जाति के लोग सिर्फ रोहतास जिले में ही नहीं बल्कि गया, भोजपुर और आसपास के तमाम जिलों से लेकर झारखंड तक में हैं। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के महान शहीद तिलका मांझी भी इसी समाज से हुए हैं। पहाड़ का सीना चिरकर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी ( माउंटेन मैन ) भी इसी समाज के महान सपूत हैं।

सन 1984 में जब मेरे दादाजी का श्राद्ध कर्म हुआ तो मुसहर समाज के सभी लोगों को भोज में आमंत्रित किया गया था। उन लोगों ने बड़े ही जोश से भोज खाया था और जाते जाते मेरे दादाजी के लिए जयकारा भी लगाया था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyutp@gmail.com
-         ( SOHWALIA DAYS 22 – DASHRATH MUSHAR, BASPURA )

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