Saturday, August 15, 2020

दादा जी के साथ भोज खाने का आनंद


घर में भोजन तो आप रोज करते हैं, पर भोज में पांत में बैठकर खाने का आनंद कुछ और ही होता है। दही बड़े, पूड़ियां, पुलाव, मिठाई और भी बहुत कुछ। बचपन में जब मैंने समाज को समझना शुरू किया तभी से मुझे भोज में खाने में बड़ा आनंद आता था। धुंधली सी याद आती है, गांव में सरिता फुआ की शादी हुई थी। पहली बार मैंने गांव में एंबेस्डर कार आती देखी। उसमें दुल्हन बनी फुआ चलीं गईं। पर उनकी शादी का भोज याद रहा।

मुझे जब भी पता चलता की आसपास के गांव में कहीं भोज है। उसमें दादा जी जा रहे हैं, तो जाने के लिए मन मचल उठता। मैं दादा जी को कहता मैं भी चलूंगा आपके साथ। चाहे गांव कितनी दूर क्यों न हों। एक बार अपने टोला में एक चाचा के तिलक के भोज में मेरी इच्छा और दही बड़ा लेने की थी। पर दही बड़ा बांटने वाले मेरे आवाज लगाने के बाद भी आगे बढ़ गया। मैं पांत से उठकर दौड़ा और उसे रोका। मेरे इस दही बड़ा प्रेम का गांव के लोग लंबे समय याद करके मजाक उड़ाते रहे।

मैं कोई चार पांच साल का रहा होउंगा। दादाजी तुर्की गांव में एक भोज में जा रहे थे। मैंने कहा मैं भी चलूंगा। तुर्की मेरे गांव से पैदल पांच किलोमीटर का रास्ता। मेरे दादा जी मुझे ले नहीं जाना चाहते थे। पर मैं जिद पर अड़ गया। दादा जी की उंगली पकड़े खेतों से होते हुए पैदल पैदल हमलोग चल पड़े तुर्की गांव की ओर। ये खेतों वाला रास्ता थोड़ा नजदीक पड़ता था। रास्ते में इस्माइलपुर के सीवान में एक खेतों के बीच एक छोटी सी कुटिया नजर आई। दादा जी वहां रुके। कुटिया में एक साधु बाबा रहते थे। वे दादा जी के दोस्त थे। उन्होंने हमें जल पिलाया। फिर हम आगे चल पड़े।

दोपहर होते होते हम तुर्की पहुंच गए। गांव के लोगों ने इसका नया नाम रखा था सुंदरबाग। सचमुच सुंदर था तुर्की। बचपन में मेरे सपनों के गांव सरीखा। दोपहर का भोज खाने के बाद। गांव में बच्चों के साथ हमने खूब धमा-चौकड़ी की। पर इसी बीच एक बस आई।
मेरे दादाजी उस बस में जा बैठे। मैंने पूछा कहां, वे बोले बारात जा रहा हूं। परसों लौटूंगा। तब तुम यहीं रहो। बुधन चाचा के घर। बारात दूर जा रही है इसलिए तुम्हें बारात में नहीं ले जाउंगा। बारात जा रही है सासाराम के पास उचितपुर गांव। तुर्की गांव के बच्चों के साथ खेलने में मेरा मन लग गया था। इसलिए मैंने बारात जाने की जिद नहीं की।

दिन तो खेलते कूदते गुजर गया। शाम गहराई तो मुझे भूख लग गई। जिस घर में मैं आया था, उसके सारे पुरुष सदस्य बारात में जा चुके थे। मैं घर के आंगन में गया। औरतें गप्प लड़ाने में व्यस्त थीं। चूल्हे पर खाना बन रहा था। पर उसे देखकर लग रहा था कि भोजन तैयार होने में देर है। उधर मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे। मैं घूमता हुआ पड़ोस वाले घर में चला गया। वहां क्या देखता हूं मेरे पिता जी के मित्र और मौसेरे भाई, भृगनाथ मास्टर साहब बैठकर खाना खा रहे हैं।
वे मेरे घर अक्सर आते थे तो मैं उनको पहचानता था। मैं उनके पास गया और बोला मैं भी खाऊंगा। वे बोल पड़े- तुम तो बारात वाले घर में आए हो। वहां रंग बिरंगे व्यंजन बन रहे हैं। मेरे घर में तो खाने में सूखी रोटी मिलेगी। मैंने कहा, मैं वहीं खाऊंगा सूखी रोटी ही सही। उनके बगल में मेरी थाली लग गई। खाने के बाद में मास्टर साहब के साथ ही उनके जाकर दलान में सो गया।

अगले दिन सुबह से शाम तक सुंदरबाग के खेत खलिहानों में बच्चों के साथ खेलता रहा। बुधन चाचा के मिट्टी के बने दो मंजिला घर के पीछे एक सुंदर सा तालाब था। तालाब के चारों तरफ कई किस्म के फूल खिले थे। इनमें वैजयंती का पौधा भी था। उसमें भी फूल खिले थे। अब वह तालाब नहीं रहा, पर उस हरे भरे तालाब का तस्वीर मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित है।


इस तुर्की गांव में हमारी एक फुआ रहती थीं। पंचरतना फुआ। वे बड़े स्नेह से बातें करतीं। इसी तुर्की गांव में रिश्ते में मेरे दादा लगने वाले तीन लोग ऐसे थे जो बुढ़ापे में साधु बन गए थे। साधु शालिकदास, साधु दुर्गानाथ और साधु रामनाथ। इन तीनों साधुओं के सानिध्य में बैठकर उन्हें सुनना काफी अच्छा लगता। वे लोग रामकथा सुनाते थे। अपने घूमंतु जीवन का वृतांत भी सुनाते थे। इसमें एक साथ बाबा कभी बिहार पुलिस में हुआ करते थे। तो कभी कभी उनका पुलिस जीवन याद आ जाता था। पर रिटायर होने के बाद उन्होंने साधु बनना पसंद किया। ये तीनों साधु बाबा लोग अपने गांव में अपने पुश्तैनी घर से अलग रहते थे। अपने कमंडल में पानी पीते। सधुकरी भाषा में बातें करते। एक दो लोग इनमें चिलम भी पीते थे।  

तीसरे दिन सुबह-सुबह बारात की बस लौट आई। उस बस में मेरे दादाजी भी लौट आए। थोड़ी देर बाद मैं दादा जी की उंगली पकड़े वापस लौट चला अपने गांव की ओर।
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(( SOHWALIA DAYS 16, ROHTAS, BIHAR, BHOJ AND BARAT ) 

2 comments:

  1. वाकई बहुत आनंददायक पल हुआ करते थे वे... हमने भी खूब मजा उठाया है.

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    1. हां जी, लॉकडाउन में उन दिनों को याद किया।

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