Sunday, August 23, 2020

डॉक्टर महमूद और बैकुंठ में दादा जी

महमूद डाक्टर नाम था उनका। हमारे गांव की स्वास्थ्य सेवा उनके जैसे ही कुछ डाक्टरों के हवाले थी, जिन्हें आज के शब्द में हम झोला छाप डाक्टर कहते हैं। ये डाक्टर साइकिल से या पैदल अपना दवाओं का एक बैग लेकर गांव गांव में दौरा करते थे और दवाएं देकर जाते थे। तो महमूद डाक्टर शहर गांव से आते थे।
वह जनवरी की एक सर्द सुबह थी। जब मेरे दादा जी इस दुनिया को छोड़कर चले गए। आठ जनवरी को सुबह 10 बजे उनका निधन हुआ। हमलोगों ने महनार में गंगा तट पर उनका अंतिम संस्कार किया।

तब हमलोग वैशाली जिले के जन्दाहा में रहते थे। मैं आठवीं कक्षा का छात्र था। मेरे एक रिश्तेदार रामनारायण सिंह के साथ अपने गांव सोहवलिया जाना हुआ दिसंबर के आखिरी हफ्ते में। रामनारायण सिंह का गांव समहुता है। हमारे सोहवलिया से एक मील उत्तर। हमलोग गांव से लौटे तो कई बोरियां चावल लेकर। ये चावल हमारे खेतों का था। अक्सर वैशाली जिले में रहते हुए भी हमलोग हर साल अपने खाने के लिए चावल गांव से लेकर जाते थे। हाजीपुर तक रामनारायण सिंह हमारे साथ रहे। वहां से जन्दाहा जाने वाली बस में मुझे बिठा कर वे कन्हौली चले गए।





बस की छत पर हमारी दो क्विंटल चावल की चार बोरियां लाद दी गई थीं। बस जन्दाहा के नीम चौक पर रुकी। मैंने पलदारों से चावल की बोरियां उतरवाईं और रिक्शा में बैठकर अपने आवास पर पहुंच गया। तब हमलोग जन्दाहा में मुख्य चौक पर सत्यदेव सोमानी के मकान में रहते थे। उसी मकान में उपर ग्रामीण बैंक की शाखा थी। घर पहुंचने पिता जी ने  बताया कि दादाजी बहुत बीमार हैं। शायद तुमसे मिलने के लिए ही जीवित हैं। सचमुच इसके कुछ दिनों बाद दादा जी गुजर गए। पर उन्हें अपनी मृत्यु का एहसास हो गया था। मृत्यु से दो घंटे पहले दादा जी ने पिता जी को बिठाकर एक घंटे तक गांव-गिरांव खेतीबाड़ी और यहां तक कि मेरे श्राद्ध कर्म को कैसे करना किन लोगो को बुलाना सब कुछ बता दिया था।

तो नौ जनवरी को हमलोग सपरिवार एक बार फिर गांव चल पड़े दादा जी का श्राद्ध कर्म करने के लिए। जन्दाहा से हाजीपुर फिर पटना। पटना से सासाराम। सासाराम से कुदरा। कुदरा से दो तांगे आरक्षित किए गए अपने गांव के लिए। शाम ढलते हमलोग गांव पहुंच चुके थे। अगले दिन से दादाजी के श्राद्ध कर्म की तैयारियां होने लगी।

तो दादाजी जिन लोगों को आमंत्रित करने को कहा था उनमें डॉक्टर महमूद भी एक नाम था। वे शहर गांव के रहने वाले एक झोला छाप डॉक्टर थे। उनके कहे अनुसार हमने श्राद्ध भोज में उन तमाम गांव के लोगों को न्योता भेजवा दिया। भोज में वे तमाम लोग आए भी। पर महमूद डाक्टर नहीं पहुंचे। चार दिन बाद हमलोग शहर वापस लौटने वाले थे। उसके एक दिन पहले दुपहरिया में महमूद डाक्टर पहुंचे। पहुंचते ही बताना शुरू किया। जरूरी काम से कई दिनों से बाहर गया हुआ था। लौटा तो प्रयाग भैया के श्राद्ध कर्म की जानकारी मिली। मैं अभी अभी भागा चला आ रहा हूं। उसके बाद महमूद डाक्टर ने आधे घंटे तक मेरे दादा जी को अपने शब्दों में कई तरह से याद किया। वे मेरे दादा जी से उम्र में छोटे थे इसलिए भैया कहते थे।

डॉक्टर महमूद बार-बार दुख जताते रहे कि मैं भैया के काम में नहीं पहुंच सका। खैर वे बोले की भोज में का कुछ भी बचा हो तो लाओ दो मैं खाउंगा। हमलोगों ने घर में तलाशी ली सब कुछ खत्म हो गया था, पर गुलाब जामुन बचे हुए थे। हालांकि डाक्टर महमूद को चीनी की बीमारी थी, फिर भी उन्होंने दादा जी के नाम पर दो गुलाब जामुन गटक लिए।

हमें यह दृश्य देखकर आत्मिक प्रसन्नता हो रही थी। साथ ही श्राद्ध के समय का वह नजारा भी मेरी आंखों के सामने था, जब महामात्र ब्राह्मण अपने इच्छा के मुताबिक दान नहीं मिलने पर लोटे से जल गटकने से पहले तमाम नखरे कर रहा था। उसका कहना कुछ ऐसा था कि अगर मैंने ये जल नहीं गटका तो आपके दादा जी को बैकुंठ में जगह नहीं मिलेगी। मानो वो रास्ते में लटके रह जाएंगे। पर अब डॉक्टर महमूद के बासी गुलाब जामुन गटक जाने के बाद मैं निश्चिंत हो गया कि दादा जी को जरूर बैकुंठ  में उत्तम स्थान प्राप्त हो गया है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( (SOHWALIA DAYS 20, DR MAHMOOD, SHAHAR, BAKASRA ) 

4 comments:

  1. ब्राह्मण आज भी ऐसे ही करते हैं व्यवहार। आपको नीम चौक भी याद है। बाजार अब कुछ बड़ा हो गया है।

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    1. हां जी गुजरे हैं हम उन राहों से

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  2. बहुत मार्मिक संस्करण।

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