Thursday, August 13, 2020

कल्हुआड़ी में गर्म गुड़, राब और सिरका

आजकल हमारे गांव में गन्ने की खेती नहीं होती। पर हमारे बचपन में गन्ना लगाया जाता था। गांव के पास डीह में ही। हमारे खेतों मे भी हर साल कई कट्ठे में गन्ना जरूर लगाया जाता था। पर हमारे यहां से गन्ना चीनी मिलों में नहीं जाता था। ये गन्ना गुड़ बनाने के लिए लगाया जाता था।

जब पहली बार गन्ना बीज से लगाया जाता तो उसे नवधा कहते थे। बाद में पिछले साल के गन्ने से काटकर गन्ना लगाते तो उसे जरी कहते थे। जब गन्ना तैयार हो जाए तो खेत में जाकर गन्ना तोड़कर लाना और दिन दुपहरिया बैठ कर दांतो से छिल छिलकर गन्ना चूसना ये बचपन का प्रिय शगल था। जब गन्ना तैयार हो जाता तो उसे काटकर कल्हुआड़ी में लाया जाता जहां उससे गुड़ बनता था। हमारे गांव में एक सांझी कल्हुआडी हुआ करती थी। उसमें बारी बारी से हर घर के लोग गुड़ बनाते थे।

पहले बैलों को नाध कर गन्ने को पेरकर उससे रस निकाला जाता। इसमें हमारी भूमिका बैलों के पीछे पीछे चलकर उन्हें हांकने की होती या फिर मशीन के पास बैठकर उसमे गन्ना लगाने की। हमें दोनों काम में मजा आता। पर हमें इंतजार रहता है कड़ाह में गन्ने का रस डाल देने के बाद उसके पकने का। कड़ाह में उबलते रस के साथ हम कई प्रयोग करते थे।

कई बार खेत से ताजे आल निकालकर उसमे सूई से कई छेद करने के बाद आलू को रस्सी से बांध कर कड़ाह में छोड़ देते। रस से गुड़ तैयार होने में कई घंटे लगते हैं। इस दौरान आलू पक जाता था और उसमे गुड़ की मिठास अंदर तक चली जाती थी। ये मीठा आलू खाने में खूब मजा आता। जब गुड़ बिल्कुल तैयार हो जाता था, तब हम भी तैयार रहते थे। गर्मा गर्म गुड़ खाने के लिए। उसकी सोंधी खुशूब और स्वाद का तो कहना ही क्या। महंगी मिठाइयों में भी वह मजा कहां है जो गर्मा गर्म गुड़ खाने में है। कभी आपको मौका मिले तो किसी कल्हुआड़ी में खाकर देखिएगा ना।

राब और रोटी खाना - मेरे दादा जी गुड़ बनने की प्रक्रिया में राब निकालते थे। दरअसल गुड़ जब बनने की प्रक्रिया में रहता था तभी उसके ठोस बनने से पहले जेली अवस्था में निकाल लिया जाता था। यह जेली अवस्था का गुड़ ही राब कहलता है भोजपुरी में। इसे किसी मिट्टी के घडे में रखा जाता था। मुझे इस राब के साथ रोटी खाना खूब पसंद था। जिस दिन सब्जी पसंद की नहीं बनी हो मैं राब और रोटी खाने की मांग करता था।

गन्ने का सिरका - दादा जी गुड़ से सिरका बनाकर भी बोतल में भर कर रखते थे। ये सिरका कई तरह के दवाओं में काम आता था। ये सिरका बनता कैसे है। गन्ने को रस को किसी घड़े में भरकर रख दिया जाता था। उसके मुंह पर कपड़ा बांध दिया जाता था। इस घड़े को तकरीबन एक महीने तक रोज धूप में रखा जाता है। इस प्रक्रिया में सिरका तैयार होता है। इसे छानकर बोतल में भरकर रख लिया जाता है। आपको पता है कि गन्ने का सिरका रक्त वसा को नियंत्रित करता है। वहीं, वजन घटाने और बढ़े हुए लिवर को भी घटाने में काफी कारगर है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SOHWALIA DAYS 15, SUGERCANE, SIRKA ) 

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