Monday, August 31, 2020

ब्रह्मभोज और रामनाथ बाबा की याद


सासाराम से वाराणसी जाने के लिए दोपहर बाद पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया हूं। डिब्बे में थोड़ी भीड़ है। एक जगह थोड़ी सी जगह बनाकर खड़ा होकर सफर काटने लगा। कुछ स्टेशन गुजरने के बाद कुदरा में ट्रेन रूकी। मैं एक बार फिर हशरत भरी निगाह से आपने गांव के निकटम स्टेशन को देखता हूं। इस बीच सामने वाले सीट पर बैठे सज्जन से बातचीत शुरू हो जाती है। वे बताते हैं कि मैं भभुआ रोड उतर जाउंगा तब आप मेरी सीट पर बैठ जाना। बातों बातों में उन्होंने बताया कि वे डेहरी ओनसोन से आगे नासरीगंज की तरफ किसी गांव के रहने वाले हैं। मैंने बताया कि मेरा गांव सोहवलिया है तो बोल पड़े क्या रामनाथ सिंह वाला सोहवलिया। मैंने कहां, हां। मैंने पूछा आप रामनाथ सिंह को कैसे जानते हैं। वे बोल पड़े मेरे गांव में, मेरे घर में उनकी ननिहाल हुआ करती थी।

रामनाथ सिंह का नाम सुनते हैं मेरी स्मृतियों के आंगन में सैकड़ों दीप जल उठे। रामनाथ सिंह मेरे गांव के सबसे बड़े खेतिहर (जमींदार) थे। गोरा चिट्टा चेहरा, लंबी कद काठी। शानदार धोती कीमती कलफ वाला कुर्ता और सिर पर कई बार विशाल पगड़ी बांधे जब वे सड़क पर चलते तो सिर्फ वही नजर आते थे।
वैसे तो वे मेरे दादाजी से उम्र में छोटे थे पर मैं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करता था। उनका घर नहर के उसपार था और मेरा नहर के इस पार। कई बार वे सुबह टहलते हुए हमारे दलान पर आ जाते। मैं उन्हें अपने बबूल के पेड़ से तोड़ कर दातून पेश करता। वे खुश होकर चले जाते। मेरे प्रति उनका बड़ा स्नेहिल भाव रहता था। रामनाथ बाबा मेरे परिवार के लिए काफी मददगार भी थे। वैसे तो उनकी लंबी चौड़ी खेती थी। पर वे सूद पर पैसा लगाने का भी काम करते थे। पर कभी किसी से जबरदस्ती वसूली नहीं करते। वे बड़े रहमदिल इंसान थे। इसलिए आसपास के कई गांवों तक उनका सम्मान था। इसलिए तो सोहवलिया गांव को उनके नाम से जाना जाता था। हमारे गांव के राजपूत लोग राय उपाधि भी लिखते हैं। इसलिए उनका नाम रामनाथ राय भी कहा जाता था। एक उनके पड़ोसी हुआ करते थे शिवदेनी राय। रामनाथ बाबा के पास सन 1980 से पहले मेसी फार्गूसन ट्रैक्टर और राजदूत मोटरसाइकिल हुआ करती थी। उनकी गौशाला में इतनी गायें थी कि सालों भर उनके घर दूध  होता था।

दादी से मट्ठा लेकर आया -  मैं कोई पांच साल का रहा होउंगा। एक बार मेरी इच्छा दही बड़े खाने की हुई। मैंने मां से फरमाइस की। उन्होंने कहा, इसके लिए छाछ ( मट्ठा) चाहिए। हमारे पास उस समय कोई लगहर (दूध देने वाली) गाय नहीं थी। मां ने सलाह दी। मैं तुम्हें तीन डिब्बे वाला खाली टिफिन कैरियर देती हूं। तुम इसे लेकर रामनाथ बाबा के घर चले जाओ। सीधे घर के अंदर आंगन में जाना। वहां दादी से मिलना। अपने दादा जी का नाम बताना और दादी से मट्ठा मांगकर ले आना। मैंने ऐसा ही किया। सोहवलिया गांव के बीचों बीच रामनाथ बाबा का विशाल दो मंजिला घर था। मैं वहां पहुंचा तो रामनाथ बाबा अपनी मोटरसाइकिल की सर्विसिंग में व्यस्त थे। मैं उन्हे प्रणाम करके घर के अंदर घुस गया। दादी से पहली बार मिला था। अपना परिचय दिया – प्रयाग सिंह का नाती हूं। मां ने कहा, आप मेरे इस टिफिन के तीनो डिब्बों मे मट्ठा भरकर दे दिजिए। दादी ने अपने घर के लोगों को कहकर मुझे मट्ठा दिला दिया। मैं झूमता हुआ टिफिन कैरियर लेकर अपने घर पहुंचा। मां ने दही बड़े (फुलौरा) बनाया। मैंने खाया।
गांव छोड़कर जाने के बाद रामनाथ बाबा से मिलना बहुत कम हो गया। पर उनकी यादें हमेशा बनी रहीं। रामनाथ राय के एक बेटे हुए करते थे जीत नारायण सिंह। वे एमबीबीएस डाक्टर थे। पिता की तरह ही लंबी कद काठी वाले सुंदर व्यक्तित्व के स्वामी थे। कसरती शरीर वाले बड़े साहसी व्यक्ति थे। एक बार डेहरी ओनसोन के पास इंद्रपुरी जलाशय में वे स्नान करने उतरे। पानी के भंवर में फंस गए तो फिर निकल नहीं सके। उनका दुखद अंत हो गया। रामनाथ बाबा के जीवन का वह काफी दुखद समय रहा होगा। जब जवान डॉक्टर बेटा उन्हें छोड़कर चला गया।

सन 1994 की बात है। मैं बीएचयू में पढ़ता था। इसी दौरान एक बार अपने गांव पहुंचा। गांव में दुखद संदेश मिला कि कुछ दिन पहले रामनाथ बाबा का देहांत हो गया। मेरे सामने किसी फिल्म के दृश्य की तरह उनके अनेक चेहरे घूमने लगे। एक दिन बाद ही उनका श्राद्ध कर्म था। तो मैं रुक गया उसमें शामिल होने के लिए।

सुबह-सुबह का नजारा था। दूबे के सोहवलिया से ब्राह्मण परिवार के सदस्य श्राद्ध के ब्रह्म भोज में खाने के लिए रामनाथ बाबा के दलान की ओर प्रस्थान करने लगे थे। अस्सी नब्बे साल के बुजुर्ग, जवान और बच्चे सभी जा रहे थे। वे बच्चे भी चल पड़े थे भोज मे खाने के लिए जिन्होंने अभी अभी चलना सीखा था। तो कुछ ब्राह्मणों के बच्चे तो अपने पिता के गोद में भी चले जा रहे थे। मैंने चाचा से पूछा इतने सारे लोग। चाचा बोले रामनाथ बाबा गांव के सबसे अमीर किसान थे। उनके मृत्यु भोज में सारे ब्राह्मणों को भोज के बाद कुछ न कुछ उपहार भी मिलेगा। इस उम्मीद में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।

दोपहर में पहले ब्राह्मण भोज उसके बाद आम लोगों के लिए भोज होना था। मैं दोपहर तक रामनाथ बाबा के दरवाजे पर पहुंच गया। अभी ब्राह्मण भोज चल ही रहा था। इसके बाद हमलोगों की बारी आनी थी।

ब्राह्मणों की पहली पांत भोज खाकर उठ गई। सभी पंडितों को एक गमछा, एक थाली, एक किलो चावल और कुछ रुपये नकद दिए जा रहे थे। अब खाने के लिए ब्राह्मणों की दूसरी पांत बैठी। फिर तीसरी पांत। कोई पांच सौ ब्राह्मणों ने भोज खा लिया होगा। पर अंतिम पांत वाले लोगो के लिए थाली और गमछा घट गया। क्योंकि उम्मीद से ज्यादा पंडित लोग भोज में पहुंच गए थे।

घर के लोगों ने अंत खासकर ब्राह्मण परिवार के बच्चों को सिर्फ एक किलो चावल और नकद पैसे बांटना शुरू किया। जिन्हे थाली और गमछा नहीं मिला वे बच्चे थोड़े दुखी थे। ब्रह्म भोज खत्म हो चुका था। थोड़ी देर में वे बच्चे जिन्हे थाली और गमछा नहीं मिला था, अपनी ही उम्र के उन बच्चों से जिन्हें थाली और गमछा मिल गया था, लड़ने लगे। जो मजबूत पड़ा उसने मारपीट कर कमजोर बच्चों से थाली गमछा छीन लिया। यह सब कुछ देखकर मैं सोचने लगा, मृत्यु के बाद भला ब्रह्मभोज क्यों होता है। इसलिए न कि मृतआत्मा को तृप्ति मिले। तो क्या थाली और गमछे की लड़ाई का ये नजारा देखकर रामनाथ बाबा की आत्मा को तृप्ति मिल रही होगी। शायद नहीं।
-         ---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( (SOHWALIA DAYS 24, RAMNATH SINGH, BUTTER MILK, CHHACH ) 

Saturday, August 29, 2020

जेठ की दुपहरी में - आम का घुमउवा

गरमी की चिलचिलाती दोपहरी में चुपके से घर से भाग कर बागीचे मे जाकर आम तोड़ना और उससे घुमउवा बनाकर खाना। क्या गजब का शौक था। पांच छह साल की उम्र में जब मेरी मां मुझे आंगन के बरामदे में बिठाकर पढ़ाया करती थीं। वह जेठ की दुपहरी हुआ करती थी। पर मेरा मन पढ़ाई में कम आम के बागीचे में ज्यादा लगता था। हमारा पड़ोसी था लाल बहादुर। चाचा जी का बेटा। उससे मेरी इशारों में सुबह ही सेटिंग हो जाती थी। मां मुझे सबक देकर कमरे में आराम करने चली जातीं। मैं मौका देखकर दबे पांव बाहर की ओर बढ़ता। हौले से दरवाजा खोलकर गली में दौड़ लगाकर फरार। कई बार मां आवाज लगाती थीं। पर मैं इतनी दूर निकल चुका होता था कि मां पकड़ नहीं सकती थीं। मैं ये जानता था कि मां मुझे ढूंढते हुए बागीचे तक नहीं आएंगी। वे गांव की बहू थीं, इसलिए घर से ज्यादा दूर नहीं निकलती थीं। लौटने पर पिटाई होती थी, पर बगीचे में मौज के बीच ये पिटाई स्वीकार्य थी।

जेठ की दुपहरी में तापमान 45 डिग्री के पार रहता होगा। हमलोग ढेला लेकर पेड़ पर लटक रहे कच्चे आमों पर निशाना लगाते। क्या निशाना था हमारा। पर आगे हम निशानेबाज या तीरंदाज नहीं बने। हमारी प्रतिभा को सही मार्ग पर नहीं मोड़ा जा सका। एक ही निशाने में कच्चे आम टूट कर नीचे गिर आते।

इन आमों को छिलके हटाने के लिए नहर में आने वाले घोंघे के खोल यानी सितुआ को पत्थर पर घिरकर हम छिलने वाला (पीलर) बना लेते थे। ये जुगाड़ था हमारे छुटपन का। आम को छिलने के बाद उसे टुकड़े टुकड़े काट कर उसमें थोड़ा नमक मिलाते थे। ये नमक हम पाकेट में रखकर घर से पहले से ही ले जाते थे। अब इस बारीक कटे हुए  आम को एक साफ कपड़े में बांध कर देर तक हवा मे गोल-गोल घुमाते थे। इस घुमाने के क्रम में आम और नमक आपस में अच्छी तरह मिल जाते थे। इस तरह तैयार हो गया आम का घुमउवा। ये किसी घर में बनने वाली डिश नहीं है। इसे हमने बगीचे में ही बनाना सीखा था। अपने से बड़े बच्चों से। अब इसे बगीचे में ही बैठकर धीरे धीरे देर तक हमलोग स्वाद लेकर खाते थे। कसम से उसमें जो स्वाद आता था न आजकल मिक्सी में पीसी हुई आम की चटनी में कहां आता है।

हरे चने का साग तो शहर में रहकर आपने खाया होगा। हम गांव में चने का साग खूब खाते थे। पर इससे भी ज्यादा आनंद आता था कि अपने साथ नमक लेकर खेत में चले जाएं। चने के पौधों से साग को तोड़ें और वहीं खेत में नमक के साथ धीरे धीरे साग को खातें रहें। चने के पत्तों में वैसे भी थोड़ा नमकीन स्वाद रहता है। पंजाब पहुंचने पर हमने सरसों का साग खाने का चलन देखा। पर हमलोग सरसों उगाते थे पर उसका साग नहीं खाते थे। पर चने का साग बड़े चाव से खाते थे। कच्चा भी और पकाकर भी। 

चने में जब हरे हरे दाने आ जाते थे, तब हमलोग उसे आग में भूनकर खाते थे। इस हो रहा कहा जाता है। चने को आग में भूनना फिर उस आग के ठंडा होने पर एक-एक दाना ढूंढ कर निकालना। उसके छिलके हटाकर नमक के साथ एक एक कर खाना। ये बड़ा टाइम पास था। खाते खाते मुंह राख से काला हो जाता था। पर होरहा का वह स्वाद निराला होता था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
 (SOHWALIA DAYS 23, MANGO, GRAM, CHANA) 
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Thursday, August 27, 2020

पुरइन का पत्ता और दशरथ मुसहर


उनका नाम था दशरथ मुसहर। बसपुरा गांव में नहर के पुल के ठीक बाद स्कूल से उल्टी तरफ मुसहरों की बस्ती है। दशरथ मुसहर इस बस्ती के मुखिया थे। वे मेरे दादाजी के हम उम्र रहे होंगे। जब वे आते थे तो दादा जी उन्हे सम्मान से बिठाते और उनके साथ चर्चा करते। जब मैं वहां पहुंचता तो वे मुझे दशरथ मुसहर को नमस्कार करने को कहते।
भले ही वे मुसहर थे लेकिन उनका नाम दशरथ था। मतलब उनके परिवार की राम जी और हिंदू संस्कृति में आस्था थी। दशरथ मुसहर चाल ढाल और देखने में किसी संभ्रांत ग्रामीण की तरह नजर आते थे और बातें किसी गुणीजन की तरह करते थे।

वैसे देखा जाए तो रोहतास जिले के मुसहर आदिवासी जैसे ही हैं। उनके पास खेती की कोई अपनी जमीन नहीं। मकान के नाम पर हर परिवार के पास एक एक फूस की झोपड़ी। कहा जाता है कि इनका नाम मुसहर इसलिए है कि वे चूहा ( भोजपुरी में मूस) पकड़ कर खा जाते हैं। हालांकि ये बात गले नहीं उतरती। हमारे यहां गरमी के बाद बारिश से पहले धान लगाने के लिए जब खेतो में पानी पहुंचाया जाता तो बड़ी संख्या में चूहे खेतों में बनाए अपने बिल से बाहर निकल आते थे। इस दौरान बहुत सी जातियों के लोग इन चूहों के पकड़ कर उन्हें आग में भूनकर उनका मांस खा जाते थे। जैसे अरुणाचल प्रदेश में लोग चूहे का मांस चाव से खाते हैं, उसी तरह हमारे जिले में सिर्फ मुसहर ही नहीं तमाम जातियां चूहे का मांस खा लेती हैं। बस प्रकट रूप से बोलने मे शरमाती हैं।

मुसहर हमारे यहां अछूत जाति बिलकुल नहीं है। जब भी किसी शादी विवाह और किसी अन्य प्रयोजन के मौके पर भोज का आयोजन होता तो इसमें पत्तल की सप्लाई का काम मुसहर परिवार के लोग किया करते है। वे लोग सालों भर घर में पत्तल बनाया करते थे। बड़े बड़े पत्तों को सिंक की सहायता से जोड़कर ये पत्तल तैयार किए जाते हैं। पर आजकल मशीन के बने हु रेडिमेड पत्तल आ जाने के कारण उनके परंपरागत कारोबार पर बुरा असर पड़ा है। खास मांग पर वे लोग पुरइन के पत्ता का पत्तल भी सप्लाई करते थे। ये ऐसा पत्ता है जो बिल्कुल गोल पत्तल के साइज का ही होता है। यह पानी में होता है। पर आजकल तो किसी भोज में दिखाई ही नहीं देता।

बसपुरा के मुसहर समाज के लोग सूअर पालन भी करते थे। उनके पास सूअरों का बड़ा झुंड हुआ करता था। बचपन में जब मुझे चिढ़ाना होता तो दादा जी कहते कि तुम्हारी शादी दशरथ मुसहर की पोती से करा दी जाएगी। दहेज में कई सारी सूअर मिलेंगी। यह सुनकर मैं झेंप जाता। हांलाकि मुझे लगता था कि मेरे साथ मजाक किया जा रहा है।

मुसहर जाति के लोग सिर्फ रोहतास जिले में ही नहीं बल्कि गया, भोजपुर और आसपास के तमाम जिलों से लेकर झारखंड तक में हैं। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के महान शहीद तिलका मांझी भी इसी समाज से हुए हैं। पहाड़ का सीना चिरकर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी ( माउंटेन मैन ) भी इसी समाज के महान सपूत हैं।

सन 1984 में जब मेरे दादाजी का श्राद्ध कर्म हुआ तो मुसहर समाज के सभी लोगों को भोज में आमंत्रित किया गया था। उन लोगों ने बड़े ही जोश से भोज खाया था और जाते जाते मेरे दादाजी के लिए जयकारा भी लगाया था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyutp@gmail.com
-         ( SOHWALIA DAYS 22 – DASHRATH MUSHAR, BASPURA )

Tuesday, August 25, 2020

मेरे दादा जी – खेती किसानी, गाड़ीवानी से लेकर साधुओं के संग तक


मेरे दादाजी कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। कोई राजनेता भी नहीं थे। अखबारों में नाम भी नहीं छपता था। पर वे एक किसान थे। हजारों लाखों देश के किसानों के बीच एक किसान। पर क्या कहानियां सिर्फ खास लोगों की होती हैं। संघर्ष सिर्फ शिखर पर पहुंचने वालों का होता नहीं न। तो मेरे दादा जी मामूली किसान नहीं थे। उनके व्यक्तित्व के कई रूप थे। वैसे तो उनका आधिकारिक नाम प्रयाग सिंह था। पर गांव-गिरांव में महतो जी के नाम से सम्मान पाते थे।

जब मैंने होश संभाला तो दादा जी बूढ़े हो चुके थे। पर मैंने उन्हें किसान के तौर पर खेतों में हल चलाते देखा है। जब धान की खेती शुरू होती तो मेरा रोमांच चरम पर होता। दादा जी के साथ मैं भी खेतों की ओर निकल पड़ता। कभी कोन्ही में तो कभी लाठी पर तो कभी कृष्णार्पण कभी बिचली पारी कभी गढ़ही में। ये सब हमारे खेतों के नाम थे। दादा जी धान के खेत तैयार करने के लिए दो चास हल चलाते। इस दौरान मैं उनकी मदद करने की कोशिश करता।

खास तौर पर गेहूं की खेती के दौरान खेत को समतल करने के लिए हेंगा  लगाया जाता। इस दौरान में हेंगा पर संतुलन बनाकर बैठ जाता था। दोनों हाथ में जुआठ पर लगी रस्सी होती थी। हेंगा पर बड़ा संतुलन बनाकर बैठना होता था। अगर बीच में गिरे तो पांव कुचल जाने का खतरा था। पर अक्सर हेंगा पर बच्चों को ही बिठाया जाता था, क्योंकि ज्यादा वजनी लोग तो उस पर बैठ भी नहीं सकते थे। खेती के दौरान में देखता था कभी कभी दादा जा रात 12 बजे तो कभी रात को दो  बजे भी खेतों में पानी मोडने के लिए जाते थे।

नहर में गास देकर पानी रोक देना – कभी-कभी खेत पटाने के लिए गांव के लोग नहर में गास लगाने जाते थे। ऐसा होता था कि नहर के पुल पर लगे सुलिस गेट में एक बांस में ढेर सारा पुआल लपेट कर फंसा दिया जाता था। इसे ही गास कहते थे। इससे पानी का स्तर ऊंचा हो जाता था। और पानी नीचे गिर कर आगे जाने के बजाय हमारे रजवाहों में चला आता था। ये प्रक्रिया गैरकानूनी थी। इसलिए गांव के लोग चुपके से ये काम रात में करते थे। अगले दिन दूसरे गांव वालों के पता चलने तक हमारे खेतों को काफी पानी मिल जाता था। इस गास देने को लेकर कई बार दो गांवों में लड़ाई भी हो जाती थी। वहीं नहर की पेट्रोलिंग करने वाला पेट्रोल भी पता चलने पर कई बार गांव  वालों पर जुर्माना करने आ जाता था।
जरा हौले गाड़ी हांक रे मेरे राम गाड़ी वाले – मैंने देखा तो नहीं है पर गांव के लोग बताते हैं कि दादाजी जवानी के दिनों  खेती के अलावा गाड़ीवान का भी काम करते थे। दो मजबूत बैल थे उनके पास। बैलगाड़ी पर बोरे लाद कर कुदरा बाजार ले जाते। उधर से खाद बीज या दूसरे सामान लाद कर गांव लेकर आते। किसी जमाने में मेरे गांव के बड़े जमींदार शिवदेनी राय और मेरे दादा जी प्रयाग सिंह दोनों इलाके के मशहूर गाड़ीवान हुआ करते थे। पर उम्र बढ़ने के साथ दादा जी ने ये पेशा छोड़ दिया।

साधुओं का संग – बुढापे में दादा जी साधु प्रवृति के हो गए थे। वे  हालांकि दीक्षा लेकर साधु नहीं बने पर उनके कई दोस्त मित्र साधु बन चुके थे। उनका हमारे घर आना जाना लगा रहता था। तुर्की गांव के सालिकदास, दुर्गानाथ, रामनाथ बाबा साधु बन गए थे। वे लोग अक्सर हमारे घर आते। दादा जी उनके साथ देर तक धर्म चर्चा करते।

कोई राहगीर प्यासा न जाए - दादा जी का सख्त निर्देश था कि हमारे दलान से होकर कोई भी राहगीर गुजरे तो उसे गुड़ खिलाया जाए और पानी पिलाया जाए। दलान पर एक पीतल का लोटा और मेटा में गुड़ हमेशा रखा रहता था। दादा जी जब दलान पर मौजूद होते और कोई राहगीर जा रहा होता तो उसे रोककर जल पीने और थोड़ा सुस्ता लेने के बाद आगे जाने का आग्रह करते। मेरे बचपन में गांव-गांव को जोड़ने वाली सड़कें तो थी नहीं। तो हितई-गनई में जाने का एक मात्र तरीका पैदल यात्राएं करना था।

आसपास के दस बीस गांव हर बिरादरी के ज्यादातर लोग मेरे दादाजी को नाम से जानते थे। उन्हें कई बार पंचायती करने के लिए बुलावा भी आता। तो रिश्ते नाते के लड़कियों की शादी में वे अगुवा की भूमिका निभाया करते थे।  
दादा जी ऐसे घुमक्कड़ थे कि शाहाबाद जिले के लगभग हर गांव में वे जा चुके थे। कैमूर की पहाड़ी में गुप्ता बाबा के धाम की यात्रा जब मुश्किल हुआ करती थी तब वे बाबा के दर्शन करने जा चुके थे।

किस्सागोई के तो वे उस्ताद थे। जब कहानियां सुनाना शुरू करते तो उनके यादों की पोटली घंटों खत्म नहीं होती थी। अपनी कहानियों में वे किसी पेड़ पर चढ़कर पेड़ को ही हांक दिया करते थे। इस पेड़ से ही वे दो बार बर्मा के रंगून शहर में चले गए थे। उनकी जुबां पर रंगून और कोलकाता, पटना के अनगिनत किस्से हुआ करते थे।
-         -- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( (SOHWALIA DAYS 21, DADA JEE, PRAYAG SINGH, BIHAR ) 

Sunday, August 23, 2020

डॉक्टर महमूद और बैकुंठ में दादा जी

महमूद डाक्टर नाम था उनका। हमारे गांव की स्वास्थ्य सेवा उनके जैसे ही कुछ डाक्टरों के हवाले थी, जिन्हें आज के शब्द में हम झोला छाप डाक्टर कहते हैं। ये डाक्टर साइकिल से या पैदल अपना दवाओं का एक बैग लेकर गांव गांव में दौरा करते थे और दवाएं देकर जाते थे। तो महमूद डाक्टर शहर गांव से आते थे।
वह जनवरी की एक सर्द सुबह थी। जब मेरे दादा जी इस दुनिया को छोड़कर चले गए। आठ जनवरी को सुबह 10 बजे उनका निधन हुआ। हमलोगों ने महनार में गंगा तट पर उनका अंतिम संस्कार किया।

तब हमलोग वैशाली जिले के जन्दाहा में रहते थे। मैं आठवीं कक्षा का छात्र था। मेरे एक रिश्तेदार रामनारायण सिंह के साथ अपने गांव सोहवलिया जाना हुआ दिसंबर के आखिरी हफ्ते में। रामनारायण सिंह का गांव समहुता है। हमारे सोहवलिया से एक मील उत्तर। हमलोग गांव से लौटे तो कई बोरियां चावल लेकर। ये चावल हमारे खेतों का था। अक्सर वैशाली जिले में रहते हुए भी हमलोग हर साल अपने खाने के लिए चावल गांव से लेकर जाते थे। हाजीपुर तक रामनारायण सिंह हमारे साथ रहे। वहां से जन्दाहा जाने वाली बस में मुझे बिठा कर वे कन्हौली चले गए।





बस की छत पर हमारी दो क्विंटल चावल की चार बोरियां लाद दी गई थीं। बस जन्दाहा के नीम चौक पर रुकी। मैंने पलदारों से चावल की बोरियां उतरवाईं और रिक्शा में बैठकर अपने आवास पर पहुंच गया। तब हमलोग जन्दाहा में मुख्य चौक पर सत्यदेव सोमानी के मकान में रहते थे। उसी मकान में उपर ग्रामीण बैंक की शाखा थी। घर पहुंचने पिता जी ने  बताया कि दादाजी बहुत बीमार हैं। शायद तुमसे मिलने के लिए ही जीवित हैं। सचमुच इसके कुछ दिनों बाद दादा जी गुजर गए। पर उन्हें अपनी मृत्यु का एहसास हो गया था। मृत्यु से दो घंटे पहले दादा जी ने पिता जी को बिठाकर एक घंटे तक गांव-गिरांव खेतीबाड़ी और यहां तक कि मेरे श्राद्ध कर्म को कैसे करना किन लोगो को बुलाना सब कुछ बता दिया था।

तो नौ जनवरी को हमलोग सपरिवार एक बार फिर गांव चल पड़े दादा जी का श्राद्ध कर्म करने के लिए। जन्दाहा से हाजीपुर फिर पटना। पटना से सासाराम। सासाराम से कुदरा। कुदरा से दो तांगे आरक्षित किए गए अपने गांव के लिए। शाम ढलते हमलोग गांव पहुंच चुके थे। अगले दिन से दादाजी के श्राद्ध कर्म की तैयारियां होने लगी।

तो दादाजी जिन लोगों को आमंत्रित करने को कहा था उनमें डॉक्टर महमूद भी एक नाम था। वे शहर गांव के रहने वाले एक झोला छाप डॉक्टर थे। उनके कहे अनुसार हमने श्राद्ध भोज में उन तमाम गांव के लोगों को न्योता भेजवा दिया। भोज में वे तमाम लोग आए भी। पर महमूद डाक्टर नहीं पहुंचे। चार दिन बाद हमलोग शहर वापस लौटने वाले थे। उसके एक दिन पहले दुपहरिया में महमूद डाक्टर पहुंचे। पहुंचते ही बताना शुरू किया। जरूरी काम से कई दिनों से बाहर गया हुआ था। लौटा तो प्रयाग भैया के श्राद्ध कर्म की जानकारी मिली। मैं अभी अभी भागा चला आ रहा हूं। उसके बाद महमूद डाक्टर ने आधे घंटे तक मेरे दादा जी को अपने शब्दों में कई तरह से याद किया। वे मेरे दादा जी से उम्र में छोटे थे इसलिए भैया कहते थे।

डॉक्टर महमूद बार-बार दुख जताते रहे कि मैं भैया के काम में नहीं पहुंच सका। खैर वे बोले की भोज में का कुछ भी बचा हो तो लाओ दो मैं खाउंगा। हमलोगों ने घर में तलाशी ली सब कुछ खत्म हो गया था, पर गुलाब जामुन बचे हुए थे। हालांकि डाक्टर महमूद को चीनी की बीमारी थी, फिर भी उन्होंने दादा जी के नाम पर दो गुलाब जामुन गटक लिए।

हमें यह दृश्य देखकर आत्मिक प्रसन्नता हो रही थी। साथ ही श्राद्ध के समय का वह नजारा भी मेरी आंखों के सामने था, जब महामात्र ब्राह्मण अपने इच्छा के मुताबिक दान नहीं मिलने पर लोटे से जल गटकने से पहले तमाम नखरे कर रहा था। उसका कहना कुछ ऐसा था कि अगर मैंने ये जल नहीं गटका तो आपके दादा जी को बैकुंठ में जगह नहीं मिलेगी। मानो वो रास्ते में लटके रह जाएंगे। पर अब डॉक्टर महमूद के बासी गुलाब जामुन गटक जाने के बाद मैं निश्चिंत हो गया कि दादा जी को जरूर बैकुंठ  में उत्तम स्थान प्राप्त हो गया है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( (SOHWALIA DAYS 20, DR MAHMOOD, SHAHAR, BAKASRA ) 

Friday, August 21, 2020

और एक दिन गांव में मेरा अपहरण हो गया

हमारे सोहवलिया गांव में सोन नहर आती है। बसपुरा में सोन की बड़ी नहर का पुल है। वहां से एक माइनर नहर निकली है। ठीक एक मील बाद इस नहर का पहला पुल हमारे गांव में पड़ता है। इस नहर पर हर एक मील पर पुल हुआ करता है। इस पुल के साथ सुलिस गेट लगे हैं। इस पुल के ऊपर से रजवाहे निकलते हैं जिनसे खेतों तक पानी पहुंचता है। नहर का यह पुल बचपन में हमारे खेलने कूदने की प्रिय जगह होती थी। खेतों की ओर आते जाते लोग नहर के बैंक पर बैठकर सुस्ताया भी करते थे।

नहर के पुल से पानी नीचे की ओर गिरता था। तो नहर के आगे एक छोटा सा तालाब बन जाता था। जब नहर में पानी कम होता तो पुल के आगे इस मिनी तालाब में हमलोग उतर जाया करते थे। एक बार इसी तालाब में उतरने के बाद मैं फंस गया था। पानी के बीच। निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। मेरे सारे दोस्त मुझे छोडकर फरार हो गए थे। मैं सहायता के लिए आवाज लगा रहा था। संयोग से मेरे दादाजी खेत से लौटते हुए गुजरे। मैंने उन्हें आवाज लगाई। पहले तो उन्होंने नहीं सुना। कई बार आवाज लगाने पर उनकी नजर मेरी ओर पड़ी। वे दौड़े हुए मेरे पास आए। उन्होंने मुझे अपनी लाठी पकड़ाई। कहा इसे पकड़कर किनारे आ जाओ। इस तरह में संकट से बाहर निकला।

इसी तालाब में कई बार पड़ोस के गांव से एक महावत हाथी लेकर आता था। वह हाथी को नहर के पानी में नहलाया करता था। हम उसे हर बार आग्रह करते कि हमें हाथी पर बिठाकर थोड़ी दूर घूमा दो। पर वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता। पर हम इस उम्मीद में कि वह मेरी बात कभी तो सुन लेगा हाथी के पीछे दौड़ते हुए दूर तक जाते। पर निराश होने पर कानडिहरा की तरफ जामुन के पेड़ के पास से लौट आते। हमारी हाथी पर बैठने की हशरत कभी पूरी नहीं हो सकी।

एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ नहर के पुल के पास खेल रहा था। तभी हमारे गांव के एक नौजवान गया साइकिल से जा रहे थे। वे अपने रिश्तेदारी में रतनपुरा जा रहे थे। गया ने मुझसे कहा, आओ तुम्हें साइकिल पर बिठा कर ले चलूं। उन्होंने कहा, एक मील आगे बसपुरा गांव में दादी के पास छोड़ दूंगा। वहां मेरी दादी शिक्षिका थीं। मैं साइकिल पर चढ़ने के नाम पर झटपट तैयार हो गया। उन्होंने मुझे साइकिल पर आगे डंडे पर बिठा लिया। हाथी पर नहीं बैठ सका तो क्या हुआ साइकिल पर बैठने का भी अपना रोमांच था। गया ने मुझे दादी के पास स्कूल में छोड़ दिया और वह आगे अपने गांव चला गया। मैं दादी के स्कूल में खेलने लगा।

उधर, कई घंटे तक घर नहीं लौटने पर गांव में मेरी तलाश शुरू हुई। अक्सर गांव से बच्चों के कहीं गायब होने की उम्मीद नहीं रहती। इसलिए बच्चे बेतकल्लुफ होकर कहीं भी खेलते रहते हैं। पर मैं घर नहीं लौटा तो मां, पिताजी, दादाजी सभी ने मेरी तलाश शुरू की। एक बच्चे से पूछताछ शुरू हुई। तब किसी ने कहा, विकास को तो गया अपने साथ साइकिल पर बिठाकर कहीं ले गया। अब मेरी कहानी में गया खलनायक बन चुका था।

उस समय घर में किसी के पास साइकिल भी नहीं थी। पैदल-पैदल दादाजी बसपूरा पहुंचे, वे आगे रतनपुरा तक भी जाते पर उन्होंने सोचा एक बार दादी से मिलता हुआ चलूं। स्कूल परिसर में पहुंचते ही उन्होंने मुझे वहां बेतकल्लुफ खेलता हुआ देखा। छुट्टी होने पर मैं दादी के साथ अपने गांव लौट आया। तब मुझे अच्छी तरह शिक्षा मिली की बिना घर में बताए गांव की सीमा से बाहर किसी के साथ कभी नहीं जाना। उस गया के साथ बाद में क्या सलूक हुआ मुझे नहीं मालूम। पर मां पिता जी ने मिलकर ऐसी कड़ी सजा दी की मुझे सालों याद रहे। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( SOHWALIA DAYS 19 , KIDNAPPED, ROHTAS, BIHAR ) 

Wednesday, August 19, 2020

मेरी पहली शिक्षिका मेरी मां और मनोहर पोथी

आजकल शहर के स्कूलों में बच्चे प्ले वे, नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी पढ़ने के बाद पहली कक्षा में जाते हैं। पर मैंने इन सब कक्षाओं में पढ़ाई नहीं की। सीधे दूसरी कक्षा में नामांकन हुआ वह अक्तूबर के महीने में। जब मैं पिता जी के साथ कन्हौली जिला वैशाली पहुंचा तो वहां जय प्रभा शिशु विकास विद्या केंद्र का छात्र बना। दिसंबर में वार्षिक परीक्षा देकर जनवरी में तीसरी कक्षा मे आ गया। बिहार में तब सालाना परीक्षाएं दिसंबर में ही हुआ करती थीं।

तो ये प्ले वे से लेकर दूसरी कक्षा तक की मेरी सारी पढ़ाई ज्यादातर घर में ही हुई। और मेरी पहली शिक्षिका थीं मेरी मां। वैसे तो मां ने सभी बच्चों को बड़े लाड़ प्यार से पाला है। पर एक शिक्षिका के तौर पर वे बड़ी कठोर रहती थीं। सोहवलिया गांव में जब मैंने होश संभाला तो अक्षर ज्ञान कराने का पहली जिम्मेवारी मेरी मां के ही जिम्मे थी। पिताजी अपनी नौकरी के सिलसिले में बाहर ही रहते थे।

बिहार में ज्यादातर बच्चों की तरह मेरी भी पहली किताब मनोहर पोथी थी। वह एक ऐसी किताब होती थी जिसमें हिंदी के स्वर व्यंजन, शब्द संयोजन, गणित की गिनती पहाड़ा और अंग्रेजी के एबीसीडी सबका ज्ञान होता था। मां सुबह का खाना बनाने के बाद दोपहर में मेरी कक्षा लगातीं। स्लेट पेंसिल से पहले गिनती, फिर पहाड़ा, क ख ग घ से लेकर सारा अक्षर ज्ञान फिर अंग्रेजी के एबीसीडी के कैपिटल और स्माल लेटर लिखना सब मां ने ही सीखाया। मां कुछ इस तरह पढ़ाते समय अनुशासन में रखतीं। अगर 12 का पहाड़ा याद नहीं हुआ तो आज दोपहर का खाना नहीं मिलेगा। इस तरह मैंने 30 तक का पहाड़ा याद कर लिया।

जब मैंने मास्टर जी की पिटाई कर डाली -  वैसे तो मुझे गांव में स्कूल भेजने की कई कोशिशें हुईं पर वे ज्यादा सफल नहीं रहीं। मेरे अपने गांव में एक स्कूल था। उसमे एक ही शिक्षक थे। उनका नाम क्या था मालूम नहीं पर वे जाति से भाट थे इसलिए उन्हें इसी नाम से जाना जाता था। स्कूल का कोई भवन नहीं था। इसलिए स्कूल गांव के मंदिर के बरामदे में लगता था। मैं अपना टाट पट्टी (बोरा) लेकर स्कूल जाता। एक दिन मास्टर साहब ने मुझे झ लिखने को कहा। पर मैंने झ दूसरे तरीके से लिखा भ में सूंड लगा कर पर वे मुझे झ इस तरह लिखने को कह रहे थे। मैंने कहा, मेरी मां ने ऐसे ही सीखाया है। यही सही है। मास्टर साहब ने कहा मैं जो बता रहा हूं वह भी सही है। ऐसे भी लिखो। मैंने कहा नहीं मेरी सही है।

इस पर मास्टर जी ने छड़ी उठाई और मुझे दो छड़ी पीट दिया। मुझे गुस्सा आया। कुछ मिनट मैं मौका देखता रहा। जैेसे ही मास्टर जी ने नजर दूसरी तरफ फेरी अचानक मैंने मास्टर जी की छड़ी उठाई और उससे तड़ातड़ उन्हें चार छड़ी पीट डाला। बदला लेने के बाद मैं सावधान था। तुरंत अपना बस्ता उठाया और पंजाब मेल की गति से अपने घर की ओर भागा। मां ने स्कूल से समय से पहले आने का कारण पूछा। मैंने सच सच बता दिया। मां की क्या प्रतिक्रिया रही ये मुझे याद नहीं। पर अब उस मंदिर वाले स्कूल में तो जाने का कोई मतलब नहीं था। किसी काम से स्कूल के आसपास फटकता तो गांव के  बच्चे रोककर पूछते, क्यों तुमने गुरुजी को क्यों मारा था। मैं उन बच्चों से बचकर भागता। हालांकि वह भाट गुरुजी बाद में पिता जी को मिले तो उन्होंने कहा, अपने बच्चे को फिर से पढ़ने को भेजें। मुझे कोई नाराजगी नहीं है। पर मैं डर के मारे उस स्कूल में दुबारा नहीं गया।

आज तुम रिबन बांध कर क्यों नहीं आई-  अब मैंने बसपुरा के प्राथमिक विद्यालय में जाना शुरू किया। यह बड़ा स्कूल था। वहां मेरी दादी मास्टरनी थीं। तो मैंने उनके साथ बसपूरा के उस स्कूल में जाना शुरू कर दिया। इस स्कूल में कई शिक्षक थे। अलग-अलग कक्षाएं भी थीं। स्कूल का अपना भवन भी था। तो मेरी क्लास में एक सुंदर सी लड़की आती थी। वह बालों में दो रिबन बांध कर पोनी टेल बनाती थी। मैं उसके बगल में बैठता था और शरारत में उसके रिबन खोल देता था। वह गुस्सा खाती। मुझे उसका गुस्सा देखकर अच्छा लगता। अगले दो तीन दिनों तक मैं उसके रिबन खोलता रहा। एक दिन वह कक्षा में आई पर उसने रिबन नहीं बांध रखा था। मैंने उससे पूछा आज रिबन क्यों नहीं बांधा। उसने जवाब दिया क्यों, खोलने के लिए। मैं बड़ा दुखी हुआ। मन आत्मग्लानि से भर आया। फिर कुछ ऐसी घटनाएं हुई कि मैंने दादी के उस स्कूल में जाना भी छोड़ दिया।

कुछ दिनों बाद मैं पड़ोस के गांव सोहवलिया कलां से प्राथमिक विद्यालय में जाना शुरू किया। वहां भी एक शिक्षक थे। गया मास्टर। वे किसी दूर के गांव से रोज पैदल चलकर आते थे। इस स्कूल का भी कोई भवन नहीं था। स्कूल आम के बागीचे में पेड़ के नीचे लगता था। मास्टर साहब एक मचिया पर बैठते थे। हमलोग बोरियां बिछाकर जमीन पर। किसी दिन मास्टर काफी देर तक नहीं आते तो स्कूल की कक्षाएं शून्य हो जातीं। कुछ महीने इस स्कूल में मेरी पढ़ाई चलती रही। यहां मेरा एक दोस्त भी बना, अखिलेश कुमार दूबे। पर वह कुछ दिनों बाद बोकारो स्टील सिटी चला गया। अपने पिताजी के पास। इस स्कूल में मेरी पढ़ाई भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई।

इस बीच चाहे में जिस स्कूल में भी जाउं, मेरी मां की घर में पढ़ाई लगातार जारी रही। गणित को आसानी से समझने के लिए मां ने मुझसे मिट्टी की 100 छोटी-छोटी गोलियां बनवाई। इन गोलियों को धूप में सुखाया। फिर आग में पकाया। अब इन गोलियों से की मदद से जोड़ और घटाव सीखता था। आगे मां ने मुझे गुणा भाग भी इन्ही गोलियों की मदद से सीखाया। साल के 12 महीनों और दिनों के नाम हिंदी अंगरेजी में भी रटवाए। इसी बीच साल 1978 का दशहरा आया। इन छुट्टियों में पिताजी जब गांव आए तो उन्होंने कहा, विकास अब मेरे साथ जाएगा। आगे की पढ़ाई वहीं करेगा। और हमने सोहवलिया छोड़ दिया। पर वह मंदिर के बरामदे में और पेड़ की छांव में लगने वाले स्कूल हमेशा स्मृतियों की आंगन में अब भी विचरण करते रहते हैं।
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य
 (SOHWALIA DAYS 18, MY SCHOOLS, BASPURA, RIBBON GIRL ) 
मां के साथ एक पुरानी तस्वीर, अंदरकिला, हाजीपुर के दिनों की। 

Monday, August 17, 2020

नए रूप में देखो आ गया बहुरुपिया


हमारे टोले पर हर साल किसी खास महीने में बहुरुपिया आया करता था। जहां तक मुझे याद आता है कि वह दशहरे के आसपास आता था। बचपन के गांव में जब टीवी नहीं था। हमने कभी कोई फिल्म नहीं देखी थी। वह बहुरुपिया हमारे मनोरंजन का बड़ा साधन था।

पहले दिन वह पागल का रुप धर कर आया। पूरी गली में कपड़े फाड़ कर पागलों जैसी हरकत करता हुआ घूमता रहा। जैसे गांव में बहुरुपिया पहुंचता, हमारे जैसे सभी बच्चों की टोली उसके साथ हो लेती। बहुरुपिया आगे आगे और हम पीछे-पीछे। पागल के बाद अगले दिन वह खूनी बनकर आया। उसके हाथ खून से सने हुए थे। वह रूप बदलने में इतना उस्ताद था कि हमलोग भी पहचान नहीं पाते थे कि ये कल वाला ही आदमी है। कई बार बहुरुपिया ऐसी हरकतें करता था कि गांव के कुछ लोगों से उसकी बकझक भी हो जाती थी। पर थोड़ी देर में सब कुछ समान्य हो जाता।

वह हमारे गांव के पास ही ससना पटना नामक गांव का रहने वाला था। उस गांव में जहां अखबार नहीं आता था। टेलिविजन सिनेमा नहीं था। रेडियो किसी किसी के पास था। बहुरुपिया हमारे मनोरंजन का बड़ा साधन था। वही हमारा कॉमिक्स बुक, रामायण महाभारत और सिनेमा सब कुछ था। वह हमारा धर्मेद्र, देवानंद और अमिताभ बच्चन सब कुछ था। हमें बड़ी बेसब्री से इंतजार होता कि आज बहुरुपिया कौन से रूप में आएगा। 

बहुरूपिया के जब सारे स्वांग खत्म हो जाते तो वह आखिर में अपने मूल स्वरूप में आता था। इस दौरान वह हर घर से अपना हर साल तय सलामी की रकम लेकर जाता था। बहुरुपिया को हमारे गांव से हर घर से अनाज मिलता था। धान और गेहूं का बोझा तय होता था। ठीक उसी तरह जैसे हमारे बढ़ई महाराज मिस्त्री और हज्जाम दुखी ठाकुर को सालाना अनाज दिया जाता था। बढ़ई को अनाज की रकम आपके घर चलने वाले हल के हिसाब से दिया जाता था। इसके एवज में वे सालों भर हल, हेंगा, जुआठ आदि की मरम्मत किया करते थे। इसके अतिरिक्त कोई काम कराना हो तब अलग से मजदूरी देनी पड़ती थी। हमारे बढ़ई महाराज मिस्त्री बड़े गुणी और बातूनी आदमी थे। जब हमारे घर काम करने आते तो मुझसे खूब बातें करतें। पर उनके बेटे रामअवतार ने गांव में काम की कमी देखी तो शहर में कारपेंटर का काम करने चले गए।

इसी तरह हमारे नाऊ (हज्जाम) दुखी ठाकुर ने भी बूढ़े होने पर बाल दाढ़ी काटने का काम छोड़ दिया। उनके बेटे दुदुल ने भी शहर में जाकर सैलूनों में काम करना शुरू कर दिया। दुखी ठाकुर कानडिहरा गांव से आते थे। जब उन्होंने बाल दाढ़ी काटना छोड़ दिया तो उनका बोझा मिलना भी बंद हो गया। पर हमारे गांव में हजाम का बड़ा संकट खड़ा हो गया। खैर दाढ़ी तो लोग खुद भी बना लें पर बाल काटने के लिए तो हज्जाम की जरूरत पड़ती ही है। सबसे ज्यादा संकट शादी विवाह के समय आता। शादी में हज्जाम का जाना जरूरी होता है। वह शादी में पंडित के आधे रश्म खुद करता है। वह पंडी जी का प्रमुख सहायक होता है। पर नियमित काम नहीं मिलने के कारण कई गांव में नाऊ, धोबी, हजाम, लुहार आदि का इन दिनों संकट रहने लगा है। यहां तक की शादियों में तो भड़भूजे की भी जरूरत पड़ती है। पर अब कई गांवों में चूल्हे पर रेत के साथ दाना भूंजने वाले भड़सार खत्म होने लगे हैं। तो भड़भूजे वालों ने भी अपना पेशा छोड़ना शुरू कर दिया है।

खैर बाद बहुरुपिया की हो रही थी। तो बहुरुपिया जब समान्य वेश वूषा में आता तो हमारे लिए पहचानना मुश्किल हो जाता कि वह वही आदमी है। वह मेरे दादाजी को भैया कहकर बातें करता। कुछ साल बाद गांव जाने पर पता चला कि अब बहुरुपिया ने खेल दिखाना बंद कर दिया है। गांव गांव में वीडियो से चलने वाले सिनेमा के पहुंच जाने पर बच्चों में बहुरुपिये का क्रेज कम होने लगा। हमारे गांव में आने वाले बहुरुपिया चेहरे मोहरे से थोड़ा नाजुक दिखाई देता था। उसका आचार व्यवहार भी थोड़ा स्त्रैण था। खेती बाड़ी उसके लिए थोडा मुश्किल काम था। गांव के लोग बताते हैं कि अब कोई बहुरुपिया नहीं आता। उसके बच्चे भी इस पेशे से काफी दूर जा चुके हैं।

कभी कभी गांव में बंदर का नाच देखने को मिल जाता था। एक नट बंदर को लेकर आता था। वह डुगडुगी बजाता तो गांव के सारे बच्चे गली में एक जगह पहुंच कर उसे घेर लेते। उसके बाद शुरू हो जाता बंदर का नाच। एक बार बंदर वाले ने नाच खत्म होने के बाद बोला जाओ जाकर अपने साढू भाई को प्रणाम करो। बंदर तपाक से मेरे पास आकर नमस्ते की मुद्रा में खड़ा हो गया। गांव बच्चों और मेरे घर के लोग इस घटना को सालों याद करके खूब हंसी उड़ाते।
गांव में कभी कभी एक बाइस्कोप वाला भी आता था। हमलोग अलग अलग डिब्बे खोलकर बैठ जाते। वह रिकार्ड प्लेयर पर गाने चला देता। बाइस्कोप के अंदर कुछ फिल्मी सितारों की तस्वीरें नजर आतीं। साथ दिल्ली का लालकिला, कुतुबमीनार, आगरा का ताजमहल और कोलकाता का हावड़ा ब्रिज भी नजर आता। बाइस्कोप वाला दस पैसे लेता था, या फिर उसे चावल या गेहूं दिया जाता था।  

कभी कभी गांव में साइकिल पर गर्मी के दिनों में आईसक्रीम बेचने वाला भी आता था। उसकी साइकिल से एक खास किस्म की टर्रररररररररररररर की आवाज आती हो हम समझ जाते थे मलाई बरफ वाला आ गया है। वह पांच पैसे और दस पैसे का मलाई बरफ बेचता था। उसको चूसकर जो आनंद आता था आज वैसा आनंद किसी महंगे रेस्टोरेंट में रस मलाई खाकर भी नहीं आता।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com 
((BAHURUPIA, SOHWALIA DAYS 17 )


Saturday, August 15, 2020

दादा जी के साथ भोज खाने का आनंद


घर में भोजन तो आप रोज करते हैं, पर भोज में पांत में बैठकर खाने का आनंद कुछ और ही होता है। दही बड़े, पूड़ियां, पुलाव, मिठाई और भी बहुत कुछ। बचपन में जब मैंने समाज को समझना शुरू किया तभी से मुझे भोज में खाने में बड़ा आनंद आता था। धुंधली सी याद आती है, गांव में सरिता फुआ की शादी हुई थी। पहली बार मैंने गांव में एंबेस्डर कार आती देखी। उसमें दुल्हन बनी फुआ चलीं गईं। पर उनकी शादी का भोज याद रहा।

मुझे जब भी पता चलता की आसपास के गांव में कहीं भोज है। उसमें दादा जी जा रहे हैं, तो जाने के लिए मन मचल उठता। मैं दादा जी को कहता मैं भी चलूंगा आपके साथ। चाहे गांव कितनी दूर क्यों न हों। एक बार अपने टोला में एक चाचा के तिलक के भोज में मेरी इच्छा और दही बड़ा लेने की थी। पर दही बड़ा बांटने वाले मेरे आवाज लगाने के बाद भी आगे बढ़ गया। मैं पांत से उठकर दौड़ा और उसे रोका। मेरे इस दही बड़ा प्रेम का गांव के लोग लंबे समय याद करके मजाक उड़ाते रहे।

मैं कोई चार पांच साल का रहा होउंगा। दादाजी तुर्की गांव में एक भोज में जा रहे थे। मैंने कहा मैं भी चलूंगा। तुर्की मेरे गांव से पैदल पांच किलोमीटर का रास्ता। मेरे दादा जी मुझे ले नहीं जाना चाहते थे। पर मैं जिद पर अड़ गया। दादा जी की उंगली पकड़े खेतों से होते हुए पैदल पैदल हमलोग चल पड़े तुर्की गांव की ओर। ये खेतों वाला रास्ता थोड़ा नजदीक पड़ता था। रास्ते में इस्माइलपुर के सीवान में एक खेतों के बीच एक छोटी सी कुटिया नजर आई। दादा जी वहां रुके। कुटिया में एक साधु बाबा रहते थे। वे दादा जी के दोस्त थे। उन्होंने हमें जल पिलाया। फिर हम आगे चल पड़े।

दोपहर होते होते हम तुर्की पहुंच गए। गांव के लोगों ने इसका नया नाम रखा था सुंदरबाग। सचमुच सुंदर था तुर्की। बचपन में मेरे सपनों के गांव सरीखा। दोपहर का भोज खाने के बाद। गांव में बच्चों के साथ हमने खूब धमा-चौकड़ी की। पर इसी बीच एक बस आई।
मेरे दादाजी उस बस में जा बैठे। मैंने पूछा कहां, वे बोले बारात जा रहा हूं। परसों लौटूंगा। तब तुम यहीं रहो। बुधन चाचा के घर। बारात दूर जा रही है इसलिए तुम्हें बारात में नहीं ले जाउंगा। बारात जा रही है सासाराम के पास उचितपुर गांव। तुर्की गांव के बच्चों के साथ खेलने में मेरा मन लग गया था। इसलिए मैंने बारात जाने की जिद नहीं की।

दिन तो खेलते कूदते गुजर गया। शाम गहराई तो मुझे भूख लग गई। जिस घर में मैं आया था, उसके सारे पुरुष सदस्य बारात में जा चुके थे। मैं घर के आंगन में गया। औरतें गप्प लड़ाने में व्यस्त थीं। चूल्हे पर खाना बन रहा था। पर उसे देखकर लग रहा था कि भोजन तैयार होने में देर है। उधर मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे। मैं घूमता हुआ पड़ोस वाले घर में चला गया। वहां क्या देखता हूं मेरे पिता जी के मित्र और मौसेरे भाई, भृगनाथ मास्टर साहब बैठकर खाना खा रहे हैं।
वे मेरे घर अक्सर आते थे तो मैं उनको पहचानता था। मैं उनके पास गया और बोला मैं भी खाऊंगा। वे बोल पड़े- तुम तो बारात वाले घर में आए हो। वहां रंग बिरंगे व्यंजन बन रहे हैं। मेरे घर में तो खाने में सूखी रोटी मिलेगी। मैंने कहा, मैं वहीं खाऊंगा सूखी रोटी ही सही। उनके बगल में मेरी थाली लग गई। खाने के बाद में मास्टर साहब के साथ ही उनके जाकर दलान में सो गया।

अगले दिन सुबह से शाम तक सुंदरबाग के खेत खलिहानों में बच्चों के साथ खेलता रहा। बुधन चाचा के मिट्टी के बने दो मंजिला घर के पीछे एक सुंदर सा तालाब था। तालाब के चारों तरफ कई किस्म के फूल खिले थे। इनमें वैजयंती का पौधा भी था। उसमें भी फूल खिले थे। अब वह तालाब नहीं रहा, पर उस हरे भरे तालाब का तस्वीर मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित है।


इस तुर्की गांव में हमारी एक फुआ रहती थीं। पंचरतना फुआ। वे बड़े स्नेह से बातें करतीं। इसी तुर्की गांव में रिश्ते में मेरे दादा लगने वाले तीन लोग ऐसे थे जो बुढ़ापे में साधु बन गए थे। साधु शालिकदास, साधु दुर्गानाथ और साधु रामनाथ। इन तीनों साधुओं के सानिध्य में बैठकर उन्हें सुनना काफी अच्छा लगता। वे लोग रामकथा सुनाते थे। अपने घूमंतु जीवन का वृतांत भी सुनाते थे। इसमें एक साथ बाबा कभी बिहार पुलिस में हुआ करते थे। तो कभी कभी उनका पुलिस जीवन याद आ जाता था। पर रिटायर होने के बाद उन्होंने साधु बनना पसंद किया। ये तीनों साधु बाबा लोग अपने गांव में अपने पुश्तैनी घर से अलग रहते थे। अपने कमंडल में पानी पीते। सधुकरी भाषा में बातें करते। एक दो लोग इनमें चिलम भी पीते थे।  

तीसरे दिन सुबह-सुबह बारात की बस लौट आई। उस बस में मेरे दादाजी भी लौट आए। थोड़ी देर बाद मैं दादा जी की उंगली पकड़े वापस लौट चला अपने गांव की ओर।
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(( SOHWALIA DAYS 16, ROHTAS, BIHAR, BHOJ AND BARAT ) 

Thursday, August 13, 2020

कल्हुआड़ी में गर्म गुड़, राब और सिरका

आजकल हमारे गांव में गन्ने की खेती नहीं होती। पर हमारे बचपन में गन्ना लगाया जाता था। गांव के पास डीह में ही। हमारे खेतों मे भी हर साल कई कट्ठे में गन्ना जरूर लगाया जाता था। पर हमारे यहां से गन्ना चीनी मिलों में नहीं जाता था। ये गन्ना गुड़ बनाने के लिए लगाया जाता था।

जब पहली बार गन्ना बीज से लगाया जाता तो उसे नवधा कहते थे। बाद में पिछले साल के गन्ने से काटकर गन्ना लगाते तो उसे जरी कहते थे। जब गन्ना तैयार हो जाए तो खेत में जाकर गन्ना तोड़कर लाना और दिन दुपहरिया बैठ कर दांतो से छिल छिलकर गन्ना चूसना ये बचपन का प्रिय शगल था। जब गन्ना तैयार हो जाता तो उसे काटकर कल्हुआड़ी में लाया जाता जहां उससे गुड़ बनता था। हमारे गांव में एक सांझी कल्हुआडी हुआ करती थी। उसमें बारी बारी से हर घर के लोग गुड़ बनाते थे।

पहले बैलों को नाध कर गन्ने को पेरकर उससे रस निकाला जाता। इसमें हमारी भूमिका बैलों के पीछे पीछे चलकर उन्हें हांकने की होती या फिर मशीन के पास बैठकर उसमे गन्ना लगाने की। हमें दोनों काम में मजा आता। पर हमें इंतजार रहता है कड़ाह में गन्ने का रस डाल देने के बाद उसके पकने का। कड़ाह में उबलते रस के साथ हम कई प्रयोग करते थे।

कई बार खेत से ताजे आल निकालकर उसमे सूई से कई छेद करने के बाद आलू को रस्सी से बांध कर कड़ाह में छोड़ देते। रस से गुड़ तैयार होने में कई घंटे लगते हैं। इस दौरान आलू पक जाता था और उसमे गुड़ की मिठास अंदर तक चली जाती थी। ये मीठा आलू खाने में खूब मजा आता। जब गुड़ बिल्कुल तैयार हो जाता था, तब हम भी तैयार रहते थे। गर्मा गर्म गुड़ खाने के लिए। उसकी सोंधी खुशूब और स्वाद का तो कहना ही क्या। महंगी मिठाइयों में भी वह मजा कहां है जो गर्मा गर्म गुड़ खाने में है। कभी आपको मौका मिले तो किसी कल्हुआड़ी में खाकर देखिएगा ना।

राब और रोटी खाना - मेरे दादा जी गुड़ बनने की प्रक्रिया में राब निकालते थे। दरअसल गुड़ जब बनने की प्रक्रिया में रहता था तभी उसके ठोस बनने से पहले जेली अवस्था में निकाल लिया जाता था। यह जेली अवस्था का गुड़ ही राब कहलता है भोजपुरी में। इसे किसी मिट्टी के घडे में रखा जाता था। मुझे इस राब के साथ रोटी खाना खूब पसंद था। जिस दिन सब्जी पसंद की नहीं बनी हो मैं राब और रोटी खाने की मांग करता था।

गन्ने का सिरका - दादा जी गुड़ से सिरका बनाकर भी बोतल में भर कर रखते थे। ये सिरका कई तरह के दवाओं में काम आता था। ये सिरका बनता कैसे है। गन्ने को रस को किसी घड़े में भरकर रख दिया जाता था। उसके मुंह पर कपड़ा बांध दिया जाता था। इस घड़े को तकरीबन एक महीने तक रोज धूप में रखा जाता है। इस प्रक्रिया में सिरका तैयार होता है। इसे छानकर बोतल में भरकर रख लिया जाता है। आपको पता है कि गन्ने का सिरका रक्त वसा को नियंत्रित करता है। वहीं, वजन घटाने और बढ़े हुए लिवर को भी घटाने में काफी कारगर है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SOHWALIA DAYS 15, SUGERCANE, SIRKA )