Wednesday, August 19, 2020

मेरी पहली शिक्षिका मेरी मां और मनोहर पोथी

आजकल शहर के स्कूलों में बच्चे प्ले वे, नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी पढ़ने के बाद पहली कक्षा में जाते हैं। पर मैंने इन सब कक्षाओं में पढ़ाई नहीं की। सीधे दूसरी कक्षा में नामांकन हुआ वह अक्तूबर के महीने में। जब मैं पिता जी के साथ कन्हौली जिला वैशाली पहुंचा तो वहां जय प्रभा शिशु विकास विद्या केंद्र का छात्र बना। दिसंबर में वार्षिक परीक्षा देकर जनवरी में तीसरी कक्षा मे आ गया। बिहार में तब सालाना परीक्षाएं दिसंबर में ही हुआ करती थीं।

तो ये प्ले वे से लेकर दूसरी कक्षा तक की मेरी सारी पढ़ाई ज्यादातर घर में ही हुई। और मेरी पहली शिक्षिका थीं मेरी मां। वैसे तो मां ने सभी बच्चों को बड़े लाड़ प्यार से पाला है। पर एक शिक्षिका के तौर पर वे बड़ी कठोर रहती थीं। सोहवलिया गांव में जब मैंने होश संभाला तो अक्षर ज्ञान कराने का पहली जिम्मेवारी मेरी मां के ही जिम्मे थी। पिताजी अपनी नौकरी के सिलसिले में बाहर ही रहते थे।

बिहार में ज्यादातर बच्चों की तरह मेरी भी पहली किताब मनोहर पोथी थी। वह एक ऐसी किताब होती थी जिसमें हिंदी के स्वर व्यंजन, शब्द संयोजन, गणित की गिनती पहाड़ा और अंग्रेजी के एबीसीडी सबका ज्ञान होता था। मां सुबह का खाना बनाने के बाद दोपहर में मेरी कक्षा लगातीं। स्लेट पेंसिल से पहले गिनती, फिर पहाड़ा, क ख ग घ से लेकर सारा अक्षर ज्ञान फिर अंग्रेजी के एबीसीडी के कैपिटल और स्माल लेटर लिखना सब मां ने ही सीखाया। मां कुछ इस तरह पढ़ाते समय अनुशासन में रखतीं। अगर 12 का पहाड़ा याद नहीं हुआ तो आज दोपहर का खाना नहीं मिलेगा। इस तरह मैंने 30 तक का पहाड़ा याद कर लिया।

जब मैंने मास्टर जी की पिटाई कर डाली -  वैसे तो मुझे गांव में स्कूल भेजने की कई कोशिशें हुईं पर वे ज्यादा सफल नहीं रहीं। मेरे अपने गांव में एक स्कूल था। उसमे एक ही शिक्षक थे। उनका नाम क्या था मालूम नहीं पर वे जाति से भाट थे इसलिए उन्हें इसी नाम से जाना जाता था। स्कूल का कोई भवन नहीं था। इसलिए स्कूल गांव के मंदिर के बरामदे में लगता था। मैं अपना टाट पट्टी (बोरा) लेकर स्कूल जाता। एक दिन मास्टर साहब ने मुझे झ लिखने को कहा। पर मैंने झ दूसरे तरीके से लिखा भ में सूंड लगा कर पर वे मुझे झ इस तरह लिखने को कह रहे थे। मैंने कहा, मेरी मां ने ऐसे ही सीखाया है। यही सही है। मास्टर साहब ने कहा मैं जो बता रहा हूं वह भी सही है। ऐसे भी लिखो। मैंने कहा नहीं मेरी सही है।

इस पर मास्टर जी ने छड़ी उठाई और मुझे दो छड़ी पीट दिया। मुझे गुस्सा आया। कुछ मिनट मैं मौका देखता रहा। जैेसे ही मास्टर जी ने नजर दूसरी तरफ फेरी अचानक मैंने मास्टर जी की छड़ी उठाई और उससे तड़ातड़ उन्हें चार छड़ी पीट डाला। बदला लेने के बाद मैं सावधान था। तुरंत अपना बस्ता उठाया और पंजाब मेल की गति से अपने घर की ओर भागा। मां ने स्कूल से समय से पहले आने का कारण पूछा। मैंने सच सच बता दिया। मां की क्या प्रतिक्रिया रही ये मुझे याद नहीं। पर अब उस मंदिर वाले स्कूल में तो जाने का कोई मतलब नहीं था। किसी काम से स्कूल के आसपास फटकता तो गांव के  बच्चे रोककर पूछते, क्यों तुमने गुरुजी को क्यों मारा था। मैं उन बच्चों से बचकर भागता। हालांकि वह भाट गुरुजी बाद में पिता जी को मिले तो उन्होंने कहा, अपने बच्चे को फिर से पढ़ने को भेजें। मुझे कोई नाराजगी नहीं है। पर मैं डर के मारे उस स्कूल में दुबारा नहीं गया।

आज तुम रिबन बांध कर क्यों नहीं आई-  अब मैंने बसपुरा के प्राथमिक विद्यालय में जाना शुरू किया। यह बड़ा स्कूल था। वहां मेरी दादी मास्टरनी थीं। तो मैंने उनके साथ बसपूरा के उस स्कूल में जाना शुरू कर दिया। इस स्कूल में कई शिक्षक थे। अलग-अलग कक्षाएं भी थीं। स्कूल का अपना भवन भी था। तो मेरी क्लास में एक सुंदर सी लड़की आती थी। वह बालों में दो रिबन बांध कर पोनी टेल बनाती थी। मैं उसके बगल में बैठता था और शरारत में उसके रिबन खोल देता था। वह गुस्सा खाती। मुझे उसका गुस्सा देखकर अच्छा लगता। अगले दो तीन दिनों तक मैं उसके रिबन खोलता रहा। एक दिन वह कक्षा में आई पर उसने रिबन नहीं बांध रखा था। मैंने उससे पूछा आज रिबन क्यों नहीं बांधा। उसने जवाब दिया क्यों, खोलने के लिए। मैं बड़ा दुखी हुआ। मन आत्मग्लानि से भर आया। फिर कुछ ऐसी घटनाएं हुई कि मैंने दादी के उस स्कूल में जाना भी छोड़ दिया।

कुछ दिनों बाद मैं पड़ोस के गांव सोहवलिया कलां से प्राथमिक विद्यालय में जाना शुरू किया। वहां भी एक शिक्षक थे। गया मास्टर। वे किसी दूर के गांव से रोज पैदल चलकर आते थे। इस स्कूल का भी कोई भवन नहीं था। स्कूल आम के बागीचे में पेड़ के नीचे लगता था। मास्टर साहब एक मचिया पर बैठते थे। हमलोग बोरियां बिछाकर जमीन पर। किसी दिन मास्टर काफी देर तक नहीं आते तो स्कूल की कक्षाएं शून्य हो जातीं। कुछ महीने इस स्कूल में मेरी पढ़ाई चलती रही। यहां मेरा एक दोस्त भी बना, अखिलेश कुमार दूबे। पर वह कुछ दिनों बाद बोकारो स्टील सिटी चला गया। अपने पिताजी के पास। इस स्कूल में मेरी पढ़ाई भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई।

इस बीच चाहे में जिस स्कूल में भी जाउं, मेरी मां की घर में पढ़ाई लगातार जारी रही। गणित को आसानी से समझने के लिए मां ने मुझसे मिट्टी की 100 छोटी-छोटी गोलियां बनवाई। इन गोलियों को धूप में सुखाया। फिर आग में पकाया। अब इन गोलियों से की मदद से जोड़ और घटाव सीखता था। आगे मां ने मुझे गुणा भाग भी इन्ही गोलियों की मदद से सीखाया। साल के 12 महीनों और दिनों के नाम हिंदी अंगरेजी में भी रटवाए। इसी बीच साल 1978 का दशहरा आया। इन छुट्टियों में पिताजी जब गांव आए तो उन्होंने कहा, विकास अब मेरे साथ जाएगा। आगे की पढ़ाई वहीं करेगा। और हमने सोहवलिया छोड़ दिया। पर वह मंदिर के बरामदे में और पेड़ की छांव में लगने वाले स्कूल हमेशा स्मृतियों की आंगन में अब भी विचरण करते रहते हैं।
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य
 (SOHWALIA DAYS 18, MY SCHOOLS, BASPURA, RIBBON GIRL ) 
मां के साथ एक पुरानी तस्वीर, अंदरकिला, हाजीपुर के दिनों की। 

5 comments:

  1. बचपन की और विद्यालयों की सुनहरी यादें। आपका नाम विकास है यह जानकर अच्छा लगा। विकास से विद्युत बनने के सफर के पीछे क्या कोई कहानी है? अगर है तो अवश्य बताएँ। आभार।

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    1. पहले नाम रखा गया था विकास रंजन. अभी रिश्तेदार यही नाम जानते हैं। दूसरी कक्षा में नामांकन के समय पिता जी ने नाम बदल दिया.

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  2. आप तो बचपन में गजब क्रांतिकारी थे भाई ! 👍🏻😁

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  3. बहुत बेहतरीन जो कि आपको अक्षरशः स्मृत भी है।

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