Tuesday, August 25, 2020

मेरे दादा जी – खेती किसानी, गाड़ीवानी से लेकर साधुओं के संग तक


मेरे दादाजी कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। कोई राजनेता भी नहीं थे। अखबारों में नाम भी नहीं छपता था। पर वे एक किसान थे। हजारों लाखों देश के किसानों के बीच एक किसान। पर क्या कहानियां सिर्फ खास लोगों की होती हैं। संघर्ष सिर्फ शिखर पर पहुंचने वालों का होता नहीं न। तो मेरे दादा जी मामूली किसान नहीं थे। उनके व्यक्तित्व के कई रूप थे। वैसे तो उनका आधिकारिक नाम प्रयाग सिंह था। पर गांव-गिरांव में महतो जी के नाम से सम्मान पाते थे।

जब मैंने होश संभाला तो दादा जी बूढ़े हो चुके थे। पर मैंने उन्हें किसान के तौर पर खेतों में हल चलाते देखा है। जब धान की खेती शुरू होती तो मेरा रोमांच चरम पर होता। दादा जी के साथ मैं भी खेतों की ओर निकल पड़ता। कभी कोन्ही में तो कभी लाठी पर तो कभी कृष्णार्पण कभी बिचली पारी कभी गढ़ही में। ये सब हमारे खेतों के नाम थे। दादा जी धान के खेत तैयार करने के लिए दो चास हल चलाते। इस दौरान मैं उनकी मदद करने की कोशिश करता।

खास तौर पर गेहूं की खेती के दौरान खेत को समतल करने के लिए हेंगा  लगाया जाता। इस दौरान में हेंगा पर संतुलन बनाकर बैठ जाता था। दोनों हाथ में जुआठ पर लगी रस्सी होती थी। हेंगा पर बड़ा संतुलन बनाकर बैठना होता था। अगर बीच में गिरे तो पांव कुचल जाने का खतरा था। पर अक्सर हेंगा पर बच्चों को ही बिठाया जाता था, क्योंकि ज्यादा वजनी लोग तो उस पर बैठ भी नहीं सकते थे। खेती के दौरान में देखता था कभी कभी दादा जा रात 12 बजे तो कभी रात को दो  बजे भी खेतों में पानी मोडने के लिए जाते थे।

नहर में गास देकर पानी रोक देना – कभी-कभी खेत पटाने के लिए गांव के लोग नहर में गास लगाने जाते थे। ऐसा होता था कि नहर के पुल पर लगे सुलिस गेट में एक बांस में ढेर सारा पुआल लपेट कर फंसा दिया जाता था। इसे ही गास कहते थे। इससे पानी का स्तर ऊंचा हो जाता था। और पानी नीचे गिर कर आगे जाने के बजाय हमारे रजवाहों में चला आता था। ये प्रक्रिया गैरकानूनी थी। इसलिए गांव के लोग चुपके से ये काम रात में करते थे। अगले दिन दूसरे गांव वालों के पता चलने तक हमारे खेतों को काफी पानी मिल जाता था। इस गास देने को लेकर कई बार दो गांवों में लड़ाई भी हो जाती थी। वहीं नहर की पेट्रोलिंग करने वाला पेट्रोल भी पता चलने पर कई बार गांव  वालों पर जुर्माना करने आ जाता था।
जरा हौले गाड़ी हांक रे मेरे राम गाड़ी वाले – मैंने देखा तो नहीं है पर गांव के लोग बताते हैं कि दादाजी जवानी के दिनों  खेती के अलावा गाड़ीवान का भी काम करते थे। दो मजबूत बैल थे उनके पास। बैलगाड़ी पर बोरे लाद कर कुदरा बाजार ले जाते। उधर से खाद बीज या दूसरे सामान लाद कर गांव लेकर आते। किसी जमाने में मेरे गांव के बड़े जमींदार शिवदेनी राय और मेरे दादा जी प्रयाग सिंह दोनों इलाके के मशहूर गाड़ीवान हुआ करते थे। पर उम्र बढ़ने के साथ दादा जी ने ये पेशा छोड़ दिया।

साधुओं का संग – बुढापे में दादा जी साधु प्रवृति के हो गए थे। वे  हालांकि दीक्षा लेकर साधु नहीं बने पर उनके कई दोस्त मित्र साधु बन चुके थे। उनका हमारे घर आना जाना लगा रहता था। तुर्की गांव के सालिकदास, दुर्गानाथ, रामनाथ बाबा साधु बन गए थे। वे लोग अक्सर हमारे घर आते। दादा जी उनके साथ देर तक धर्म चर्चा करते।

कोई राहगीर प्यासा न जाए - दादा जी का सख्त निर्देश था कि हमारे दलान से होकर कोई भी राहगीर गुजरे तो उसे गुड़ खिलाया जाए और पानी पिलाया जाए। दलान पर एक पीतल का लोटा और मेटा में गुड़ हमेशा रखा रहता था। दादा जी जब दलान पर मौजूद होते और कोई राहगीर जा रहा होता तो उसे रोककर जल पीने और थोड़ा सुस्ता लेने के बाद आगे जाने का आग्रह करते। मेरे बचपन में गांव-गांव को जोड़ने वाली सड़कें तो थी नहीं। तो हितई-गनई में जाने का एक मात्र तरीका पैदल यात्राएं करना था।

आसपास के दस बीस गांव हर बिरादरी के ज्यादातर लोग मेरे दादाजी को नाम से जानते थे। उन्हें कई बार पंचायती करने के लिए बुलावा भी आता। तो रिश्ते नाते के लड़कियों की शादी में वे अगुवा की भूमिका निभाया करते थे।  
दादा जी ऐसे घुमक्कड़ थे कि शाहाबाद जिले के लगभग हर गांव में वे जा चुके थे। कैमूर की पहाड़ी में गुप्ता बाबा के धाम की यात्रा जब मुश्किल हुआ करती थी तब वे बाबा के दर्शन करने जा चुके थे।

किस्सागोई के तो वे उस्ताद थे। जब कहानियां सुनाना शुरू करते तो उनके यादों की पोटली घंटों खत्म नहीं होती थी। अपनी कहानियों में वे किसी पेड़ पर चढ़कर पेड़ को ही हांक दिया करते थे। इस पेड़ से ही वे दो बार बर्मा के रंगून शहर में चले गए थे। उनकी जुबां पर रंगून और कोलकाता, पटना के अनगिनत किस्से हुआ करते थे।
-         -- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( (SOHWALIA DAYS 21, DADA JEE, PRAYAG SINGH, BIHAR ) 

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