Saturday, August 1, 2020

धूप भरी छत पे बरस गया पानी...


बहुत दिनों बाद मूसलाधार बारिश में भींगने का संयोग बन गया। दिलशाद गार्डन में पिता पुत्र कुछ जरूरी सामान लेने गए इस बीच बादल घिर आए। इसके बाद तो बरसो राम धड़ाके से...खूब बारिश हुई साथ में तेज हवाएं भी। जब देर तक बरसता रहा तो इसी बारिश में भींगते हुए हम घर लौटे। दिल्ली वालों को बारिश बड़े नसीब से मिल पाती है। पर ज्यादा बारिश होती है तो दिल्ली वाले परेशान से हो जाते हैं। क्योंकि उनके पास बारिश के पानी को रोक पाने का कोई तरीका नहीं है। वैसे साल के बाकी दिनों दिल्ली वाले पानी के लिए तरसते भी हैं।
तो दिल्ली में ऐसी बरसात हो रही थी, ऐसी बरसात हो रही थी मानो ..
किसने भींगे बालो से झटका पानी
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी

इस पानी के बीच मुझे अपना सुहाना बचपन, हंसता बचपन, मुस्कुरात बचपन याद आने लगा। तब तो हम बारिश का इंतजार करते थे। आसमान में बादल घुमड़ते देखकर कर खुशी होने लगती थी। हम बादलों का रंग देखकर बता देते थे कितनी तेज बारिश होने वाली है। जब देर तक बारिश नहीं आती तो हम बारिश को बुलाते थे अपने अंदाज में। 
एक मुट्ठी सरसों...बरखा रानी जमके बरसो। 
और बरखा रानी बरस जाती थीं। कभी कभी तो बरखा रानी इतना बरसती थीं कि शाम को बैठने की जगह नसीब नहीं हो पाती थी। तो रात को सोने के लिए मुफीद जगह नहीं मिल पाती थी। 
मानसून में गाजियाबाद के एनएच 9 से बरसता पानी। 

गांव में हमारा मिट्टी का घर था। उसकी छत खपरैल थी। बारिश के दिनों में जब झड़ी लग जाती थी तो हमारी खपरैल छत जगह जगह चूने लगती थी। एक ऐसी बारिश की शाम याद आती है। आंगन पानी से भर चुका था। बरामदे में जगह जगह पानी था। कोई साबूत जगह नहीं बची थी जहां बैठकर मैं रात का खाना खा सकूं। तो मेरी रिश्ते की दादी ने बड़ी मुश्किल से मेरे लिए बैठने की जगह बना सकीं। यह बारिश कुछ ऐसी थी , चंदन दास की गाई गजल की तरह –
धूप भरी छत पर बरस गया पानी... 
आंगन में आके अंगीठी बुझा के 
नागन सा लहरा के डंस गया पानी।

पर इस पानी से हमें कोई शिकायत नहीं थी। क्योंकि हम जानते थे जितने ज्यादा बादल बरसेंगे हमारे खेतों को उतना ही पानी मिलेगा। और धान की फसल भी उतनी ही अच्छी होगी। एक बचपन की  बारिश याद आती है। इतना बरसा इतना बरसा कि नौ दिन तक सूरज के दर्शन ही नहीं हुए। कभी पूरब से बादल आते तो कभी उत्तर से.... तड़ तड़ तड़ तड़....घड़ घड़ घड़ घड़ और टिप टिप बरसा पानी। 
और हम इस बारिश में खूब भींगते। घंटों बारिश के पानी में नहाते रहते थे। जब दादा जी या मां की फटकार लगती तब घर में आते। 

वह भी क्या बारिश के दिन थे ना। कई सालों बाद 1991 में कांवर लेकर जब बोल बम की पदयात्रा पर गया तो बारिश में कई घंटे भींगता रहा। इसके बाद एक बार और कर्नाटक के कुर्ग में बारिश में लगातार दो दिन भींगता रहा। तब एक बार फिर गांव की वह नौ दिन की बरसात याद आ गई। दिल्ली के लोगों को भी बारिश के पानी की अहमियत समझनी चाहिए। इसे संजो कर रखने का उपाय करना चाहिए।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(DELHI, RAIN, WATER ) 

2 comments:

  1. नौ दिन की बरसात !!! 😳 इसपर एक लेख जरूर लिखें

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